१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण-8 कानपुर और झाँसी दासता के नरक में पड़े अपने पितरों का उद्धार करने के पवित्र हेतु से अत्यंत वेग से बह रहे क्रांति भागीरथी के रक्त-प्रवाह को उत्तरी हिंदुस्थान के विस्तृत मैदान पर धमा-चौकड़ी करते छोड़कर अब कुछ देर हमें उस क्रांति भागीरथी के मुख्य स्रोत हरिद्वार में क्या चल रहा है-उसे देखना चाहिए। श्रीमंत नाना साहब के बाड़े में मेरठ के विस्फोट के समय जितने कार्यकर्ता इकट्ठे हुए थे उतने उस समय लखनऊ के राजमंदिर में, बरेली प्रांत में या स्वयं दिल्ली के दीवान-ए-खास में भी मिलने कठिन थे। इस ब्रह्मवर्त के महल में सन् 1857 की क्रांति का गर्भ संभव हुआ और वहीं वह गर्भ विकसित हो रहा था। वहीं उस विचार-गर्भ के द्रवीभूत रस का संगठन होने लगा और फिर पूर्ण गर्भ का उद्भव भी यदि यथाकाल ब्रह्मवर्त में ही होता तो निश्चय ही वह अल्पायु जीन होता। परंतु जब बीच में ही समय पूर्व मेरठ की गड़बड़ाहट से वह क्रांति गर्भ निकलकर बाहर आ गिरा तब उस कच्चे गर्भ का परित्याग न करते हुए उस कठिन परिस्थिति में ही उसकी उचित अभिवृद्धि करने के लिए इधर ब्रह्मवर्त क महल में क्रांति की तैयारी जोर-शोर से चल रही थी। उस महल में नाना साहब के भाई श्री बाबा साहब व श्री बाला साहब और उनके भतीजे श्री राव साहब अपने मालिक के क्रांति के उदात्त हेतु को सफल करने के लिए अपना तन-मन-धन अर्पण करने को तैयार थे। वैसे ही नाना के गुरु जिन्होंने खिदमतगार की अत्यंत कनिष्ठ स्थिति से अपनी दक्षता और चतुराई से अपने को राज्यमान्य के पद 1857 का स्वातंत्र्य समर - 176