भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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अंग्रेजी सत्ता का नामोनिशान न रहा। अलीगढ़ स्वतंत्र हो जाने का समाचार 22 मई की शाम को मैनपुरी पहुंचा। मैनपुरी में 9वीं रेजिमेंट का कुछ हिस्सा रहता था, यह पहले ही बताया जा चुका है। उन सिपाहियों के मन में क्या था, यह अलीगढ़ की ओर से बंधुओं के समाचारों से स्पष्ट है। मई की 10 तारीख को मेरठ में क्रांति होने के बाद अंग्रेजों से लड़े सिपाही राजनाथ सिंह के अपने गांव जीवंती लौटने का समाचार मैनपुरी के अधिकारियों को मिलने पर उन्होंने अपनी 9वीं रेजिमेंट के कुछ सिपाहियों को उसे पकड़ने के लिए भेजा। परंतु उन सिपाहियों ने राजनाथ सिंह को पकड़ने की जगह सुरक्षा के साथ उसे जीवंती के बाहर पहुंचा दिया और अंग्रेजों को सूचना दी कि जीवंती में राजनाथ सिंह नाम का कोई व्यक्ति रहता ही नहीं। सिपाही रामदीन सिंह ने आदेश की अवहेलना की, इसलिए उसे कैद कर अंग्रेज अधिकारियों ने सिपाहियों के पहरे में अलीगढ़ भेज दिया। परंतु आधे रास्ते में आने के बाद पहरे के सिपाहियों ने रामदीन सिंह को मुक्त कर दिया। उन्होंने उसकी बेड़ियां काट डाली और वे चुपचाप मैनपुरी लौट आए। 62 इस स्थिति तक पहुंचा वह नेटिव लश्कर केवल संकेत समय के लिए रुका हुआ था और उस एक निश्चित समय के पूर्व शत्रु को अपने पैर काट डालने का अवसर न मिले, इसलिए ऊपर से इतना शांत व्यवहार कर रहा था कि यह 9वीं रेजिमेंट 'राजनिष्ठतम गिनी हुई। परंतु ऊपर बताये गए ब्राह्मण के दौरे के बाद से सिपाहियों का ही नहीं अपितु अलीगढ़ की सारी जनता का गुस्सा अतिरेक की सीमा चला गया था। यह 9वीं रेजिमेंट अलीगढ़ में फैलते जा रहे असंतोष को दबाने जब शहर में भेजी गई तब शहर से निकलते समय बाजार के खटीक और कसाई लोगों ने उन सिपाहियों से पूछा कि यूरोपियनों को कब मारेंगे और स्वतंत्रता के लिए कब उठेंगे? खटीक और कसाई भी जिसके लिए जल्दी कर रहे हों वह कृत्य अब भी टालना सिपाहियों को अच्छा कैसे लगे! और तभी अलीगढ़ का समाचार आया। रेजिमेंट के अन्य लोगों द्वारा विद्रोह कर देने के बाद अब केवल अपना ही रुका रहना निंदनीय है, यह देखकर मैनपुरी का लश्कर विद्रोह कर उठा। उन्होंने भी अलीगढ़ के अपने भाइयों की भांति अंग्रेजों को जीवनदान दिया, शस्त्रागार से शस्त्र और भरपूर गोला-बारूद ऊंटों पर लादकर उन सारे सिपाहियों ने 23 मई को दिल्ली की ओर तत्काल कूच किया। इसी समय इटावा की टुकड़ी में भी धुआंधार हो रही थी। इस इटावा शहर के मुख्य मजिस्ट्रेट डेनियल की सहायता से पड़ोस के रास्ते पर गश्त करने को एक चुनी हुई सेना तैयार की। 19 मई को मेरठ से आए कुछ सिपाही इस सेना से मिले। वे मुट्ठी भर सिपाही शरण में आ गए और उन्हें कुछ थोड़े लोगों के सशस्त्र पहरे में रखने का आदेश मिला। यह आदेश हमारे सिरमाथे है, ऐसा दिखाते हुए मेरठ के उन सिपाहियों ने 1857 का स्वातंत्र्य समर - 142 62 चार्ल्स बाल, खंड 1, पृष्ठ 134।