भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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तक पहुंचाया था, जिन्होंने यूरोप खंड की राजनीति एवं संग्राम भूमि का अध्ययन कर अपनी स्वदेश भूमि को गुलामी से मुक्त करने के धर्मयुद्ध में उसका किस तरह उपयोग किया जाए-यह बड़ी चतुराई से प्रत्यक्ष अवलोकन किया था, जिन्होंने इस क्रांति का विस्तृत नक्शा सबसे पहले अपने मनःपटल पर बनाया था और जिन्होंने स्वयं मुसलमान होते हुए भी अपनी भारत माता की स्वतंत्रता के लिए एक हिंदू राजा के अभ्युदय के लिए अपना जीवन अर्पण कर ‘परैस्तु विग्रहे प्राप्ते वयं पंचशतोत्तरम्’ (संकट पड़ने पर हम एक सौ पांच हैं)-महाभारत के इस उपदेश की सार्थकता स्वाचरण से की थी, वे देशभक्त अजीमुल्ला खान भी फिरंगियों की गुलामी छोड़ने के लिए वहां हाथ में तिलांजलि लेकर खड़े थे। उसी महल में झाँसी की बिजली भी अपनी तेजपुंजता से उस गहरे अंधियारे में लगातार चमक मार रही थी। परंतु ऐसे इतिहास-प्रसिद्ध राजमहल के शस्त्रागार में कसौटी के पत्थर पर तलवार को धार लगाने में कौन सा योद्धा तल्लीन है-यह तो देखें जरा! प्रिय पाठक! शस्त्रागार में शमशीर को पानी चढ़ाने में तल्लीन वह सतेज मराठा तात्या टोपे है। शिव छत्रपति के अखाड़े का अंतिम जवां मर्द मराठा है यह। जवां मर्दी जिनमें होती है ऐसे बहुत लोग होते हैं, परंतु इस अंतिम मराठा है यह। जवां मर्दी जिनमें होती है ऐसे बहुत लोग होते हैं, परंतु इस अंतिम मराठा की जवां मर्दी अपनी स्वतंत्रता के लिए अपनी हिंद देवी की म्यान से बाहर निकाली हुई तलवार थी। तलवार मर गई, परंतु उसका ‘वार’ नहीं मरा-वह कभी मरनेवाला भी नहीं है। तात्या टोपे जैसी तलवार, जिसे काल द्वारा जीर्ण और शत्रु द्वारा विदीर्ण की हुई म्यान में से स्वेच्छा मात्र से निकाला जा सकता है, उस हिंद-भू की अक्षय कोख को नमस्कार करें। हिंदभूमि की इसी आदरणीय कोख से सन् 1814 के आसपास वीरवर तात्या टोपे का जन्म हुआ।83 उनके पिता का नाम पांडुरंग भट था। पांडुरंग भट को कुल आठ पुत्र थे और दूसरे पुत्र का नाम रघुनाथ था। यही रघुनाथ हिंदुस्थान के इतिहास के तारामंडल में ‘तात्या’ नाम से चमकता स्वतंत्रता का दिव्य तारा था। पांडुरंग राव टोपे देशस्थ ब्राह्मण थे और अंतिम बाजीराव के पास ब्रह्मवर्त में वे दानाध्यक्ष के पद पर थे। उस ब्रह्मवर्त को एक समय कितना अलभ्य लाभ हुआ था! उसके आंगन में नाना साहब, झाँसी की छबीली, तात्या टोपे आदि की समकालीन स्नेह लीला हुई थी। बचपन से ही श्रीमंत नाना की तात्या से बड़ी प्रीति थी। जिस महान् कार्य में उन्हें वीर चरित्र की भूमिका करनी थी उस महान् कृत्य की शिक्षा बाल वय से ही इन दोनों विभूतियों को सृष्टि देवी की ओर से एक ही शाला में दी जा रही थी। ‘रामायण’, ‘महाभारत’ के पारायण जिन्होंने एक साथ किए, मराठों की जवां मर्दी का इतिहास जिन्होंने एक साथ पढ़ा और उस वीर रस को पीकर उनके बाल-बाहू एक साथ ही 1857 का स्वातंत्र्य समर - 177 83 सन् 1849 में श्री तात्या टोपे अपनी जबानी कहते हैं-‘‘मेरा नाम तात्या टोपे हैं। मेरे पिताजी का नाम पांडुरंग है और मैं यवला परगना पालोडात, जिला नगर का निवासी हूं। मैं बिठूर में रहता हूं और मेरी आयु लगभग पैंतालीस वर्ष है और मैं नाना साहब की सेना में तैनात हूं।’’