भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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छानबीन करना या भागना चाहनेवाले शत्रु को दंडित करना आदि काम इसी न्यायलय में किए जाते और जो कोई गोरे आदमी को खोजकर इस न्यायलय में लाए, उसको वहीं पुरस्कार दिया जात। 12 जून को अंग्रेजों की चारदीवारी पर विद्रोहियों ने पहला हमला बोला। अंग्रेजों की चारदीवारी को हमला करके जीत लेने की अपेक्षा उन्हें चारों ओर से घेरकर, तोपों की मार से भूनकर नरम करने के सामान्य विचार से विद्रोही चल रहे थे। पर फिर भी बीच-बीच में सीधी हमला भी वे कर रहे थे। दोनों ओर के कुछ लोग मर जाने के बाद विद्रोही लौट आते। विद्रोहियों के तोपखाने ने जितनी दृढ़ता और साहस इस युद्ध में दर्शाया उतना पैदल और घुड़सवारों ने नहीं दिखाया, यह दोष ध्यान में रखने योग्य है। दिल्ली और लखनऊ के घेरे में इस दोष का प्रकटीकरण विशेष रूप से दिखेगा। परंतु कानपुर की लड़ाई में भी तोपों पर सारा बोझ डालकर सिपाही आमने-सामने के युद्ध के लिए अधिक तैयार नहीं होते थे, यह सत्य दिखता है। सारे ही सिपाही मृत्यु से डरते थे, ऐसा नहीं था। 18 जून को अवध के सिपाहियों ने अंग्रेजों की चारदीवारी पर जो हमला बोला वह साहस और शूरता के कृत्य इतिहास का गौरव ही थे। उस दिन सिपाहियों ने तोप के गोले भी पीछे छोड़कर शत्रु की छावनी पर सीधा हमला किया। उस चारदीवारी पर वे चढ़ गए, अंग्रेजों की एक तोप दबाकर उलटी घुमाई और कुछ देर के लिए ऐसा रंग दिखा किवह संयुक्त धर्म का निशान और वह भगवा झंडा अब किसी तरह भी लौटकर नहीं आता। परंतु ऐसे शूर सिपाहियों की सहायता करना तो दूर, उलटे कारण न होते हुए भी एकदम भागमभाग मचाकर सब ओर गड़बड़ी फैलाने का कुछ सिपाहियों ने मानो ठेका ही ले रखा था। उनके इस अवसान घात के कारण दूसरों को भी वापस आना पड़ता था। उनके इस अवसान घात के कारण दूसरों को भी वापस आना पड़ता था। अवध के शूर सिपाहियों की तरह उदात्त हृदय, शीश और बाहु दूसरों की राह न देखकर स्वयं जो हो सके वह देश-सेवा करते वीर मुक्ति प्राप्त करते रहे। एक दिन हमला विफल हुआ तो भी एक सिपाही मरने का स्वांग धरे मैदान में वैसे ही पड़ा रहा। अंग्रेजी सेना में शूरता के लिए ख्यात और लड़ाई में अनेक बार टूट पड़नेवाला कैप्टन जैक्सन निर्भयता से दौड़ता जा रहा था, तभी उसपर उस मरे हुए सिपाही ने हमला बोल उस कैप्टन की गरदन पर गोली मारकर उसे गिरा दिया। अब जून की 23 तारीख आ गई थी। सौ वर्ष पूर्व इसी जून की 23 तारीख को अंग्रेजों ने प्लासी के मैदान पर अपने साम्राज्य की नींव खोदी थी। जून की 23 तारीख को ही हिंदुस्थान पर अंग्रेजी तलवार का पहला वार पड़ा था। अपनी स्वतंत्रता का मंगलसूत्र टूट जाने के कारण 23 जून को ही हिंद माता प्लासी के मैदान पर फूट-फूटकर रोने लगी। उस 1757 की 23 जून के अमंगल दिन लगा अपमान का घाव हिंदुस्थान के हृदय को इतना जला रहा है कि-सौ वर्ष हो गए तब भी वह अशुभ दिन और उसकी 1857 का स्वातंत्र्य समर - 192