१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपर वह सुख के लिए नहीं-यह पवित्र कर्तव्य था, इसलिए किया गया, जनरल नील के सम्मान में यहां यह कहना होगा।''⁸² उपर्युक्त उद्धरण में निष्पक्ष इतिहास और सच्चे परमेश्वर को (नील के परमेश्वर को नहीं) यदि किसी के द्वारा की गई आम हत्याएं किसी को यथार्थ और न्यायपूर्ण लगती हों तो वह अंग्रेजों द्वारा की गई हत्याएं न होकर विप्लवकारियों द्वार की गई हत्याएं हैं। स्वतंत्रता के लिए की गई हत्याएं क्षम्य हैं या नहीं, इस प्रश्न का निर्णय परमेश्वर पर छोड़ दें-परमेश्वर मुझे क्षमा करे। क्योंकि मैं जो कर रहा हूं वह अपने देश का प्राकृतिक स्वराज्य प्राप्त करने के लिए है-यह वाक्य नील की अपेक्षा नाना साहब के मुंह से अधिक शोभा देता। स्वदेश के लिए विप्लवी लड़ रहे थे, अंग्रेज नहीं। इसीलिए क्रूर हत्याएं करते हुए यदि कोई पवित्र कर्तव्य कर रहा था तो वह स्वधर्म और स्वराज्य इस महान् उपलब्धि के लिए झगड़नेवाले और सौ वर्ष के अत्याचारों से पीड़ित मातृभूमि का प्रतिशोध लेने का तत्पर क्षुब्ध देशवासी ही थे। परंतु अब इस तत्त्वज्ञान का उपयोग ही क्या? नील ने इलाहाबाद में भयानक क्रूरता के जो बीज बोए उसकी फसल उधर कानपुर के खेतों में लहलहा उठी है। ऐसे समय में उस फसल की कटाई के लिए जल्दी से कानपुर की ओर जाना ही उचित है। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 175 ⁸² "वृद्ध व्यक्तियों ने तो हमें कोई हानि नहीं पहुंचाई थी। असहाय अबलाओं के आंचल से अबोध शिशुओं को भी हमारे प्रतिशोध की लपट उतनी ही प्रखरता से निगल गई थी जितनी तीव्रता से उसने घोर अपराधियों को चाटा था। किंतु उस परम श्रद्धेय नील के संबंध में यह तथ्य स्मरण रखना होगा कि ऐसे कठोर दंड देने में उसे तनिक सी भी सुखानुभूति नहीं होती थी, अपितु वह तो अपने कठोर दायित्व का पालन मात्र ही कर रहा था।'' -होम्स कृत-'सेपॉस वार', पृष्ठ 229-30