१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवह अमंगल स्मृति हिंद-भू हृदय में ताजा है। पर दासता का वह 23 जून को हुआ भयानक घाव सौ वर्ष गुजर गए तब भी भरा नहीं है। उसे भरने के लिए आवश्यक मलहम अभी मिला नहीं है। शमप्रधान और क्षमाशील हिंद भूमि का यह कैसा द्वेष! यह कैसा वैर! सौ वर्ष बीत गए तब भी प्लासी मिलता रहता है। यह गुरू परंपरा आज सौ वर्ष से चलते हुए आज सन् 1857 के 23 जून का उदय हुआ है। इस दिन तेरा प्रतिशोध पूरा किया जाएगा-ऐसे आश्वासन हिंदभूमि को भविष्यवक्ताओं ने दिया है। नाना साहब, उसकी पूर्ति करना या न करना-यह यद्यपि ईश्वराधीन है फिर भी उसके लिए तुम्हारा जो कर्तव्य है वह तुम पूरा करोगे न! और यह कर्तव्य पूरा करने का शुभ अवसर न गंवाने के लिए ही इस दिन नाना की सेना में बड़ा हल्ला-गुल्ला मचा हुआ था। आज तक जैसा कभी नहीं किया ऐसा जोरदार हमला करने का निश्चय कर यद्यपि लश्कर का हर व्यक्ति नहीं फिर भी सारे-के-सारे भाग सज्जित हो गए थे। तोपखाना, घुड़सवार और पैदल-सारे लश्कर उस ऐतिहासिक दिन के स्मरण से स्फूर्तिमान होकर रणांगण में उतर पड़े। उनमें जो बहुत बहादुर थे उन्होंने एक तरफ जाकर गंगा का पानी हाथ में लेकर या कुरान पर हाथ रखकर प्रतिज्ञा ली कि आज या तो स्वतंत्रता प्राप्त करनी है या मारते-मारते मर जाना है। घुड़सवारों ने ऐसी दौड़ लगाई कि शत्रु की गोलाबारी की परवाह न करते वे चारदीवारी तक जाकर भिड़ गए। पैदल सेना ने कपास के बड़े-बड़े गट्ठों को धकेलते-धकेलते उसके सहारे से चारदीवारी पर गोलियों की बौछार चालू की। विद्रोहियों की सेना से आसपास के गांववाले भी आकर मिल गए थे। अंग्रेजों ने भी चारदीवारी से गोलियों और तोप-गोलों की बौछार चालू रखी थी। विद्रोहियों की सेना को रोकना यद्यपि उन्हें असंभव हुआ, फिर भी उन्होंने उन्हें चारदीवारी पर चढ़ने नहीं दिया। लड़ाई का जोश भी जल्दी ही ठंडा पड़ गया और प्लासी के दिन का आधा बदला लेकर विद्रोही स्वयं ही लौट आए। परंतु कानपुर का यह अंतिम आक्रमण बिलकुल ही व्यर्थ नहीं गया। उस दिन के हमले से अंग्रेजों की सारी आशाएं विनष्ट हो गईं। उनका सारा धीरज भी टूट गया और इसके आगे नाना के हाथ से बच पाना असंभव है, ऐसा उनका स्पष्ट दिखाई दिया। 23 जून नहीं, 25 जून को अंग्रेजों ने संधि के लिए झंडा लगा दिया। 87 यह झंडा देखते ही श्रीमंत ने युद्ध रोकने का आदेश दिया और जेलबंद अंग्रेजों में से एक महिला के साथ जनरल व्हीलर को यह चिट्ठी भेजी-‘‘क्वीन विक्टोरिया की प्रजा को-डलहौजी की 1857 का स्वातंत्र्य समर – 193 87 अधिकतर अंग्रेज इतिहासकार यह बात छोड़ देते हैं, यह बात ध्यान में रखने की है। श्री तात्या टोपे की जबानी इस बात का स्पष्ट उल्लेख है-‘‘जनरल व्हीलर ने शांति की पताला फहराई और युद्ध बंद हो गया।