१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवातावरण में उड़ान भरने में सक्षम पंख इन सैनिक बंधुओं के पास हैं? मेरे इस भविष्यवाद को धिक्कारकर गुलामी के अंधियारे के गह्वर में सोये सुंदर उषःकाल के दर्शन हेतु मैं उनकी उस नींद को भंग कर रहा हूं। इसलिए मेरे सिर पर ये देशबंधु आघात ही करेंगे! मनोविकारों की ऐसी उथल-पुथल हृदय में चलते हुए भी जिसके चेहरे पर मूर्त शांति विराजमान थी, ऐसा वह ब्राह्मण अपना विलक्षण संदेश लिये लश्कर में प्रवेश कर गया। उन सिपाहियों को दीक्षा देते हुए उसने कहा कि एक बड़ी सी बरात निकालकर उस हल्ले-गुल्ले में आप सब विद्रोह देते हुए उसने कहा कि एक बड़ी सी बरात निकालकर उस हल्ले-गुल्ले में आप सब विद्रोह करें और सारे अंग्रेजों को मौत के घाट उतारकर दिल्ली की ओर चलें। अंग्रेजों का राज्य उलटने के सिद्धांत का विरोधी कोई था ही नहीं; पर उसमें भी उस सिद्धांत को यथार्थ में कैसे बदला जाए, इस प्रश्न का हल भी सुनकर उसकी ग्राह्यता-अग्राह्यता पर विचार चल रहा था। तभी उस रेजिमेंट के तीन सिपाहियों ने अंग्रेजों को यह समाचार देकर उस ब्राह्मण को कैद कर लिया। तत्काल बुलंदशहर से उस ब्राह्मण को रेजिमेंट के मुख्य थाने की ओर रवाना किया गया और उन सब सिपाहियों के सामने फांसी पर लटकाने का दंड दिया गया। यह घटना जब अलीगढ़ में घटित हो रही थी, तभी इधर बुलंदशहर के उन तीन राजनिष्ठों पर सब ओर से थू-थू होने लगी। उनपर गालियों की बौछार करते हुए बुलंदशहर का सारा लश्कर अधिकारियों की अनुमति न लेते हुए जिस स्थान पर वह क्रांतिदूत ले जाया गया था, उस अलीगढ़ शहर की ओर चल दिया। दिनांक 20 मई की शाम को उस ब्राह्मण को फांसी दी गई। बगल में सारी रेजिमेंट खड़ी की गई थी। अब क्या करें? दिनांक 31 मई तक रुकें तो ब्राह्मण निकलता नहीं, निकल ही गया है और फांसी पर उसकी मृत देह प्रतिशोध का बीभत्स व्याख्यान देती लटकी हुई है। भयानक व्याख्यान! शब्द के स्थान पर जहां रक्त की धाराएं स्खलित बह रही हैं। उस भयानक वक्ता ने जीवित रहते जो व्याख्यान कभी न किया हो, वह आज फांसी पर लटके एक शब्द भी न बोलते हुए कर दिया था। क्योंकि आधे क्षण में ही उन असंख्य सिपाहियों की भीड़ में से उछलकर एक सिपाही आगे आया और अपनी तलवार उस फांसी पर लटकते ब्राह्मण की ओर करके चिल्लाया, “अरे यार, यह शहीद रक्त में नहा रहा है।“ बारूद के ढेर पर चढ़ी चिंगारी भी किंचित् देर से सुलगती, पर उस शूर सिपाही के मुंह से छूटी तेजस्वी चिंगारी को उन हजारों सिपाहियों के हृदय में घुसने में उतना भी समय नहीं लगा। उन्होंने अपनी तलवारें बाहर निकालीं और ‘फिरंगियों का नाश हो' की गर्जना करते क्रोध से पगलाए वे हजारों नाचने लगे। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि यह देखते ही अंग्रेज कर्मचारी भयभीत हो गये। राजनिष्ठ 9वीं रेजिमेंट विद्रोह कर उठी। इतना ही नहीं, उसने अंग्रेजों को सूचित किया कि अपने प्राण बचाने हों तो तत्काल अलीगढ़ छोड़ दें। इस उदारता का लाभ लेकर अलीगढ़ के सारे अंग्रेज अधिकारी, उनकी पत्नियां, बच्चे, लेडी आउटेरम आदि सारे-के-सारे अंग्रेज चुपचाप उस शहर से निकल गए। रात बारह बजे तक अलीगढ़ में 1857 का स्वातंत्र्य समर - 141