१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकारतूस वे काम में लाएं। नए कारतूस यदि दिखाई दिए तो मैं उनका चूरा कर दूंगा, ऐसा स्पष्ट कहते हुए एक अधिकारी ने सिपाहियों में व्याप्त कारतूसों का डर दूर करने का प्रयास किया। वास्तव में देखें तो अब सिपाहियों के भय पर व्याख्यान देते समय कारतूसों की बात करना विषयांतर ही था। ˙˙˙स्वयं कमांडर-इन-चीफ द्वारा सारे हिंदुस्थान में सिपाहियों को सैनिक आदेश से यह घोषित कर दिया गया था कि आगे से नए कारतूस काम में लाना सरकार ने बंद कर दिया है। मरेठ के विद्रोह के बाद जब सरकार ने स्वयं ही कदम पीछे हटा लिया और जिन कारतूसों के लिए मई माह के पहले इतनी जिद की थी-वे ही कारतूस काम में लाना स्वयं ही बंद किया तो-इस आदेश में सरकार की भयग्रस्तता और दुर्बलता के सिवाए सिपाहियों व लोगों को कुछ और नहीं दिखा। कारतूसों के कारण सिपाही भड़के हैं, यह समझने में सरकार से जो गलती हुई उसका पूरा विस्फोट बरेली में होने का अवसर आ गया था। ब्रिगेडियर ने यह कहकर कि नया कारतूस दिखते ही मैं उसे चूरा कर दूंगा, उनका डर दूर करने का प्रयास किया। परंतु अब इस तरह के आदेश से शांति स्थापित होने के दिन नहीं रहे थे; क्योंकि सिपाहियों को डर कारतूसों का नहीं था, वहां कारतूसों के संबंध में कैसा भी आदेश दिया जाए, तो भी उसका क्या उपयोग? अंग्रेजों को आदेश देने का अधिकार रहे या न रहे, यही जहां चर्चा थी वहां नया आदेश देने से वह चर्चा बंद न होकर उलटे अधिक तीव्र होनी थी; अब कारतूसों के प्रकरण में अच्छा या बुरा, कैसा भी व्याख्यान देना विषयांतर ही था; क्योंकि दिल्ली में स्थापित स्वकीय सिंहासन की ओर से हिंदुस्थान का स्वातंत्र्य ध्वज थामे रखने के लिए रूहेलखंड के लोगों के लिए आग्रहपूर्ण और एक आवश्यक निमंत्रण आया हुआ है। अब इस निमंत्रण-पत्रिका को ठुकराना है क्या? "दिल्ली के फौजी बहादुरों की ओर से बरेली के फौजी बहादुरों को प्रेमालिंगन! भाई, दिल्ली में अंग्रेजों से लड़ाई हो रही है। परमेश्वर की कृपा से अपनी एक पराजय भी उनकी दस पराजय के बराबर हानि कर रही है। अनगिनत स्वदेशी वीर इधर आ रहे हैं। ऐसे समय आप वहां भोजन कर रहे हों तो हाथ धोने यहां आना। शाहों का बादशाह और वैभव का आगर जो अपना दिल्ली का बादशाह है, वह आपका बढ़िया मान-सम्मान करेगा और आपकी सेवा का उत्तम पुरस्कार भी देगा। आपकी तोपों की गड़गड़ाहट के लिए हमारा कार्य और आपके दर्शनों के लिए हमारे नेत्र चातक की तरह बाट जोह रहे हैं। आइए, जल्दी आइए! क्योंकि बंधु! भवदागमन के वसंत के बिना यहां गुलाब कैसे खिलेगा? दूध के सिवाए बच्चा कैसे जिएगा?⁶⁴ अब ऐसी निमंत्रण-पत्रिका को कैसे ठुकराया जाए? ऐसे निमंत्रणों के बीच रूहेलखंड के अंतिम स्वतंत्र रोहिला सरदार हाफिज रहमत का वंशज भी बरेली में गुप्त षड़यंत्र के ताने-बाने बुन रहा था। इस खानबहादुर खान को अंग्रेजों की ओर से वह हाफिज रहमत खां का वंशज होने के नाते 'एक' और वह अंग्रेज सरकार में जज था, 1857 का स्वातंत्र्य समर – 146 64 असली पत्र : कॉलिंस नैरेटिव, पृष्ठ 33 ।