१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
जाते थे और तारयंत्र कान से लगाए अंग्रेज उस संबंध में कैसे अज्ञानी रहते थे, यह अंग्रेज अधिकारियों के लिए बड़ा कूट प्रश्न था।84 कानपुर के नेटिव सिपाहियों को मेरठ में हुए विद्रोह का समाचार विद्रोह होने के बाद तार से सूचित करने की आवश्यकता नहीं थी। क्योंकि वह विद्रोह से एक दिन पूर्व ही जीवित तारों से ज्ञात हो चुका था। कानपुर के अंग्रेज अधिकारियों को जब यह समाचार विदित हुआ तब कानपुर शहर और सिपाहियों की पंक्तियों में क्या कुछ पक रहा है, इसका आभास उन्हें होने लगा। परंतु अद्भुत समाचार के कारण उत्पन्न चंचलता जनमानस से जल्दी ही निकल जाएगी इस आशा से सर हो व्हीलर काफी कुछ निश्चित थे। इधर कानपुर शहर और सिपाहियों में अंग्रेजी शासन की समाप्ति का समय पास आ गया है-यह हर कोई अनुभव करने लगा। हिंदू और मुसलमानों की होनेवाली बड़ी-बड़ी सभाएं, सिपाहियों की होने वाली गुप्त बैठकें, विद्यार्थियों और उनके शिक्षकों में चलनेवाले संवाद और बाजार व दुकानों-दुकानों में चर्चाओं आदि से लोकक्षोभ की चिनगारियां उड़ने लगी थी। फिरंगियों को मार डालने की बातें लोग राह चलते करने लगे थे और सिपाही अपने स्वदेशी सूबेदार के आदेशों को छोड़ दूसरों के आदेश टालने लगे। बाजार में एक अंग्रेज महिला कुछ वस्तुएं खरीदने हमेशा की ऐंठ में जा रही थी कि कोई राहगीर भौंहें चढ़ाए उसके पास आया और बोला, "अब यह ऐंठ बहुत हो गई। हिंदुस्थान के बाजार में एक अंग्रेज महिला कुछ वस्तुएं खरीदने हमेशा की ऐंठ में जा रही थी कि कोई राहगीर भौंहें चढ़ाए उसके पास आया और बोला, "अब यह ऐंठ बहुत हो गई। हिंदुस्थान के बाजार से अब आपकी जल्दी ही विदाई होने वाली है-समझीं?" अंग्रेजों को ऐसे कड़वे बोल सुनने का यह पहला ही अवसर था। अब ऐसे अवसर पर शांत बैठे रहने के कोई लाभ नहीं है, यह सोच कमांडर सर हो व्हीलर ने विद्रोह के पहले ही सुरक्षा की तैयारी आरंभ कर दी। सबसे पहले संकट के समय आश्रय मिल सके, ऐसा एक स्थान तैयार रहे, इस हेतु गंगा के दक्षिण और सिपाहियों की पंक्तियों के पास ही एक स्थान उसने चुना। उस स्थान को मजबूती देने के लिए चारदीवारों और तोपें रखने के लिए स्थान बनवाकर सर व्हीलर ने अनाज भरने का आदेश भी दिया। ऐसी अफवाह है कि नेटिव कांट्रेक्टर ने अनाज आदि रसद व्हीलर की नजर बचाकर ओदश से बहुत कम भरी थी। इस चारदीवारी से घिरे स्थान का उपयोग कर सिपाही विद्रोह करें तो भी अधिक नहीं करना पड़ेगा-ऐसा भरोसा व्हीलर और अन्य अंग्रेज अधिकारियों को था। क्योंकि अन्य स्थानों की तरह ही कानपुर के सिपाही भी जगह-जगह मारकाट न कर दिल्ली की ओर ही निकल जाएंगे और उनके दिल्ली की ओर बढ़ते ही गंगा उतरकर इलाहाबाद में अंग्रेजी सेना से 1857 का स्वातंत्र्य समर - 179 84 1. वस्तुतः इस विद्रोह की एक उल्लेखनीय बात यह है कि अत्यंत निश्चित तथा नितांत वेग सहित सुदूर स्थित स्थानों के समाचार भारतीय सैनिकों तथा अन्य लोगों को किस प्रकार हो जाते थे। सामान्य संदेश प्रेषण का प्रमुख माध्यम हरकारे ही थे, जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर असाधारण फुरती सहित संदेश पहुंचाते थे।" देखें-'मिलिट्री नैरेटिव्स', पृष्ठ 23 2. नानकचंद की डायरी।
मिलने का सुअवसर उन्हें मिल जाएगा, यह उनकी पक्की धारणा थी। कानपुर के अंग्रेज लोगों की सुरक्षा के लिए चारदीवारी का मजबूत स्थान बनाकर ही व्हीलर चुप नहीं बैठा और उसने लखनऊ में सर हेनरी लॉरेंस ही सहायता के लिए चिल्ला रहा था। फिर भी उसने चौरासी गोरे सोल्जर, लेफ्टिनेंट ॲशे के नेतृत्व में गोरा तोपखाना और कुछ घुड़सवार-इतनी सेना कानपुर की ओर तुरंत भेजी। अंग्रेज लोगों की सुरक्षा के लिए सर व्हीलर ने ये दो उपाय किए, यह कोई विशेष बात नहीं थी। परंतु अंग्रेजी के हिंदुस्थानी शासन पर आया यह संकट टालने के लिए उसने जिस तीसरी युक्ति की योजना की थी, उसके जैसी अब अद्भुत लगनेवाली, परंतु उस समय की क्रांति रचना के कौशल की यथार्थ कल्पना देनेवाली ऐसी दूसरी विलक्षण बात इस इतिहास में नहीं लिखी गई उसकी प्रार्थना थी। मेरठ का आकस्मिक समाचार सुनते ही लश्कर के छोटे सिपाहियों और बाजार के साधारण लोगों में तत्काल चंचलता और क्षोभ उत्पन्न हो गया था। परंतु ब्रह्मवर्त का समुद्र पहले जितना शांत, गंभीर और सहनशील दिखाई देता था उतना ह ीवह आज भी था। उसके हृदय में घुमड़ते प्रचंड बादलों का संकेत उसके जलपृष्ठ पर रत्ती भर दिखना असंभव था। कानपुर की सेना की चंचलता से सर व्हीलर चौंका था, फिर भी उसे इसकी तिल भर शंका नहीं हुई कि ब्रह्मवर्त का राजा अपने विरुद्ध है। जिसके मस्तक का मुकुट अभी क्षण भर पहले पैरों से कुचला है, एक क्षण पहले ही जिस नाना की पूछ को जान-बूझकर मसला है, उसी नाना को अंग्रेजों ने अपनी सुरक्षा की विनती कर कानपुर बुलाया। नाना सहनशील हिंदू है, वह मन में द्वेष पालनेवाला जहरीला नाग नहीं, ऐसा अंग्रेजों को लगता था तो कोई एकदम गलता भी नहीं था। क्योंकि आज तक अंग्रेजों को लगता था तो कोई एकदम गलत भी नहीं था। क्योंकि आज तक अंग्रेजों के पैरों तले कुचले, निर्जीव, निरुपद्रवी और नपुंसक केंचुए क्या हिंदुस्थान में कम थे? उन्हीं केंचुओं जैसा केंचुआ नाना भी होगा, इस भ्रम में पड़कर ही सर व्हीलर ने ब्रह्मवर्त की बांबी में बैठे नाग को और चाहिए ही क्या था! उसने दो तोपें, तीन सौ निजी सिपाही, पैदल और घुड़सवारों के साथ दिनांक 22 मई को कानपुर में प्रवेश किया। कानपुर में अंग्रेजी सैनिक और असैनिक अधिकारियों की बहुत बड़ी बस्ती थी-उसी के बीचोबीच जाकर नाना ने अपना शिविर बनाया। कानपुर में विप्लव होते ही पहला हमला खजाने पर होगा, तो उसकी सुरक्षा की क्या व्यवस्था हो? अच्छा तो खजाना दे दो नाना के कब्जे में। बारूदखाना और शस्त्रागार की सुरक्षा? इन्हें नी नाना की निगरानी में रहने दो। जल्दी ही इस निगरानी में नाना के दो सौ सिपाहियों का पहरा बैठ गया। कलेक्टर हिल बर्डन ने नाना और तात्या को धन्यवाद एि; और सारी अंग्रेज महिलाएं 1857 का स्वातंत्र्य समर - 180
और बच्चे चाहें तो ब्रह्मवर्त के राजमहल में जाकर रहें, यहां तक बातें होने लगीं। इसी का नाम है मराठी कावा (दाँव)! अंग्रेजों की सुरक्षा करने और स्वदेश-स्वतंत्रता के लिए युद्धरत अपने सगे भाइयों से लड़ने सेना-तोपखाने के साथ नाना को कानपुर बुलाया गया। अंग्रेजी बस्ती में उनका शिविर लगा। अंग्रेज उन्हें लाखों रूपयों का खजाना सौंप दे और इस तरह सहायता देने के लिए धन्यवाद दे-इसी सबका नाम है मराठी दाँ! और ये सारे बातें उस प्रचंड विस्फोट के एक हफ्ते पहले की हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि सन् 1857 में अंग्रेज सरकार को अंधकार में टटोलते रखकर एकाएक कैसे गड्ढे में गिराया गया। स्वतंत्रता की अनिवार्य इच्छा-यही साध्य और उसकी प्राप्ति हेतु संग्राम-यह साधन। इन दो बातों का स्पष्ट ज्ञान सारे समाज को दिया हुआ था। परंतु उसका नेता कौन हो? विद्रोह का पक्का दिन कौन सा हो? क्रांति के मुख्य केंद्र कहां होंगे? ये सब बातें इतनी चतुराई से गुप्त रखी गई थीं कि उसकी भनक अंग्रेजों को तो खैर क्या होती, उस जनसमूह को भी पक्की पता नहीं थी। मुख्य गुप्त केंद्र के नेता और उनके विश्वसनीय सहयोगियों को ही पूरे नाम आदि की जानकारी थी। पीछे कहा था कि हर रेजिमेंट में एक समिति बनाई गई थी, उसका भेद भी यही था। काशी में पकड़े गए पत्र में एक नेता की ओर से इतने ही हस्ताक्षर थे। इस क्रांति रचना के अनुरूप ऐसा ही व्यवहार उसके उत्तरदायी नेताओं की ओर से रखा गया था। दिल्ली के बादशाह, झाँसी की रानी या नाना साहब की योजना के बारे में विद्रोह होने के पहले दिन तक अंग्रेजों को तिनके के बराबर भी भनक नहीं मिली। परंतु इस सब में ब्रह्मवर्त के बाड़े की विशेष करामात! इतिहासकार 'के' कहता है-'मराठा राज्य-संस्थापक शिवाजी के चरित्र का अध्ययन नाना ने यों ही नहीं किया था। कानपुर में गुप्त मंडली का जो, जाल बिछा था उसका मुख्य केंद्र सूबेदार टीका सिंह के घर में स्थापित था। बैठक करने का दूसरा स्थान शम्सुद्दीन खान सिपाही के घर में था।85 इन गुप्त बैठकों में होनेवाली मंत्रणा में नाना की ओर से ज्वाला प्रसाद और महमूद अली नामक ब्रह्मवर्त के राजमहल के विश्वसनीय नौकर उपस्थित रहते थे। सूबेदार टीका सिंह और ज्वाला प्रसाद की सहायता, उत्कट स्वातंत्र्य इच्छा और निष्कलंक सच्चाई के कारण सारी सभा पर उनका प्रभाव था और इस सभा के निर्णयों के अनुसार सेना एकमत से व्यवहार करे, यह निश्चित था। इस कारण सूबेदार टीका सिंह का जो मत होता वही सारी सेना का होता था। ऐसे नेता और नाना की भेंट होना, आमने-सामने 1857 का स्वातंत्र्य समर - 181 85 कानपुर में विद्रोह शांत हो जाने पर एकत्रित साक्ष्य तथा नानकचंद नामक एक वकील की डायरी-इन दो आधारों पर G. D. Trevelyan द्वारा लिखित 'Cawnpore' नामक पुस्तक से उपर्युक्त सारी जानकारी ली गई है । इन सबूतों से भी उस समय की परिस्थितियों की कल्पना करना बहुत कठिन नहीं है।
सारी बातें होना अति आवश्यक था। उसमें भी मेरठ के आकस्मिक विद्रोह से अस्त-व्यस्त हुए कार्यक्रम को फिर से एक बार सही करना अनिवार्य था, इसलिए नाना की और सूबेदार टीका सिंह की भेंट निश्चित हुई। पहली भेंट में सूबेदार और नाना की मंत्रणा बहुत देर तक हुई। "सेना के हिंदू और मुसलमान-ये दोनों ही स्वराज्य और स्वधर्म के लिए एकमत से विद्रोह करने को सज्जित हो गए हैं और हमव ह करने के लिए तैयार हैं।" सूबेदार के ऐसा विश्वास दिलाने पर अन्य फुटकर बातें निश्चित करने को दूसरी अधिक सावधान और सावकाश भेंट की बात निश्चित कर सूबेदार वापस लौटे। जून की पहली तारीख को संध्या समय श्रीमंत नाना अपने बंधु बाला साहब और मंत्री अजीमुल्ला खान के साथ गंगा किनारे आए। सूबेदार टीका सिंह अपनी केंद्र मंडली के साथ वहां आए हुए थे ही।ये सारे लोग एक नाव में बैठकर में बैठकर गंगा के सुधा धवल जलाशय में घुस गए। अपने स्वदेश-संरक्षण के लिए घनघोर संग्राम करने की प्रतिज्ञा उस गंगाजल को हथ में लेकर करने के बाद कोई दो-तीन घंटे तक उनकी चर्चा चलती रही। भावी कार्यक्रम का पक्का निर्णय हो जाने पर वे सब लोग लौट आए। उनकी वहां क्या चर्चा हुई, यह गंगा नदी के पाट को ही ज्ञात होगा। इतना सच है कि दूसरे दिन शम्सुद्दीन ने अपनी प्रियतमा को यह स्वतंत्रता का समाचार यूंह ी नहीं सुनाया था। क्योंकि स्वराज्य के लिए शम्सुद्दीन की आत्मा जितनी फड़फड़ा रही थी उतनी ही इस सुंदरी की भी। अजीजन सिपाहियों की अतिप्रिय संग्राम के बाजार में देशप्रेम के पुरस्कार के रूप में बांटना शुरू कर दिया था। अपने सुंदर मुख और भृकुटी की एक-एक सिकुड़न से उसने अनेक भगोड़ों को फिर से रण में भेजा है, यह किस्सा शीघ्र ही आगे आएगा। क्रांति पक्ष की योजनाएं इधर इस ऊंचाई तक पहुंच रही थी और उधर अंग्रेज लोगों को हर नए पल इतनी घबराहट हो रही थी कि क्या पूछने? लखनऊ से सहायता आने और श्रीमंत नाना साहब की सुरक्षा में खजाना एवं गोला-बारूद पहुंच जाने के बाद सर व्हीलर के मन को थोड़ा धीरज बंधा था। पर अंग्रेज बस्ती को बिल्कुल धीरज नहीं था। 24 मई को मुसलमानों की ईद थी। उस दिन सब ओर विद्रोह होगा-ऐसा डर हर शहरी अंग्रेज को था। परंतु ऐसे सहज ध्यान में आ जानेवाले दिन सार्वजनिक विद्रोह होगा, ऐसा सहज में लग सकता है उस दिन शांति बनाए रखना और जिस दिन विद्रोह होने की बिल्कुल भी संभावना न हो उस दिन उछल पड़ना-ये दांव-घात ही तो विद्रोह की सफलता के मुख्य कारण थे, इसीलिए कानपुर में ईद के महोत्सव में किंचित् भी गड़बड़ी नहीं होने दी गई। उस दिन सुबह आंग्रेज इतना घबराया हुआ था 1857 का स्वातंत्र्य समर — 182
कि सर व्हीलर ने लखनऊ को तार भेजा-“आज विद्रोह किसी भी तरह नहीं रुक सकता। परंतु इस महोत्सव के दिन शाम को जब सारे मुसलमानों ने परंपरा के अनुसार साहब लोगों से ईद मिलन किया तब सर व्हीलर को फिर से एक बार बहुत संतोष हुआ। परंपरा के अनुसार रानी के जन्मदिन पर उसे तोपों की सलामी दी जाती थी, परंतु कदाचित् उस आवाज से सिपाहियों में बेकार ही गड़बड़ी होगी, इसलिए वह सलामी नहीं दी गई। अंग्रेजों की महारानी में बेकार ही गड़बड़ी होगी, इसलिए वह सलामी नहीं दी गई। अंग्रेजों की महारानी को उसके जन्मदिन पर स्वयं उसकी सेना में ही सलामी देने की शक्ति न हो, इसके लिए बहुत से अंग्रेज अधिकारियों को बड़ा दुःख हुआ। पर क्या करते बेचारे! विद्रोह होने पर सुरक्षा के लिए जो चारदीवारी का स्थान बनाया गया था-जैसा पीछे कहा है-उस स्थान क ओर ध्यान दें तो अंग्रेजों के कैसी दयनीय स्थिति हो गई थी, यह तत्काल समझ में आ जाता है। 'भेड़िया आया रे भेड़िया', ऐसी गप यदि कोई उड़ा सकता तो अंग्रेजों के परिवार अस्त-व्यस्त दौड़-भाग करने लगते। एक अंग्रेज अधिकारी लिखता है-
“मैं जब वहां था तो मैंने देखा कि बघियों, गाड़ियों, डोलियों आदि सवारियों की भीड़ सहसा ही लग जाती थी और उनमें लेखकों, व्यापारियों, महिलाओं-जो बालकों को छाती से चिपकाए होती थी-बालकों, धायों और अधिकारियों आदि सभी को पहुंचा दिया जाता था। सार रूप में कहा जाए तो यह कहना उपयुक्त होगा कि ज्यों कि किसी प्रकार के उपद्रव की आशंका होती अथवा समाचार प्राप्त होता तो वहां हमारा अभिनंदन करनेवाला भी कोई न होता; क्योंकि उपर्युक्त दृश्यों से हम भारतीयों को यह स्पष्टतः दिखा चुके थे कि हम कितने कायर हैं और हमारी दशा कितनी दयनीय हैं।‘’
अंग्रेजों द्वारा अपने व्यवहार से दर्शाया गया यह डरपोकपन, उपर्युक्त अधिकारी कहता है वैसे वास्तव में नेटिवों ने पहचान लिया था। परंतु वह कोई आज की की नई बात नहीं। जब चारदीवारी बनाने का काम प्रारंभ हुआ, तभी अजीमुल्ला खान ने एक लेफ्टिनेंट से मुसकराते हुए यही तो कहा था। उस लेफ्टिनेंट से अजीमुल्ला खान ने अपनी हमेशा जैसी मधुर वाणी में पूछा, “सच में अभी मुझे ठीक के सूझता नहीं है।” आंखें मटकाते उस चतुर अजीमुल्ला खाने ने कहा, “रख लीजिए-‘निराशा का किला’।”
मई के अंत में एक दिन एक शरारती तरूण अंग्रेज ने शराब के नशे में एक सिपाही पर गोली चला दी। यह गोली चूक गई और उस सिपाही ने सोल्जर को निरपराध मान छोड़ दिया गया और कहा गया कि शराब के नशे में बंदूक गलती से चल गई।
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यह हमेशा का निर्णय था, पर अब स्थिति हमेशा की नहीं थी। 86 यह अपमानजनक समाचार फैलते ही सारी सेना गुर्राने लगी-‘ठीक है! हमारी बंदूकें भी अब जल्दी ही गलती से`चल जाएंगी।´’ यह वाक्य सिपाहियों के बीच एक उत्क्षोभक नरसिंह मंत्र ही हो गया था। एक-दूसरे को मिलते ही 'अब बंदूक गलती से चलेगी ना!' ऐसी व्यंग्यात्मक सलामी सेना में दी जाने लगी। फिर भी मेरठ की तरह जल्दी न कर संकेत समय आने तक उन्होंने सारा गुस्सा मन-ही-मन पी जाने का निश्चय किया था। इस भयानकता को और भयानक करने के लिए ही शायद उसी समय एक अंग्रेज और उसकी पत्नी-दोनों के शव गंगा प्रवाह में बहते-बहते कानपुर आ गए। ऊपर किसी शहर के विद्रोहियों के लिए कृत्य का साक्ष्य कानपुर से क्या-क्या भयंकर संवाद करेगा? गंगा को अभी ऐसे कितने ही शव बहाने हैं। 'भेड़िया आया रे भेड़िया'-ऐसी अफवाह उड़ाकर अब तक अंग्रेजों का इतनी बार चकित किया गया था कि अब यदि भेड़िया आया तो भी वे सचमुच सोते रहनेवाले थे। जून क पहली तारीख को स्वयं सर हो व्हीलर लॉर्ड केनिंग को लिखता है-“क्षोभ और डर रहा नहीं। कानपुर सुरक्षित है। इतना ही नहीं, मैं लखनऊ को जल्दी ही सहायता भेजे देता हूं।´´ इलाहाबाद से आई हुई गोरी फौज वास्तव में लखनऊ की ओर जाने लगी और वह भी कब? 3 जून को। जिस षड्यंत्र में तीन हजार सिपाही और वेश्या सहित कानपुर का सारा शहर लगा हुआ था उस षड्यंत्र में तीन हजार सिपाही और वेश्या सहित कानपुर का सारा शहर लगा हुआ था उस षड्यंत्र का समाचार अंग्रेजों और उनकी सहायता करनेवाले नानकचंद जैसे कुल्हाड़ी के बेंटे से भी इतनी मुहरबंद रहे-यह कितना बड़ा आश्चर्य था! यह मुहर 4 जून की रात को टूटी। सार्वजनिक कार्यक्रम के अनुरूप रात के अंधेरे में कुछ बंदूकें चलीं और निश्चित भवनों को आग लगी। रक्तपात, नाश और मृत्यु की दौड़ शुरू हो जाने की वह करतल ध्वनि थी। सबसे पहले टीका सिंह का घोड़ा कर्कश रीति से हिनहिनाया और उसी के साथ हजारों घोड़ें एक क्षण में टापों की आवाज करते सरपट दौड़ते निकले। कुछ अंग्रेजी पगड़ियों और घरों को आग लगाने निकले, कुछ अन्य रेजिमेंटों को बुलाने गए और कुछ लश्करी निशानों और झंडों को कब्जें में लेने निकले। ये झंडे जिसके कब्जे में थे, वह वृद्ध सूबेदार मेजर नेटिव होते हुए भी विद्रोहियों के विरूद्ध जाता-सा दिखाई दिया, अतः एक तलवार का वार उसके सिर पर पड़ा और 1857 का स्वातंत्र्य समर - 184 86 ट्रेवेलियन ने लिखा है-“निम्न स्तर के यूरोपियनों की क्रूरता तथा सैनिक अधिकारियों द्वारा न्याय के नाम पर की जानेवाली धींगामस्ती से सिपाही भलीभांति परिचित थे। किसी अन्य अवसर पर तो संभवतः उन्हें इस प्रकार के न्याय पर किसी प्रकार का आश्चर्य न होता; किंतु अब तो उनका रक्त खौल उठा था, उनका आत्माभिमान जाग्रत् हो चुका था, जिससे किसी एंग्लो-सेक्सन वंशज को ऐसा अधिकार एवं सैनिक न्यायलय की विवेचना शक्ति की प्रखरता को मान्यता देने के लिए वे तत्पर नहीं थे।” -'कानपुर', पृष्ठ 93
तुरंत उसका धड़ नीचे गिर गया। "पहली पैदल रेजिमेंट के सूबेदार को सूबेदार टीका सिंह का सलाम है और वह पूछता है, घुड़सवार फिरंगियों के विरूद्ध चल पड़े हैं फिर पैदल को देर क्यों?" दो घुड़सवारों के यह सुनाते ही पहली पैदल रेजिमेंट 'दीन और देश' कहते बाहर निकली। यह देखते ही उसका अधिकारी कर्नल एवर्ट कहने लगा-'हां-हां, मेरे प्रिय बच्चों, (बाबा लोगों) यह क्या? यह तुम्हारे राजनिष्ठ शील को शोभा नहीं देता। ठहरो बच्चों, ठहरो!! कहां का ठहरो और क्या! कुछ ही देर में वह सारी रेजिमेंट सैनिक अनुशासन में घुड़सवारों से जाकर मिल गई और फिर सारी सेना नवाबगंज की नाना की छावनी की ओर युद्ध गीत गाते हुए निकली! नवाबगंज खजाने पर नाना के सिपाही तैयार थे। उन्होंने सामने से आते स्वदेश बंधुओं को बाहुओं में जकड़ लिया और तभी वह लाखों रूपयों स भरा खजाना और लाखों शस्त्रास्त्र से भरा बारूदखाना क्रांतिकारियों के हाथ आ गया। नवाबगंज में रात को यह हो रहा था, तभी उधर जो दो रेजिमेंट बाकी थीं-कम-से-कम उन्हें कब्जे में रखने के लिए अंग्रेजों ने तत्काल परेड पर बुलाया। अंग्रेजों के हाथ में तोपखाना होने से वे दोनों रेजिमेंट उस सारी रात परेड पर अपने यूरोपियन अधिकारियों के साथ सशस्त्र खड़ी रहीं। सूर्योदय होते ही यूरोपियन अधिकारियों को विश्वास हो गया कि ये सिपाही तो कम-से-कम विद्रोही नहीं हैं। इसलिए उन्हें फिर से लाइन में जाने की अनुमति दी गई। और यूरोपियन अधिकारी भी जाने लगे। अब सही अवसर आ गया है, यह जान उनमें से एक ने आगे बढ़ चिल्लाकर कहा, "ईश्वर सत्य की ओर है। भाइयो, उठो, चलो!" यह आदेश होते ही इधर-उधर तलवारें बजने लगीं और अंतिम समय आया जान अंग्रेजी तोपें भी चलने लगीं। परंतु सिपाही अब उनकी मार के बाहर निकल गए थे। इस समय अंग्रेज अधिकारियों को काट डालना संभव होते हुए भी सिपाहियों ने उन्हें नहीं छेड़ा और वे अवसर मिलते ही अपने देशबंधुओं की ओर निकल गए। और इस तरह 5 जून को कानपुर के तीन हजार सिपाही अंग्रेजी गुलामी को फेंककर नवाबगंज में नाना की छावनी के पास जाकर जमा हो गए। यह समाचार सुन सर व्हीलर को एक तरह का संतोष हुआ कि एक भी अंग्रेज मरा नहीं। अब रीति के अनुसार सिपाही दिल्ली की ओर निकल जाएं तो समझो, कानपुर के ऊपर से जान का संकट टल गया। अन्य स्थलों की तरह यदि योग्य और कर्मठ नेताओं की कानपुर में भी कमी होती तो सर व्हीलर के अनुमान के अनुसार सिपाही दिल्ली की ओर निकल जाते। परंतु उस समय नवाबगंज में सिरमौर नेताओं की कोई कमी नहीं थी। वहां श्रीमंत नाना साहब थे, वहां श्री बाबा साहब, बाला साहब और राव साहब पेशवा थे। वहां तात्या टोपे थे। वहां अजीमुल्ला खान थे। इतनी अलग-अलग शक्तियां सौभाग्य से एक स्थान पर होने पर सिपाहियों को नेताओं की खोज में दिल्ली की ओर जाने का कोई कारण नहीं था। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 185
विद्रोह की शुरूआत में ही सारी सेना दिल्ली में ही जमा हो जाए तो वास्तविक कार्यक्रम सिद्ध नहीं होना था। स्थान-स्थान पर अंग्रेजी की खिंचाई करने में ही भला था। उसमें भी कानपुर, पंजाब, कलकत्ता और दिल्ली प्रांत के बीच की कड़ी होने से उसपर आघात कर अंग्रेजी यातायात को तोड़ना अति आवश्यक था। ये सारी बातें सिपाहियों को उनके सूबेदारों एवं नाना के मंत्रियों के समझाने पर कानपुर की ओर ही वापस लौटने की योजना सर्वसम्मति से बनी। उन तीन हजार सिपाहियों ने श्रीमंत नाना साहब को अपना राजा चुना और उनके प्रत्यक्ष दर्शन की तीव्र इच्छा प्रदर्शित की। श्रीमंत नाना साहब को देखते ही उनके नाम से सब ओर जयघोष होने लगा और उन सभी ने उस स्वयं वृणीत महाराजा के भक्तिभाव से मुजरे किए। श्रेष्ठ का चयन होते ही नाना की सहमति से अपने लश्करी अधिकारी चुनने का काम शुरू हुआ। लश्कर के सारे नए नियम प्रचारित किए गए। कानपुर के क्रांति केंद्र के प्राण सूबेदार टीका सिंह को उसके जनरल का पद दिया गया। वैसे ही जमादार दलगंजन सिंह को 53वीं रेजिमेंट का कर्नल और सूबेदार गंगादीन को 56वीं रेजिमेंट का कर्नल नियुक्त किया गया। फिर हाथी की पीठ पर एक बड़ा भारी स्वातंत्र्य ध्वज खड़ा कर उसका जंगी जुलूस निकाला गया और उस दिन से श्रीमंत नाना साहब पेशवा का शासन आरंभ हो जाने की घोषणा कर दी गई। परंतु यह चुनाव होते ही श्रीमंत नाना ने एक क्षण भी गंवाया नहीं और विप्लवी सिपाही दिल्ली की ओर न जाकर बीच में ही रूक गए हैं, यह समाचार सुनते ही जनरल व्हीलर सहित सारे अंग्रेज लोग अपनी उस चारदीवारी के किले में जाकर और तोपें तानकार बैठ गए। उनके पुरूष, महिला, बच्चे मिलकर संख्या कोई 1,000 थी। वह किला जीतना सबसे पहला कर्तव्य था, अतः श्रीमंत नाना ने सारी सेना को उधर चलने का आदेश दिया। विप्लवी उनपर हमला करेंगे, यह विश्वास अंग्रेजों को न था। परंतु 6 जून की भोर में एक चिट्ठी सर व्हीलर को मिली। वह चिट्ठी श्रीमंत नाना ने ही भेजी थी और वह ऐसी थी- "हम जल्दी ही आक्रमण करने वाले हैं, आपको उसकी अग्रिम सूचना जानबूझकर भेजी है।" हम जल्दी ही आक्रमण करने वाले हैं, आपको उसकी अग्रिम सूचना जानबूझकर भेजी है।" यह लड़ाई का आह्वान पाते ही सर व्हीलर ने सारे अधिकारियों और सोल्जरों को सज्जित कर स्थान-स्थान पर नियुक्त किया। तोपों पर गोलंदाज बत्ती के साथ बैठ गए और लड़ाई की यथासंभव तैयारी कर ली गई। लड़ाई प्रारंभ करने से पहले श्रीमंत नाना ने अंग्रेजों को, किसी भी प्रकार की विशेष आवश्यकता न होते हुए भी, अग्रिम लिखित सूचना दी थी। यह बात अति महत्त्व की है। अंग्रेज यदि नाना के स्थान पर होते तो इतनी उदारता उन्होंने निश्चित ही न दिखाई होती। श्रीमंत नाना के नाम पर अमानुषता का दाग लगाना चाहनेवाले लोगों को उनके हृदय की यह सहज वीरता देख लज्जा से सिर झुका लेना चाहिए। कानपुर विद्रोह के 1857 का स्वातंत्र्य समर - 186
प्रारंभ में अंग्रेज अधिकारियों को दिया जीवनदान और आक्रमण करने के बारह घंटे पूर्व दी गई लिखित सूचना-प्रारंभ की ये दो बातें ही ध्यान में रखकर फिर अंतिम लड़ाई का अध्ययन किया जाए तो कानपुर की खरी स्थिति स्पष्ट हो जाती है। अंग्रेजों को लड़ाई की सूचना भिजवाते ही सूबेदार टीका सिंह-अब जनरल टीका सिंह-बारूदखाने की ओर गए और वहां सेवरा होने तक शस्त्रास्त्र की व्यवस्था देखी। वे उसे आक्रमण के स्थान पर भेजने में लगे रहे। उस शस्त्रागार से तोपें और बारूद नदी और जमीन से अंग्रेजों की चारदीवारी तक ले जाया गया औरवहां लश्करी कौशल से उसकी रचना भी की गई। इसी समय कानपुर शहर में दंगा हो गया था। बाजार का हर छोटा-बड़ा कारीगर-हम्माल से लेकर सेठ-महाजन तक-हाथ में जो मिले उसे लेकर यूरोपियन लोगों को खोजते फिर रहे थे। कचहरी, कोर्ट और उसके अंदर के सारे अंग्रेजी नए-पुराने दफ्तर जला दिए गए और चारदीवारी में जो यूरोपियन नहीं पहुंचे थे उन्हें एक साथ मार डाला गया। इस तरह दोपहर के बारह बज गए। एक बजने तक अंग्रेजों की चारदीवारी को घेरा जाने लगा और शाम तक तोपों की गर्जना के साथ वह भयानक युद्ध निश्चित से प्रारंभ हुआ। अंग्रेजों के साथ आठ तोपें थीं और उन्होंने विपुल गोला-बारूद चारदीवारी के अंदर पहले से ही गाड़ रखा था। विद्रोहियों के हाथ में पूरा बारूदखाना, शस्त्रागार और बड़ी-बड़ी तोपें लग जाने से उन्हें भी सामग्री की कोई कमी नहीं थी। जनरल टीका सिंह ने पहले से तोपखाने की व्यवस्था अति उत्तम रखी थी। उनकी तोपों की भारी मार से अंग्रेजों की चारदीवारी के अंद के भवन धड़ाधड़ गिर रहे थे। 7 जून को जब विद्रोहियों की ओर से लगातार गोले बरसने लगे तब उस भयंकर परिस्थिति का कभी भी अनुभव न होने से महिलाएं और बच्चे जोर-जोर से आक्रोश करते यहां-वहां दौड़ने लगे। परंतु परिचय से मृत्यु की उग्रता भी कम हो गई और जैसे पंछियों के इधर-उधर उड़ने से कुछ डर नहीं लगता वैसे ही तोप के लाल-लाल गोले सिर के ऊपर तेजी से जाते देख अद्भुतता या भयानकता कुछ भी लगना बंद हो गया। आक्रमण के दो दिन बाद ही अंग्रेजों को पानी की कमी पड़ने लगी। उस चारदीवारी के अंदर एक कुआं उपयोग में लाने लायक था। पर विद्रोहियों की उस कुएं पर अंग्रेजी सोल्जर से अधिक आंख थी। धूप और गरमी की तपन भी इतनी प्रखर थी कि सोल्जर खड़े-खड़े लू के कारण ही मर जाते। सबके हृदय पत्थर की तरह कड़े हो गए। स्त्री-पुरुषों के बीच का सर्व भेदाभेद और जन लज्जा छूट गई। मरे हुओं को गाड़ने की बात तो छोड़ो, कौन मरा या कौन जीवित है, इसकी भी खबर रखना कठिन हो गया; क्योंकि जीवित लोगों की सूची में नाम लिखते-लिखते उसे काटने की बारी आ जाती। ऐसे अवसर का यथार्थ वर्णन करने का एक ही उपाय था और वह था एक घंटे की अवधि 1857 का स्वातंत्र्य समर - 187
का चित्र जैसा है बनाना-कैप्टन थॉमस स्वयं के अनुभव लिखता है-"आर्मस्ट्रांग घायल होकर गिरा, उसका हाल देखने लेफ्टिनेंट प्रोल वहां गया। वह दो-चार संतोष की बात कहे इतने में सामने से आती बंदूक की गोली उसकी जांघ में लगी और वह नीचे गिरा। उसका एक हाथ अपने कंधे पर रख और उसकी कमर में हाथ डालकर मैं उसे सर्जन के पास ले जाने को उठाकर एक-दो कदम चला, इतने में गूं-गूं करती एक गोली मेरे कंधे में लगी और मैं और प्रोल दोनों भूमि पर मरणासन्न होकर गिर गए। यह देखते ही गिलबर्ट बक्स हमारी ओर दौड़ा। परंतु उसके साथ ही दौड़ती आ रही शत्रु की एक गोली उसक शरीर में घुसी और वह मृत्यु के मुंह में जा गिरा।" यह एक घंटे का इतिहास उन इक्कीस दिनों के इतिहास की ठीक कल्पना दे सकता है। जनरल सर हो व्हीलर का लड़का घायल हो गया, इसलिए कमरे में उसकी खटिया के पास उसकी दो बहनें और मां उसका उपचार कर रही थीं। परंतु औषधि पेट में जाने के पहले ही धड़ाम की ध्वनि के साथ आए तोप के गोले ने उस लड़के का सिर उड़ा दिया। मजिस्ट्रेट हिलर्स्टन की पत्नी का डर से गर्भपात हो गया। उससे वह बरामदे में खड़ा बातें कर ही रहा था कि तभी बीस पौंड का गोला उसके सिर पर पड़ा और उसकी चटनी बना गया। दो-चार दिन बाद वही दीवार जिससे टिककर वह नूतन विधवा खड़ी थी, गिर जाने से वह भी उसके नीचे अपने पति की देह जैसी चटनी हो मर गई। चारदीवारी के पास की खंदक में सात गोरी महिलाएं बैठी थीं। एक बम ऊपर से गिरा और उसमें सातों मर गईं। इतना ही नहीं, जिसने विद्रोह के पहले सिपाही पर अकारण गोली चलाई थी और जो छूट गया था वह गोरा सोल्जर भी मर गया। अर्थात् सिपाहियों की बंदूकें भी गलती से चल ही गईं। और जब चल गई तब ऐसी चलीं कि फिर यावच्चंद्र दिवाकरौ, उनके वह भयानक आघात दारू के नशे में भी अंग्रेज लोग भूलेंगे नहीं! इस भयंकर घेरे में अंग्रेजों से ईमानदारी बनाए रखना जिन्हें अपना कर्तव्य लगता था, ऐसे कितने ही नेटिव उस चारदीवारी के केवल राजनिष्ठा से मृत्यु दाढ़ों में हाथ डाले खड़े थे। अंग्रेजों के एक बच्चे को दूध पिलाती एक नेटिव दाई के दोनों हाथ गोले ने उड़ा दिए। अपने मालिक को गरमागरम खाना मिले, इसके लिए गोलियों की बरसात में भी नेटिव बटलर यहां से वहां दौड़ते मरते जा रहे थे। अंग्रेजों को पानी पिलाते नेटिव भिश्ती अपने प्राण दांव पर लगाए थे। पानी इतना कम था कि अच्छे चमड़ा ही चबाते रहते थे। हैजा, बीमारी और त्रिदोष ने भी अंग्रेजों से प्रतिशोध लेने में कमी नहीं की। सर जॉर्ज पार्कर, कर्नल विलियम, लेफ्टिनेंट रूनी एक के बाद दूसरा सड़कर-सड़कर मर गए। जो बीमारी या गोली से नहीं मरे वे इस जीवित श्मशान की भयानकता से गल गए। और इस अनर्थ से भी भयंकर अनर्थ करने के लिए अब अकाल का तांडव शुरू हुआ। कहर ऐसा हुआ मानो सौ साल किए अन्याय का खरा प्रतिशोध कानपुर की चारदीवारी के अंदर 1857 का स्वातंत्र्य समर – 188
काल की दाढ़ बनकर सबको चबाता इक्कीस दिनों तक तांडव करता रहा। अंग्रेजों की चारदीवारी के अंदर ऐसा कहर हो रहा था, तभी चारदीवारी के बाहर रखी गई उनकी तोपों ने अच्छी लड़ाई चला रखी थी। तोपखाने के प्रमुख अधिकारी अंशे, कैप्टन थॉमसन आदि अंग्रेज बहादुरों ने साहस और पराक्रम की सीमा लाँघी। लखनऊ या इलाहाबाद से जल्दी ही सहायता आएगी, ऐसी अंग्रेजों को बहुत आशा था। विद्रोहियों के मजबूत बंदोबस्त से कहीं भी पत्राचार भेजा करना असंभव हो गया था। फिर भी एक-दो बार व्हीलर द्वारा पंछियों के पंखों में दबाकर भेजा फ्रेंच, लैटिन एवं अंग्रेजी भाषा में लिखा एक पत्र नेटिव जासूस ने लखनऊ पहुंचाया था। उसमें ˙ ˙ 'सहायता, सहायता, सहायता! सहायता भेजो नही तो मरते हैं। सहायता आ गई तो हम फिर से लखनऊ को मुक्त करेंगे, ऐसा लिखा था। पर विद्रोहियों की व्यवस्था इतनी कड़ी थी कि अंग्रेजों की ओर से आया काला या गोरा दूत कदाचित् ही लौट पाता और कोई लौटा तो उसकी नाक, कान कटा हुआ होता। विद्रोहियों के शिविर में गद्दारी कराने अंग्रेज लौटकर संदेश देने, कसम खाने के लिए कोई न बचा। उदाहरणार्थ एक जासूस की स्वयं ही लिखी बात देखें-‘मिल्स शेफर्ड की पत्नी और कन्या जब मर गई तब उसने विद्रोहियों का समाचार लाने और कानपुर में गद्दारी कराना स्वीकार किया। एक नेटिव रसोइए का वेश धारण कर बाहर आया। कुछ दूर आया ही था कि उसे पकड़कर नाना साहब के सामने लाया गया। उससे अंग्रेजों की स्थिति के संबंध में बहुत से प्रश्न पूछे गए। पहले से पढ़ाए अनुसार वह झूठे और बढ़ा-चढ़ाकर उत्तर देने लगा। परंतु उसी के पहले पकड़ी हुई दो महिलाओं ने अंग्रेजों की वास्तविकता दुर्दशा का समाचार दिया है, यह देखते ही वह घबरा गया। पहले उसे कोठरी में रखा गया फिर 12 जुलाई को न्यायालय में छानबीन करके तीन वर्ष के सश्रम कारावास का दंड दिया गया," इस दंड से नाना साहब ने उस युद्ध के गर्जन-तर्जन में भी न्याय करने की कितनी दक्षता रखी थी-यह दिखता है। अंग्रेजों के जासूसों की ऐसी फजीहत हो रही थी, पर विद्रोहियों के जासूस अपने काम बढ़िया कर रहे थे एक दिन एक नेटिव भिश्ती अंग्रेजी चारदीवारी के पास के एक टीले पर खड़ा होकर चिल्लाया, "अपने मन में बसी हुई प्रीत के कारण मृत्यु के भय की भी परवाह न करते हुए एक खुशी का समाचार देने आया हूं, गंगा पार साहब लोगों की एक सेना तोपों के साथ आई हुई है और वह कल तुम्हारी मुक्ति के लिए आनेवाली है। इस कारण इन हरामखोर विद्रोहियों के शिविर में बड़ी घबराहट और आपाधापी मची हुई है और हम जैसे सारे राजनिष्ठ लोग अंग्रेजों से मिलने को तैयार हैं।" यह सुनकर अंग्रेजों को लगा कि उनके द्वारा भेजे गए दूत की विजय के कारण विद्रोहियों में फूट पड़ गई होगी और इसी समय लखनऊ से यूरोपियन भी आ गए होंगे। दूसरे दिन वही भिश्ती 1857 का स्वातंत्र्य समर – 189
ऊपर आया और चिल्लाया, "साहब लोगों की जय! गंगा में आई बाढ के कारण यूरोपियन सेना को आने में देर हो गई थी, परंतु अब सब ठीक-ठाक होकर वे निकल पड़े हैं। इस दिन के अंत तक साहब लोगों की जय-जयकार होगी।" वह दिन गया, परंतु अंग्रेजों की दृष्टि में यूरोपियन सेना भी नहीं आई और वह राजनिष्ठ भिश्ती भी नहीं दिखा। अजीमुल्ला खान द्वारा चाही संख्या में अंग्रेजी सेना की दुर्दशा कर देने के कारण फिर से अपनी जान खतरे में डालने की उस भिश्ती को कोई आश्यकता नहीं थी। शत्रु की ओर के जासूसों द्वारा बार-बार किए जाते ऐसे छल के कारण अंग्रेज उदास हो जाते। 6 जून को आक्रमण की अग्रिम सूचना अंग्रेजों को देने के बाद उदास हो जाते। अपना शिविर उस युद्ध स्थल के बहुत पास ही लगा लिया था। चारदीवारी के पास ही उनका तंबू खड़ा हुआ था और उसके पस ही जनरल टीका सिंह का तंबू भी तना हुआ था। कानपुर स्वतंत्र हो जाने का समाचार सुनकर उस सारे प्रांत में सब ओर क्रांति की एक लहर उठ रही थी। रोज नए-नए जमींदार और रियासतदार अपने-अपने आदमियों को लेकर नाना साहब के साथ होने लगे। मीर नवाब नामक रियासतदार जिस दिन संयुक्त धर्मध्वज का जुलूस लेकर दो हजार सैनिकों के साथ नाना से आकर मिले, उस दिन नागरिकों ने आनंद उत्सव मनाया। कानपुर के हलवाइयों ने उन स्वदेश-रक्षकों में मिठाई बांटी। श्रीमंत के झंडे तले लगभग चार हजार सेना एकत्रित हो गई थी। परंतु उसमें से तोपखाने के अधिकारी अपना काम बहुत मुस्तैदी से पूरा कर रहे थे। इस तोपखाने पर एक जगह एक हरा झंडा लहरा रहा था और वहां नन्हें नवाब अपने विशाल तंबू में दिन रात बैठे हुए थे। इस नवाब के घर पर विद्रोह के प्रारंभ में जप्ती ले जाई गई थी। परंतु उसमें से तोपखाने के अधिकारी अपना काम बहुत मुस्तैदी से पूरा कर रहे थे। इस तोपखाने पर एक जगह एक हरा झंडा लहरा रहा था और वहां नन्हें नवाब अपने विशाल तंबू में दिन-रात बैठे हुए थे। इस नवाब के घर पर विद्रोह के प्रारंभ में जप्ती ले जाई गई थी। परंतु जल्दी ही बात सुलट गई और आज इस धर्मरक्षक समर में इस नवाब को हर ओर से धन्यवाद दिए जा रहे हैं। उनके अधीन तोपखाने पर उस प्रांत के सारे वृद्ध पेंशनर गोलंदाज इकट्ठा हो गए थे। अंग्रेजों की चारदीवारी के भवनों को आग लगाने के लिए विद्रोहियों के प्रयास चल रहे थे, तब इस नवाब के अधीन लड़ रहे एक नौसिखिया गोलंदाज ने एक नया ज्वालाग्रही सम्मिश्रण खोज निकाला और उसका प्रयोग इतना सफल रहा कि अंग्रेजों के बहुत काम की बैरकें तुरंत ही भस्म हो गई। इस तोपखाने की बैटरी पर स्वराज्य प्राप्त करने के लिए इतनी प्रतियोगिता थी कि पुरुषों के साथ स्त्रियां और तरुणों के साथ वृद्ध लोग भी जुटे हुए थे। उस उदात्त चैतन्य के अवसर पर लोक शक्तियां कितनी बेचैन थीं- यह उस समय के एक वाक्य से समझ में आ जाएगा। एक नेटिव ईसाई कहता है-'मुसलमान क रूप धरकर एक ऊंचाई पर मैं बैठा था, तब देखा-लड़ते वीरों को पानी पहुंचाने के लिए भाग-दौड़ कर रहे हैं। इतने में एक मेरे पास आया और बोला-उधर अपने देशबंधु लड़ रहे हैं। इतनें में एक मेरे पास आया और बोला-उधर अपने देशबंधु लड़ रहे हैं और तेरे तरुण मुसलमान यहां मक्खियां मारते बैठे, यह लज्जाजनक है। चल उधर, तोपखाने पर स्वयं सेवा करने। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 190
उसने मुझे यह भी कहा कि करीम अली नाम के काने पेंशनर सूबेदार के युवा लड़के ने आज बड़ा पराक्रम किया। उसने खोजकर अंग्रेजों के भवनों को आग लगा दी। उसके इस शौर्य के लिए उसे नब्बे रूपए और एक दुशाला इनाम दिया गया।‘‘ स्वदेश के लिए लड़ना छोड़ बैठकर मक्खियां मारना, यह केवल तरूणों के लिए ही अति लज्जाजनक माना जा रहा था, ऐसा नहीं, क्योंकि कानपुर की महिलाओं ने अपना जनाना स्वरूप छोड़ समर भूमि में प्रवेश किया था। परंतु उन सारे युवा पुरूषों और मर्दाना स्त्रियों को एक बिजली अपनी चमकार से लज्जित कर रही थी। यह बिजली और कोई नहीं-पीछे जिसका परिचय दिया वह वेश्या अजीजन थी। उसने अपने माशूक वेश को लश्करी पेशे में ढाल लिया था। गाल पर लाली चढ़ी थी। होंठों पर हास्य था और वह घोड़े पर सवार थी। वह सशस्त्र भी थी और तोपखाने के सिपाही उसकी मुद्रा की ओर देखकर अपनी थकान भूल जाते। नानकचंद अपनी डायरी में लिखता है-‘‘सशस्त्र होकर अजीजन बिजली-सी दमक रही थी। कभी-कभी थके और घायल सिपाहियों को वह मिठाई बांटती रास्ते में खड़ी रहती।‘‘ इधर ऐसी लड़ाई चल रही थी, उधर श्रीमंत नाना राज्य व्यवस्था की रचना करने में यथासंभव जुटे थे। राज्य क्रांति जैसे अशाश्वत और अद्भूत अवसर पर व्यवस्था और अनुशासन बनाए रखना बहुत कठिन होते हुए भी नाना ने प्रथमतः शहर के लोगों का यथान्याय संरक्षण देने के लिए राज्य व्यवस्था करना प्रारंभ किया। कानपुर शहर के प्रमुख नागरिकों को इकट्ठा बुलाकर उनके बहुमत से चुने गए होला सिंह नामक व्यक्ति को मुख्य मजिस्ट्रेट के अधिकार दिए गए। होला सिंह अनुशासनहीनता सिपाहियों के या लुटते ग्रामीणों के अत्याचारों से नागरिकों का संरक्षण करे, यह नाना का कड़ा आदेश था। लश्कर को अन्न का संभरण करने का काम ‘मुल्ला’ नामक नागरिकों को सौंपा गया था। नागरिक और सैनिक मुकदमों का न्याय करने के लिए स्थापित किए गए न्यायासन पर ज्वाला प्रसाद, अजीमुल्ला खान और अन्य मंत्रिमंडल की नियुक्ति कर उसका अध्यक्ष श्री बाबा साहब को बना दिया गया। इस न्यायासन के सामने प्रस्तुत जो थोड़े-बहुत कागज प्राप्त हुए हैं उनसे बिना कारण छल या अंधाधुंधी करनेवालों को कड़ा दंड देकर प्रजा में शांति करने के लिए क्या व्यवस्था की जाती थी यह समझ में आता है। चोरी की-यह सिद्ध हो जाने पर उसका दाहिना हाथ काट डाला गया। गाय का वध किए जाने पर एक मुसलमान कसाई को भी ऐसा ही कठोर दंड दिया गया। गांव में उठाईगिरी जैसे मामूली अपराध करते घूमनेवाले को गधे पर बैठाकर घुमाया जाता। फ्रांस की राज्य क्रांति में स्थापित की गई ‘The committee of public safety’ की तरह इस न्यायलय का अधिकार धीरे-धीरे सभी विभागों पर चलने लगा। बारूद की कमी होने पर उसकी पूर्ति करना, सेना को कपड़े की रसद पहुंचाना। अंग्रेजों के पकड़े गए जासूसों की 1857 का स्वातंत्र्य समर – 191
छानबीन करना या भागना चाहनेवाले शत्रु को दंडित करना आदि काम इसी न्यायलय में किए जाते और जो कोई गोरे आदमी को खोजकर इस न्यायलय में लाए, उसको वहीं पुरस्कार दिया जात। 12 जून को अंग्रेजों की चारदीवारी पर विद्रोहियों ने पहला हमला बोला। अंग्रेजों की चारदीवारी को हमला करके जीत लेने की अपेक्षा उन्हें चारों ओर से घेरकर, तोपों की मार से भूनकर नरम करने के सामान्य विचार से विद्रोही चल रहे थे। पर फिर भी बीच-बीच में सीधी हमला भी वे कर रहे थे। दोनों ओर के कुछ लोग मर जाने के बाद विद्रोही लौट आते। विद्रोहियों के तोपखाने ने जितनी दृढ़ता और साहस इस युद्ध में दर्शाया उतना पैदल और घुड़सवारों ने नहीं दिखाया, यह दोष ध्यान में रखने योग्य है। दिल्ली और लखनऊ के घेरे में इस दोष का प्रकटीकरण विशेष रूप से दिखेगा। परंतु कानपुर की लड़ाई में भी तोपों पर सारा बोझ डालकर सिपाही आमने-सामने के युद्ध के लिए अधिक तैयार नहीं होते थे, यह सत्य दिखता है। सारे ही सिपाही मृत्यु से डरते थे, ऐसा नहीं था। 18 जून को अवध के सिपाहियों ने अंग्रेजों की चारदीवारी पर जो हमला बोला वह साहस और शूरता के कृत्य इतिहास का गौरव ही थे। उस दिन सिपाहियों ने तोप के गोले भी पीछे छोड़कर शत्रु की छावनी पर सीधा हमला किया। उस चारदीवारी पर वे चढ़ गए, अंग्रेजों की एक तोप दबाकर उलटी घुमाई और कुछ देर के लिए ऐसा रंग दिखा किवह संयुक्त धर्म का निशान और वह भगवा झंडा अब किसी तरह भी लौटकर नहीं आता। परंतु ऐसे शूर सिपाहियों की सहायता करना तो दूर, उलटे कारण न होते हुए भी एकदम भागमभाग मचाकर सब ओर गड़बड़ी फैलाने का कुछ सिपाहियों ने मानो ठेका ही ले रखा था। उनके इस अवसान घात के कारण दूसरों को भी वापस आना पड़ता था। उनके इस अवसान घात के कारण दूसरों को भी वापस आना पड़ता था। अवध के शूर सिपाहियों की तरह उदात्त हृदय, शीश और बाहु दूसरों की राह न देखकर स्वयं जो हो सके वह देश-सेवा करते वीर मुक्ति प्राप्त करते रहे। एक दिन हमला विफल हुआ तो भी एक सिपाही मरने का स्वांग धरे मैदान में वैसे ही पड़ा रहा। अंग्रेजी सेना में शूरता के लिए ख्यात और लड़ाई में अनेक बार टूट पड़नेवाला कैप्टन जैक्सन निर्भयता से दौड़ता जा रहा था, तभी उसपर उस मरे हुए सिपाही ने हमला बोल उस कैप्टन की गरदन पर गोली मारकर उसे गिरा दिया। अब जून की 23 तारीख आ गई थी। सौ वर्ष पूर्व इसी जून की 23 तारीख को अंग्रेजों ने प्लासी के मैदान पर अपने साम्राज्य की नींव खोदी थी। जून की 23 तारीख को ही हिंदुस्थान पर अंग्रेजी तलवार का पहला वार पड़ा था। अपनी स्वतंत्रता का मंगलसूत्र टूट जाने के कारण 23 जून को ही हिंद माता प्लासी के मैदान पर फूट-फूटकर रोने लगी। उस 1757 की 23 जून के अमंगल दिन लगा अपमान का घाव हिंदुस्थान के हृदय को इतना जला रहा है कि-सौ वर्ष हो गए तब भी वह अशुभ दिन और उसकी 1857 का स्वातंत्र्य समर - 192
वह अमंगल स्मृति हिंद-भू हृदय में ताजा है। पर दासता का वह 23 जून को हुआ भयानक घाव सौ वर्ष गुजर गए तब भी भरा नहीं है। उसे भरने के लिए आवश्यक मलहम अभी मिला नहीं है। शमप्रधान और क्षमाशील हिंद भूमि का यह कैसा द्वेष! यह कैसा वैर! सौ वर्ष बीत गए तब भी प्लासी मिलता रहता है। यह गुरू परंपरा आज सौ वर्ष से चलते हुए आज सन् 1857 के 23 जून का उदय हुआ है। इस दिन तेरा प्रतिशोध पूरा किया जाएगा-ऐसे आश्वासन हिंदभूमि को भविष्यवक्ताओं ने दिया है। नाना साहब, उसकी पूर्ति करना या न करना-यह यद्यपि ईश्वराधीन है फिर भी उसके लिए तुम्हारा जो कर्तव्य है वह तुम पूरा करोगे न! और यह कर्तव्य पूरा करने का शुभ अवसर न गंवाने के लिए ही इस दिन नाना की सेना में बड़ा हल्ला-गुल्ला मचा हुआ था। आज तक जैसा कभी नहीं किया ऐसा जोरदार हमला करने का निश्चय कर यद्यपि लश्कर का हर व्यक्ति नहीं फिर भी सारे-के-सारे भाग सज्जित हो गए थे। तोपखाना, घुड़सवार और पैदल-सारे लश्कर उस ऐतिहासिक दिन के स्मरण से स्फूर्तिमान होकर रणांगण में उतर पड़े। उनमें जो बहुत बहादुर थे उन्होंने एक तरफ जाकर गंगा का पानी हाथ में लेकर या कुरान पर हाथ रखकर प्रतिज्ञा ली कि आज या तो स्वतंत्रता प्राप्त करनी है या मारते-मारते मर जाना है। घुड़सवारों ने ऐसी दौड़ लगाई कि शत्रु की गोलाबारी की परवाह न करते वे चारदीवारी तक जाकर भिड़ गए। पैदल सेना ने कपास के बड़े-बड़े गट्ठों को धकेलते-धकेलते उसके सहारे से चारदीवारी पर गोलियों की बौछार चालू की। विद्रोहियों की सेना से आसपास के गांववाले भी आकर मिल गए थे। अंग्रेजों ने भी चारदीवारी से गोलियों और तोप-गोलों की बौछार चालू रखी थी। विद्रोहियों की सेना को रोकना यद्यपि उन्हें असंभव हुआ, फिर भी उन्होंने उन्हें चारदीवारी पर चढ़ने नहीं दिया। लड़ाई का जोश भी जल्दी ही ठंडा पड़ गया और प्लासी के दिन का आधा बदला लेकर विद्रोही स्वयं ही लौट आए। परंतु कानपुर का यह अंतिम आक्रमण बिलकुल ही व्यर्थ नहीं गया। उस दिन के हमले से अंग्रेजों की सारी आशाएं विनष्ट हो गईं। उनका सारा धीरज भी टूट गया और इसके आगे नाना के हाथ से बच पाना असंभव है, ऐसा उनका स्पष्ट दिखाई दिया। 23 जून नहीं, 25 जून को अंग्रेजों ने संधि के लिए झंडा लगा दिया। 87 यह झंडा देखते ही श्रीमंत ने युद्ध रोकने का आदेश दिया और जेलबंद अंग्रेजों में से एक महिला के साथ जनरल व्हीलर को यह चिट्ठी भेजी-‘‘क्वीन विक्टोरिया की प्रजा को-डलहौजी की 1857 का स्वातंत्र्य समर – 193 87 अधिकतर अंग्रेज इतिहासकार यह बात छोड़ देते हैं, यह बात ध्यान में रखने की है। श्री तात्या टोपे की जबानी इस बात का स्पष्ट उल्लेख है-‘‘जनरल व्हीलर ने शांति की पताला फहराई और युद्ध बंद हो गया।
राजनीति से जिनका किसी भी तरह का संबंध नहीं हो और जो शस्त्र नीचे रखकर शरण आने को तैयार होंगे उन्हें इलाहाबाद सुरक्षित पहुंचाया जाएगा।” यह चिट्ठी अजीमुल्ला खान के हस्ताक्षरों और नाना के आदेश से लिखी हुई है। यह चिट्ठी आते ही जनरल व्हीलर ने उस पर विचार करने के सारे अधिकार कैप्टन मूर एवं व्हाइटिंग को दिए और उन दोनों अधिकारियों ने नाना के सामने आत्मसमर्पण करने का निश्चय पक्का किया। दूसरे दिन 23 जून को नाना की ओर से ज्वाला प्रसाद और अजीमुल्ला खान, अंग्रेजों की ओर से मूर, व्हाइटिंग और रोचे मिले। अंग्रेज अपनी सारी तोपें, खजाना, गोला-बारूद और शस्त्रास्त्र नाना को सौंप दें और नाना उन्हें खाने-पीने की सामग्री देकर इलाहाबाद पहुंचा दें-यह तय हुआ। ये शर्तें एक कागज पर लिखी गईं और श्रीमंत नाना के हस्ताक्षर लेने अजीमुल्ला खान आदि लौट आए। इस भेंट में आरंभिक भाषण अंग्रेजी में होने के बाद शेष भाषण हिंदुस्थानी में हुए। 88 दोपहर के समय अंग्रेज उसी रात निकलें, या प्रातः निकलें इस संबंध में थोड़ी बातचीत होकर यह तय हुआ कि उस रात सारा कब्जा नाना के हाथ में दिया जाए और अंग्रेज दूसरे दिन भोर में निकलने की तैयारी करें। इस तरह दोनों पक्षों के मध्य निश्चित संधिपत्र को लेकर मि. टॉड (नाना के महल का अंग्रेजी वाचक) श्रीमंत के पास आया। उसे नाना ने बहुत आदर से बैठाया और कुशल-क्षेम की पूछताछ की। उसी रात अंग्रेजों ने अपने शस्त्र नीचे रखे, तोपें नाना को सौंप दी गईं और ब्रिगेडियर ज्वाला प्रसाद ने अपने दो अनुचरों के साथ उस चारदीवारी में अपना शिविर बनाया। उस रात कानपुर के मजिस्ट्रेट होला सिंह और तात्या टोपे ने मल्लाहों को पैसा देकर लगभग चालीस नौकाएं तैयार की। उनका निरीक्षण करने हाथी पर बैठकर आए अधिकारियों ने शिकायत की, इसलिए सौ मजदूर तुरंत लगाकर नौकाओं पर आच्छादन और बैठने के लिए बांस के फर्श बनाए गए। अनाज और अन्य आवश्यक सामग्री भी उस पर चढ़ा दी गई। परंतु इधर जब अंग्रेजों की जाने की तैयारी चल रही थी तब उधर कानपुर में कौन-कौन आने लगा है यह देखने के अतिरिक्त उस जावक पक्ष के साथ ही आवक पक्ष का भी ब्योरा न दिया जाए तो हिसाब बराबर ध्यान में नहीं आएगा। श्रीमंत जाना साहब ने स्वतंत्रता का ध्वज कानपुर में लगा दिया, यह समाचार चारों ओर फैल जाने के बाद से सारे धर्मवीर और देशवीर बाढ़ की तरह वहां आने लगे थे। गांव-गांव से युवा स्वयंसेवक उधर आ रहे थे। जिस गांव से स्वयंसेवक भेजना संभव नहीं था, उस गांव से धन की सहायता आ रही थी। परंतु केवल इन स्वयंसेवकों की भीड़ ही कानपुर की ओर आ रही थी, ऐसा नहीं था। विद्रोह में विफल और हारे हुए अनाथ, अंग्रेजी दासता से बेजार हुए लोग भी, नाना के झंडे के नीचे फिरंगियों से प्रतिशोध लेना चाहिए, ऐसी 1857 का स्वातंत्र्य समर - 194 88 रेड पैंफलेट, भाग 1 ।
गर्जना करते रात-दिन आ रहे थे। जलाए गए गांवों का धुआं वहां आ गया। मृत व्यक्तियों की आत्मा के विकृत भूत भी वहां आए थे। इलाहाबाद और काशी के सिपाहियों पर और उनके बीवी-बच्चों से क्रूर प्रतिशोध लिये जाने की खबरों के साथ वहां के सैकड़ों सिपाही गत हफ्ते कानपुर आए थे। जिनके बूढ़े बाप पेड़ों पर अंग्रेजी अंक आठ (8) के आंकड़े बनाकर अंग्रेजों ने टांगे थे, ऐसे सैकड़ों भारतीय तरुण पुत्र वहां आए थे। जिनकी युवा पत्नियों को उनके पालने में सोए बच्चे सहित नील ने जीवित जलाया था उनके पति भी वहां आए थे। जिनकी बच्चियों के घुंघराले बालों और कपड़ों को आग लगाकर उसे देख-देखकर सोल्जर तालियां पीट रहे थे-ऐसे बाप वहां इकट्ठा हो गए थे। जिनका देश बेचिराग हुआ था, जिनका धर्म पैरों से कुचला जाता था जिनके राष्ट्र की स्वतंत्रता छीन ली गई थी-ऐसी बेचैन आत्माएं-इसका प्रतिशोध लेना है-इसका बदला लेना है, ऐसा कहती हुई उस राष्ट्रध्वज के चारों और हल्ला-गुल्ला कर रही थीं। और अब यह विजय दिवस आने पर भी जब श्रीमंत नाना साहब अंग्रेजों को इलाहाबाद पहुंचा देने का वचन देने लगे तब उन सिपाहियों और लोगों के मन में आशा भंग होने से बादल गरजने लगे। नदी पर नौकाओं की तैयारी देखने आए हुए अंग्रेज अधिकारियों को भागीरथी के तीर पर इधर-उधर डेरा लगाए सिपाहियों में-कत्ल-कत्ल की चल रही फुसफुसाहट स्पष्ट सुनाई दे रही थी। ऐसा कहते हैं कि राजमहल के एक पंडित ने राष्ट्र के साथ विश्वासघात करनेवालों और हत्यारों का शिरश्छेद करने में धर्म की कोई रोक नहीं है, यह भी सिपाहियों को समझा दिया था।⁸⁹ इस भयानक वातावरण में जून की 27 तारीख का उदय हुआ। सत्तीचौरा घाट से अंग्रेजों को संदेश दिया जाना था। उस घाट के इधर-उधर तोपें तनी हुई थीं और घुड़सवार और पैदल सेना भी वहां भीड़ किए थी। कानपुर शहर के हजारों नागरिक गंगा किनारे आज क्या देखने को मिलेगा, इस संबंध में अपने-अपने मन में भिन्न-भिन्न चित्र बनाते हुए सवेरा होते ही उस घाट की ओर चल पड़े थे। अजीमुल्ला खान, श्रीमंत बाबा साहब और सेनापति तात्या टोपे भी उस घाट के पास एक मंदिर के चबूतरे पर जाकर खड़े थे। उस मंदिर का नाम भी उस प्रलय काल को शोभा देनेवाला था। मानो सारे प्रदेश का अधिपति पद उस मंदिर को दिया गया है, ऐसा लगता है। क्योंकि उस मंदिर में हरदेव की मूर्ति स्थापित थी। चारदीवारी का स्थान छोड़कर गंगा किनारे अंग्रेजों को लाने के लिए नाना ने उत्तम वाहन भेज दिए थे। सर हो व्हीलर के लिए तो उत्तम रीति से सजे हाथी लेकर स्वयं नाना साहब के हाथी का महावत चारदीवारी के दरवाजे का आकर खड़ा हुआ था। उस हाथी पर अपना जुलूस निकलवाना सर व्हीलर के मन को नहीं जंचा, 1857 का स्वातंत्र्य समर – 195 ⁸⁹ ट्रेवेलियन कृत-'कानपुर'।
इसलिए उसने बाल-बच्चे हाथी पर चढ़ा दिए और स्वयं पालकी में बैठा। अंग्रेज महिलाओं को भी पालकियां दी गई थीं। ऐसे ठाट से यह जुलूस निकला। कानपुर की चारदीवारी पर लगा अंग्रेजी झंडा नीचे उतारा गया और वहां सद्धर्म का संयुक्त ध्वज और स्वराज्य का झंडा लहराने लगा। अंग्रेजी अभिमान के हुए अपमान से दिल जलते हुए भी मृत्यु की कराल दाढ़ से छूटने का आनंद अंग्रेजों को हुआ था। उस आनंद के भाव में वे चारदीवारी पीछे छोड़ जाने को तैयार हो गए-पर कहां? और अब सुरक्षा का व्यवहार मिलेगा, ऐसा उनको विश्वास हो गया। पर डलहौजी की राजनीति से जिसका कुछ भी संबंध नहीं है, क्या ऐसा मनुष्य इस समूह में एक भी है? लेकिन इस प्रश्न की चर्चा अभी करने का कोई लाभ नहीं। गंगा घाट अभी डेढ़ मील दूर है। डेढ़ मील तक चलकर जानेवाला यह जुलूस गंगा की रेत पर उतरते ही उसके पीछे सिपाहियों की पंक्तियों ने पीछे का रास्ता रोक दिया। पालकी से उतरते या हाथी से उतरकर नाव पर चढ़ते अंग्रेजों को उस दिन हाथ का सहारा देने कोई नेटिव तैयार नहीं हुआ। नहीं, ऐसा नहीं। एक-दो विशेष स्थानों पर पालकी से उतरते समय सहायता मिली, परंतु वह हाथ का सहारा देने नहीं, हाथ दिखाते समय थी। कर्नल एवर्ट घायल था, अतः उसे एक डोली में डालकर ले जाया जा रहा था। उसकी वह डोली बीच में ही रोककर एक सिपाही बोला, "क्यों कर्नल साहब, ये परेड आपको कैसी लगी? रेजिमेंट की वरदी कैसी है?" ऐसी बात करते-करते उसने उसे नीचे खींचा और तलवार से उसके टुकड़े कर दिए। उस कर्नल की स्त्री पास ही खड़ी थी। उसे कुछ लोग कहने लगे, "तू स्त्री है, इसलिए तुझे जीवनदान दिया!" पर एक क्रूर साथी चिल्लाया, "अरे हटो! स्त्री! पर यह गोरी है न? फिर कर दो टुकड़ें" वाक्य समाप्त होने के पहले उस वाक्य के भयानक अर्थ की पूर्ति हो चुकी थी। नदी में सारी नौकाएं अनाज आदि से भरी तैयार थीं, यह बात अंग्रेजों की समिति ने ही खोज के बाद सिद्ध की है। उन नौकाओं पर पानी में चलकर कुछ लंगड़ाते हुए अंग्रेज लोग जाकर बैठने लगे। इधर-उधर स्तब्धता थी। नौकाएं भर गई थीं। मल्लाह नौकाओं पर चढ़ गए थे। नौकाएं आगे बढ़ें, इसलिए श्रीमंत नाना ने अपना हाथ हवा में आगे-पीछे घुमाकर आदेश दिया। इतने में एक कोने से उस भयप्रद शांति को भंग करने के लिए किसी ने एक बिगुल जोर से फूंका। उस घाट के श्री हरदेव का प्रलयकाली डमरू तो नहीं तो नहीं डमडमाया? क्योंकि उस बिगुल का कर्कश-हुंकार-होते ही तोपें, बंदूकें, तलवारें, कटारें, बैनट एकदम चलने लगे। मल्लाह नौका से कूदकर भूमि पर आ गए और सैनिक भूमि पर से पानी में कूद पड़े। "मारो फिरंगी को," "छांटो गनीम को।" इसके सिवाय एक शब्द कोई बोल नहीं रहा था। इतने में सारी नौकाएं जलने लगीं। अंग्रेजी पुरुष, स्त्रियां, बच्चे सारे गंगा में छलांगें लगाने लगे। कोई तैरने लगा, कोई 1857 का स्वातंत्र्य समर - 196
डूबने लगा, कोई जलने लगा और सारे-के-सारे जल्दी या देर में गोलियों से चित हो गए। मांस के लोथड़े, कटे सिर, टूटे बाल, छिन्न हुए हाथ, टूटे पैर, रक्त की बाढ़। सारा गंगाजल लाल-लाल हो गया। पानी में से कोई अंग्रेज सिर उठाता कि उसे गोली लग जाती। पानी में सिर छिपाए तो घुटकर मर जाए, ऐसा हरदेव का कोप हुआ। प्लासी का ऐसा वार्षिकोत्सव मनाया गया। यह प्रातः दस बजे का समय था। श्रीमंत नाना उस दिन उस समय अपने दीवानखाने में अकेले ही चक्कर लगा रहे थे, ऐसा कहते हैं। भागीरथी के तीर पर श्री हरदेव की अध्यक्षता में मनुष्य प्राणियों की उन दो भिन्न जातियों में सौ साल के हिसाब का मिलान हो रहा था तब श्रीमंत नाना दीवानेखाने में विचलित मन थे, इसमें आश्चर्य क्या था। ऐसे क्षण इतिहास के एक-एक अध्याय के अंतिम अक्षर होते हैं। एक-एक युग की वह समालोचना होती है। ऐसे क्षण का कर्तव्य जिसकी ओर आया था वह नाना उस समय दीवानखाने में चक्कर लगाते समय उनके मन में जो विचार आ रहे हों वह करें। परंतु उन्हें विचार करने को बहुत समय नहीं मिला। क्योंकि उसी समय एक घुड़सवार दौड़ता आया और उसने-सत्तीचौरा घाट पर सिपाही अंग्रेजों को पूरी तरह काट रहे हैं-यह समाचार दिया। यह समाचार सुनते ही नाना ने उसको वापस लौटाया और उसके साथ सख्त आदेश दिया, "गोरे पुरुषों को काटें, पर गोरी वापस लौटाया और उसके साथ सख्त आदेश दिया, "गोरे पुरूषों को काटें, पर गोरी औरतों, बच्चों को हाथ न लगाएं।'"⁹⁰ नाना के आदेश के दूसरे भाग का नील के आदेशों में अभाव ही मिलता है-यह जाते-जाते कहना ही होगा। नाना का आदेश जब सत्तीचौरा पर पहुंचा, उस समय सिपाहियों के शिकार का खेल पूरे रंग पर था। नौकाओं के कड़कड़ाकर गिरते ढेर में गोरे जल रहे थे तो कितने ही तैरकर पार निकले जाने के प्रयास में थे। उनके पीछे शिकारी कुत्तों-से आपे से बाहर क्रोध से गुर्राते सिपाही भी तैरने लगे। दांत में तलवारें पकड़ और हाथ में पिस्तौलें लेकर पानी में सिपाहियों ने भयंकर शिकार का खेल किया। जनरल व्हीलर पहले झटके में ही मारा गया। हेंडरसन मारा गया। पर कितने मार डाले गए, इसकी सूची देने की अपेक्षा ऐसे स्थान पर कौन नहीं मारा गया, इसी की सूची देना अच्छा! नाना का संदेश आते ही सारी मार-काट बंद हो गई और करीब एक सौ पच्चीस महिलाएं, बच्चे जीवित बाहर निकाले गए। उन्हें सबदा कोठी की ओर कैद करके ले जाया गया और शेष रहे सारे यूरोपियन पुरुषों को एक कतार में खड़ा कर उनका शिरश्छेद करने का आदेश उन्हें पढ़कर सुनाया गया। उसमें से एक ने प्रार्थना के लिए समय मांगा, वह दिया गया। उन 1857 का स्वातंत्र्य समर - 197 ⁹⁰ फॉरेस्ट स्टेट पेपर्स तथा के एवं मैलसन कृत 'म्यूटिनी' के खंड 2, पृष्ठ 258 पर भी यह अंकित है कि "लगभग सभी इतिहासकारों ने एकमत से यह स्वीकार किया है कि नाना साहब को समाचार प्राप्त ही उन्होंने यह आदेश दे दिया था।''
सबने प्रार्थना की और वह पूरी होते ही सिपाहियों की तलवारों ने उनके सिर सटासट उड़ा दिए। उन चालीस में से एक नौका भाग गई और उस नौका में रास्ते के गांवों के हमले से बचे दो-चार अंग्रेज यदि रह गए तो वह दुर्विजय सिंह नामक जमींदार की करूणा से। इस जमींदार ने उन नंगे, मरते साहबों को घी-रोटी खिलाकर एक माह मेहमानी करके इलाहाबाद भिजवा दिया। सारांश यह कि कानपुर में 7 जून को जो एक हजार अंग्रेज जीवित थे उनमें से चार पुरूष और एक सौ पच्चीस स्त्री-पुरूष ही 30 जून को जीवित थे। उनमें से ये एक सौ पच्चीस स्त्री, बच्चे नाना की कैद में थे और चार अधमारे पुरूष दुर्विजय सिंह के दीवानखाने में दवा-दारू करवा रहे थे। पर यह सूची अभी अंतिम नहीं हुई है, इसमें भी अभी जोड़-घटाव होना है। यह जोड़-घटाव होने तक अंग्रेज स्त्रियों और बच्चों को नाना ने कैद में डालने के बाद उनकी व्यवस्था कैसे क्या रखी गई थी, यह भी संक्षेप में कहने लायक है। इन स्त्रियों पर जबरदस्ती की गई, रास्ते में उनके स्तन काटे गए और स्वयं नाना ने उनपर बलात्कार करने का प्रयास किया आदि बेशर्मी के आरोप एवं तथाकथित 'सत्य जानकारियां' बड़े-बड़े उन अंग्रेजों के इन सब आरोपों की छानबीन करने के लिए नियुक्त कमीशन की रिपोर्ट में ये सारे बयान पूरे-के-पूरे झूठे हैं, यह स्पष्ट लिखा ही है।⁹¹ फिर भी इतने से यह हकीकत समाप्त नहीं होती। उन स्त्रियों को नाना ने मार-काट से बचाकर-नील, रेनाल्ड्स, हैवलॉक इन सबको लज्जित किया। इतना ही नही अपितु उन स्त्रियों को कैद में रखकर उनको अमानुषकि यंत्रणाएं भी नहीं दी गई। इतना ही नहीं, अंग्रेजों ने हिंदुस्थान में या ऑस्ट्रिया ने इटली में या स्पेन ने मूरिश लोगों को या ग्रीक ने तुर्की लोगों को ऐसी ही परिस्थिति में जितनी कठोरता से सताया है उसकी शतांश कठोरता भी अपने व्यक्ति, राष्ट्र या धर्म संबंधी कृतघ्न शत्रु जाति को उस सन् 1857 के उग्र प्रलय में नहीं दिखाई गई! यह अंग्रेजी इतिहास से प्रमाणित है। कानपुर हत्याकांड की इस पहली गड़बड़ी में कुछ घुड़सवारों ने चार अंग्रेज और कुछ धर्मांतरित स्त्रियों को भगाया था। नाना साहब को यह समाचार मिलते ही उन्होंने उन सवारों को पकड़वाकर उनकी भर्त्सना की और भगाई हुई औरतों को छोड़ देने के आदेश दिए।⁹² कैदी स्त्रियों और बच्चों को रोटी और 1857 का स्वातंत्र्य समर – 198 ⁹¹ 1. म्योर का प्रतिवेदन तथा विल्सन का प्रतिवेदन; के और मैलसन कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड 2, पृष्ठ 267। ⁹² 2. ट्रेवेलियन कृत-'कानपुर', पृष्ठ 299 ।