भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 169, कुल 418 में से

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नीचे ला सके, ऐसा कोई करामती नेता न होते हुए भी और पराजय से लोगों में हताशा और अंधाधुंधी मची होते हुए भी, गुलामी के प्रति जो दीर्घ द्वेष प्रदर्शित किया और स्वराज्य एवं स्वतंत्रता के उच्च ध्येय के लिए जो स्वार्थ-त्याग किया इससे उन सब देशभक्तों के लिए इतिहास हमेशा-हमेशा गौरव गान ही करेगा। क्योंकि उन सब देशभक्तों को अंग्रेजी दासता के विरूद्ध उठ खड़े होने के लिए बहुत भारी मूल्य चुकाना पड़ा था।⁸¹ बनारस और इलाहाबाद प्रांत में जनरल नील ने जो क्रूर व्यवहार किया उसका जंगली इतिहास में भी कोई सही उदाहरण मिलना कठिन है। यह मैं आलंकारिक भाषा में नहीं लिख रहा, अंग्रेजों के ही वर्णन पढ़कर मेरी आत्मा यह कहती है। नील ने वृद्धों को जलाया, नील ने अर्भकों को जलाया, नील ने पलने में सो रहे मुन्ने को उसके पालने में और गोद में दूध पीते मुन्ने को उसकी मां की गोद में ही भून डाला। सैकड़ों स्त्रियों को, कुमारियों को, माताओं और पुत्रियों को-जिनकी संख्या भी न गिनी जा सके-जिंदा जला दिया। परमेश्वर और मनुष्य जाति के सामने मैं यह कथन कर रहा हूं। इसमें का एक अक्षर भी मिटाने की किसी में हिम्मत है तो वह सामने आकर 1857 का स्वातंत्र्य समर – 173 ⁸¹ एक ब्रिटिश अधिकारी ने अपने प्रयाग के क्रियाकलापों के संबंध में यह विवरण प्रस्तुत किया था-‘हां, यह प्रवास तो मुझे बहुत ही रूचिकर प्रतीत हुआ। जब सिख सैनिकों के साथ फ्युजिलियर्स सिपह्री नगर पर आक्रमण करने गए तो हम अपनी बंदूकों सहित जहाजों पर सवार हुए। जहाज चल रहा था और हम अपने दाएं-बाएं तटों पर गोलियों की बौछार करते आगे बढ़ रहे थे। जब हम एक खराब स्थान पर आए तो गोली वर्षा करते हुए ही तट पर उतर पड़े। मेरी दुनाली बंदूक से बरसती गोलियों का आहार अनेक 'काले' लोग बन रहे थे। मैं प्रतिशोध लेने की भावना से उन्मादग्रस्त-सा हो गया था। दाएं-बाएं और आसपास के स्थलों पर जब हमने अग्नि वर्षा की तो पवन के प्रवाह से भड़की अग्नि ज्वालाओं ने आकाश तक अपनी सैकड़ों जिह्वाएं फैला दीं। अब राजद्रोही दुष्टों से पूरा-पूरा प्रतिकार लिया जा रहा था। यह देखकर हम हर्ष और आनंद से सुधबुध भी खो बैठे। प्रतिदिन विद्रोहियों के ग्रामों को अग्नि की भेंट चढ़ाने के लिए हमारी टोलियां निकलती थीं और हम पूर्णतः प्रतिशोध ले रहे थे। मक्कारों ने सरकार और अफसरों के साथ अपराधपूर्ण व्यवहार किया था, उनकी जांच हेतु जिस समिति का गठन किया गया था, मैं उसका अध्यक्ष था। प्रतिदिन ही हम आठ-दस व्यक्तियों को तो निश्चित रूप से ही फंसाते थे। अब इन लोगों के प्राण हमारे चुंगल में थे। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि हमने किसी के भी प्रति तनिक सी भी उदारता का प्रदर्शन नहीं किया। पैरवी की प्रक्रिया तो बड़ी ही सामान्य सी थी। दंडित अपराधी को अपने गले में फंदा डालकर, एक गाड़ी पर चढ़ाकर वृक्ष से बांध दिया जाता था। गाड़ी को आगे बढ़ाया कि उसकी देह वृक्ष से झूल गई।"-चार्ल्स बाल कृत-'इंडियन म्यूटिनी, खंड 1, पृष्ठ 257 और ऐसा कितने दिन तक चलता रहा-"तीन मास तक आठ शव ढोनेवाली गाड़ियां सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक उन शवों को एकत्रित करने के लिए चक्कर लगाती थीं, जो राजमार्गों और बाजारों में लटकाए जाते थे। इस प्रकार लगभग छह हजार व्यक्तियों को सामान्य सुनवाई के उपरांत प्राणदंड देकर उन्हें चिर निद्रा में सुलाया गया था।" -के कृत-'इंडियन म्यूटिनी खंड 2, पृष्ठ 203

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