भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 168

लिये गए हैं और नाक भी साफ कर दी गई है।“ ऐसा 23 जून की यह उपर्युक्त रिपोर्ट कहती है। ऐसे राष्ट्रीय और शास्त्रीय बहिष्कार के कारण अंग्रेजों की कठिनाइयों की सीमा नहीं रही। इलाहाबाद का किला तो ले लिया। परंतु वहां से आगे-पीछे कदम बढ़ाना अंग्रेजों को असंभव हो गया। उन्हें बैला नहीं मिलते, उन्हें गाड़ियां नहीं मिलती, उन्हें दवाइयां भी नहीं मिल रही थीं। बीमार सोल्जरों को डोलियां नहीं मिलती-डोली उठानेवाले कहार नहीं मिलते थे। इस कारण जगह-जगह पड़े बीमार लोगों की कर्कश कराहें इतनी भयानक होती कि उन्हें सुनकर ही अंग्रेज महिलाएं चटपट मरने लगीं। वे दिन धूप के थे और जून माह में विद्रोह करके हम अंग्रेजों को अपने देश के सूर्यताप से मार डालेंगे, विद्रोहियों का यह जो दांव था, उसका अनुभव होने लगा। सिर पर गीला कपड़ा बार-बार रखने में ही सारे अंग्रेज निमग्न थे। उस पर अन्न न मिलना। अनाज का एक दाना भी कोई अंग्रेजों को बेचने के लिए तैयार नहीं था-“ आज तक हमें नितांत ही अल्प भोजन पर अपने दिन गुजारने पड़े हैं। वस्तुतः कल मुझे अपने नाश्ते में जितना भोजन मिला था उससे तो एक श्वान का भी अपना पेट नहीं भर पाता।” ऐसा इलाहाबाद का एक अंग्रेज अधिकारी लिखता है। अपने कुत्ते को भी जो खाना मैंने न खिलाया होता, वह खाना कलम" स्वयं खा रहा था। गरमी और भुखमरी से अंग्रेजों में हैजा शुरू हो गया और उसमें भी अंग्रेज सोल्जरों ने दारू पीकर धुत्त पड़े रहने का सिलसिला चालू रखा। सारा अनुशासन बिगड़ गया। नील के आदेश को भी वे शराबी ऐसे ठुकरा देते कि अब मैंने उनमें से एक-दो को फांसी देने का निश्चय किया है, ऐसा उसने केनिंग को सूचित किया। इन अनंत संकटों से घिरी अंग्रेजी सेना जहां-की-तहां बंधी रह गई। कानपुर से तुरंत सहायता भेजने के संदेश-पर-संदेश आते रहे, फिर भी जनरल नील जैसे साहसी योद्धा को इलाहाबाद में जुलाई की पहली तारीख देखनी पड़ी। जनरल नील और उसकी फ्युजिलियर सेना मद्रास की ओर से आई हुई थी-यह बात महत्त्वपूर्ण है। यदि इस समय मद्रास की ओर विद्रोह की गप भी उड़ जाती तो अंग्रेजों को उसका तनाव सहना एक दिन भी असंभव हो जाता। परंतु इलाहाबाद के कृतनिश्चयी हिंदुस्थानी लोगों ने यद्यपि अंग्रेजी योद्धाओं को मानो कमरे में बंद करके मार डालने का इतना सफल प्रयास किया था, फिर भी अंग्रेजों को उससे डरने की वास्तविक आवश्यकता नहीं थी; क्योंकि मद्रास, बंबई, राजपुताना, पंजाब, नेपाल आदि सारा हिंदुस्थान अभी तक मृत-सा निश्चल पड़ा था, जब उसमें से कुछ भाग चैतन्य हुआ तो वह पिशाच बनकर विद्रोहियों पर ही टूट पड़ा। इलाहाबाद और बनारस में अंग्रेजों के साथ हजारों सिख सिपाही थे ही। फिर क्यों घबड़ाया जाए! दूसरे कुछ भी करें, पर इलाहाबाद के पंडों और मुल्लाओं ने, तालूकदार और किसानों ने, छात्रों और शिक्षकों ने दुकानदारों और ग्राहकों ने अनंत बाधाएं सामने खड़ी होते हुए भी सबको एक छाने के 1857 का स्वातंत्र्य समर – 172