भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 175

जाते थे और तारयंत्र कान से लगाए अंग्रेज उस संबंध में कैसे अज्ञानी रहते थे, यह अंग्रेज अधिकारियों के लिए बड़ा कूट प्रश्न था।84 कानपुर के नेटिव सिपाहियों को मेरठ में हुए विद्रोह का समाचार विद्रोह होने के बाद तार से सूचित करने की आवश्यकता नहीं थी। क्योंकि वह विद्रोह से एक दिन पूर्व ही जीवित तारों से ज्ञात हो चुका था। कानपुर के अंग्रेज अधिकारियों को जब यह समाचार विदित हुआ तब कानपुर शहर और सिपाहियों की पंक्तियों में क्या कुछ पक रहा है, इसका आभास उन्हें होने लगा। परंतु अद्भुत समाचार के कारण उत्पन्न चंचलता जनमानस से जल्दी ही निकल जाएगी इस आशा से सर हो व्हीलर काफी कुछ निश्चित थे। इधर कानपुर शहर और सिपाहियों में अंग्रेजी शासन की समाप्ति का समय पास आ गया है-यह हर कोई अनुभव करने लगा। हिंदू और मुसलमानों की होनेवाली बड़ी-बड़ी सभाएं, सिपाहियों की होने वाली गुप्त बैठकें, विद्यार्थियों और उनके शिक्षकों में चलनेवाले संवाद और बाजार व दुकानों-दुकानों में चर्चाओं आदि से लोकक्षोभ की चिनगारियां उड़ने लगी थी। फिरंगियों को मार डालने की बातें लोग राह चलते करने लगे थे और सिपाही अपने स्वदेशी सूबेदार के आदेशों को छोड़ दूसरों के आदेश टालने लगे। बाजार में एक अंग्रेज महिला कुछ वस्तुएं खरीदने हमेशा की ऐंठ में जा रही थी कि कोई राहगीर भौंहें चढ़ाए उसके पास आया और बोला, "अब यह ऐंठ बहुत हो गई। हिंदुस्थान के बाजार में एक अंग्रेज महिला कुछ वस्तुएं खरीदने हमेशा की ऐंठ में जा रही थी कि कोई राहगीर भौंहें चढ़ाए उसके पास आया और बोला, "अब यह ऐंठ बहुत हो गई। हिंदुस्थान के बाजार से अब आपकी जल्दी ही विदाई होने वाली है-समझीं?" अंग्रेजों को ऐसे कड़वे बोल सुनने का यह पहला ही अवसर था। अब ऐसे अवसर पर शांत बैठे रहने के कोई लाभ नहीं है, यह सोच कमांडर सर हो व्हीलर ने विद्रोह के पहले ही सुरक्षा की तैयारी आरंभ कर दी। सबसे पहले संकट के समय आश्रय मिल सके, ऐसा एक स्थान तैयार रहे, इस हेतु गंगा के दक्षिण और सिपाहियों की पंक्तियों के पास ही एक स्थान उसने चुना। उस स्थान को मजबूती देने के लिए चारदीवारों और तोपें रखने के लिए स्थान बनवाकर सर व्हीलर ने अनाज भरने का आदेश भी दिया। ऐसी अफवाह है कि नेटिव कांट्रेक्टर ने अनाज आदि रसद व्हीलर की नजर बचाकर ओदश से बहुत कम भरी थी। इस चारदीवारी से घिरे स्थान का उपयोग कर सिपाही विद्रोह करें तो भी अधिक नहीं करना पड़ेगा-ऐसा भरोसा व्हीलर और अन्य अंग्रेज अधिकारियों को था। क्योंकि अन्य स्थानों की तरह ही कानपुर के सिपाही भी जगह-जगह मारकाट न कर दिल्ली की ओर ही निकल जाएंगे और उनके दिल्ली की ओर बढ़ते ही गंगा उतरकर इलाहाबाद में अंग्रेजी सेना से 1857 का स्वातंत्र्य समर - 179 84 1. वस्तुतः इस विद्रोह की एक उल्लेखनीय बात यह है कि अत्यंत निश्चित तथा नितांत वेग सहित सुदूर स्थित स्थानों के समाचार भारतीय सैनिकों तथा अन्य लोगों को किस प्रकार हो जाते थे। सामान्य संदेश प्रेषण का प्रमुख माध्यम हरकारे ही थे, जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर असाधारण फुरती सहित संदेश पहुंचाते थे।" देखें-'मिलिट्री नैरेटिव्स', पृष्ठ 23 2. नानकचंद की डायरी।