१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 178, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंसारी बातें होना अति आवश्यक था। उसमें भी मेरठ के आकस्मिक विद्रोह से अस्त-व्यस्त हुए कार्यक्रम को फिर से एक बार सही करना अनिवार्य था, इसलिए नाना की और सूबेदार टीका सिंह की भेंट निश्चित हुई। पहली भेंट में सूबेदार और नाना की मंत्रणा बहुत देर तक हुई। "सेना के हिंदू और मुसलमान-ये दोनों ही स्वराज्य और स्वधर्म के लिए एकमत से विद्रोह करने को सज्जित हो गए हैं और हमव ह करने के लिए तैयार हैं।" सूबेदार के ऐसा विश्वास दिलाने पर अन्य फुटकर बातें निश्चित करने को दूसरी अधिक सावधान और सावकाश भेंट की बात निश्चित कर सूबेदार वापस लौटे। जून की पहली तारीख को संध्या समय श्रीमंत नाना अपने बंधु बाला साहब और मंत्री अजीमुल्ला खान के साथ गंगा किनारे आए। सूबेदार टीका सिंह अपनी केंद्र मंडली के साथ वहां आए हुए थे ही।ये सारे लोग एक नाव में बैठकर में बैठकर गंगा के सुधा धवल जलाशय में घुस गए। अपने स्वदेश-संरक्षण के लिए घनघोर संग्राम करने की प्रतिज्ञा उस गंगाजल को हथ में लेकर करने के बाद कोई दो-तीन घंटे तक उनकी चर्चा चलती रही। भावी कार्यक्रम का पक्का निर्णय हो जाने पर वे सब लोग लौट आए। उनकी वहां क्या चर्चा हुई, यह गंगा नदी के पाट को ही ज्ञात होगा। इतना सच है कि दूसरे दिन शम्सुद्दीन ने अपनी प्रियतमा को यह स्वतंत्रता का समाचार यूंह ी नहीं सुनाया था। क्योंकि स्वराज्य के लिए शम्सुद्दीन की आत्मा जितनी फड़फड़ा रही थी उतनी ही इस सुंदरी की भी। अजीजन सिपाहियों की अतिप्रिय संग्राम के बाजार में देशप्रेम के पुरस्कार के रूप में बांटना शुरू कर दिया था। अपने सुंदर मुख और भृकुटी की एक-एक सिकुड़न से उसने अनेक भगोड़ों को फिर से रण में भेजा है, यह किस्सा शीघ्र ही आगे आएगा। क्रांति पक्ष की योजनाएं इधर इस ऊंचाई तक पहुंच रही थी और उधर अंग्रेज लोगों को हर नए पल इतनी घबराहट हो रही थी कि क्या पूछने? लखनऊ से सहायता आने और श्रीमंत नाना साहब की सुरक्षा में खजाना एवं गोला-बारूद पहुंच जाने के बाद सर व्हीलर के मन को थोड़ा धीरज बंधा था। पर अंग्रेज बस्ती को बिल्कुल धीरज नहीं था। 24 मई को मुसलमानों की ईद थी। उस दिन सब ओर विद्रोह होगा-ऐसा डर हर शहरी अंग्रेज को था। परंतु ऐसे सहज ध्यान में आ जानेवाले दिन सार्वजनिक विद्रोह होगा, ऐसा सहज में लग सकता है उस दिन शांति बनाए रखना और जिस दिन विद्रोह होने की बिल्कुल भी संभावना न हो उस दिन उछल पड़ना-ये दांव-घात ही तो विद्रोह की सफलता के मुख्य कारण थे, इसीलिए कानपुर में ईद के महोत्सव में किंचित् भी गड़बड़ी नहीं होने दी गई। उस दिन सुबह आंग्रेज इतना घबराया हुआ था 1857 का स्वातंत्र्य समर — 182