१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऔर बच्चे चाहें तो ब्रह्मवर्त के राजमहल में जाकर रहें, यहां तक बातें होने लगीं। इसी का नाम है मराठी कावा (दाँव)! अंग्रेजों की सुरक्षा करने और स्वदेश-स्वतंत्रता के लिए युद्धरत अपने सगे भाइयों से लड़ने सेना-तोपखाने के साथ नाना को कानपुर बुलाया गया। अंग्रेजी बस्ती में उनका शिविर लगा। अंग्रेज उन्हें लाखों रूपयों का खजाना सौंप दे और इस तरह सहायता देने के लिए धन्यवाद दे-इसी सबका नाम है मराठी दाँ! और ये सारे बातें उस प्रचंड विस्फोट के एक हफ्ते पहले की हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि सन् 1857 में अंग्रेज सरकार को अंधकार में टटोलते रखकर एकाएक कैसे गड्ढे में गिराया गया। स्वतंत्रता की अनिवार्य इच्छा-यही साध्य और उसकी प्राप्ति हेतु संग्राम-यह साधन। इन दो बातों का स्पष्ट ज्ञान सारे समाज को दिया हुआ था। परंतु उसका नेता कौन हो? विद्रोह का पक्का दिन कौन सा हो? क्रांति के मुख्य केंद्र कहां होंगे? ये सब बातें इतनी चतुराई से गुप्त रखी गई थीं कि उसकी भनक अंग्रेजों को तो खैर क्या होती, उस जनसमूह को भी पक्की पता नहीं थी। मुख्य गुप्त केंद्र के नेता और उनके विश्वसनीय सहयोगियों को ही पूरे नाम आदि की जानकारी थी। पीछे कहा था कि हर रेजिमेंट में एक समिति बनाई गई थी, उसका भेद भी यही था। काशी में पकड़े गए पत्र में एक नेता की ओर से इतने ही हस्ताक्षर थे। इस क्रांति रचना के अनुरूप ऐसा ही व्यवहार उसके उत्तरदायी नेताओं की ओर से रखा गया था। दिल्ली के बादशाह, झाँसी की रानी या नाना साहब की योजना के बारे में विद्रोह होने के पहले दिन तक अंग्रेजों को तिनके के बराबर भी भनक नहीं मिली। परंतु इस सब में ब्रह्मवर्त के बाड़े की विशेष करामात! इतिहासकार 'के' कहता है-'मराठा राज्य-संस्थापक शिवाजी के चरित्र का अध्ययन नाना ने यों ही नहीं किया था। कानपुर में गुप्त मंडली का जो, जाल बिछा था उसका मुख्य केंद्र सूबेदार टीका सिंह के घर में स्थापित था। बैठक करने का दूसरा स्थान शम्सुद्दीन खान सिपाही के घर में था।85 इन गुप्त बैठकों में होनेवाली मंत्रणा में नाना की ओर से ज्वाला प्रसाद और महमूद अली नामक ब्रह्मवर्त के राजमहल के विश्वसनीय नौकर उपस्थित रहते थे। सूबेदार टीका सिंह और ज्वाला प्रसाद की सहायता, उत्कट स्वातंत्र्य इच्छा और निष्कलंक सच्चाई के कारण सारी सभा पर उनका प्रभाव था और इस सभा के निर्णयों के अनुसार सेना एकमत से व्यवहार करे, यह निश्चित था। इस कारण सूबेदार टीका सिंह का जो मत होता वही सारी सेना का होता था। ऐसे नेता और नाना की भेंट होना, आमने-सामने 1857 का स्वातंत्र्य समर - 181 85 कानपुर में विद्रोह शांत हो जाने पर एकत्रित साक्ष्य तथा नानकचंद नामक एक वकील की डायरी-इन दो आधारों पर G. D. Trevelyan द्वारा लिखित 'Cawnpore' नामक पुस्तक से उपर्युक्त सारी जानकारी ली गई है । इन सबूतों से भी उस समय की परिस्थितियों की कल्पना करना बहुत कठिन नहीं है।