भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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राजनीति से जिनका किसी भी तरह का संबंध नहीं हो और जो शस्त्र नीचे रखकर शरण आने को तैयार होंगे उन्हें इलाहाबाद सुरक्षित पहुंचाया जाएगा।” यह चिट्ठी अजीमुल्ला खान के हस्ताक्षरों और नाना के आदेश से लिखी हुई है। यह चिट्ठी आते ही जनरल व्हीलर ने उस पर विचार करने के सारे अधिकार कैप्टन मूर एवं व्हाइटिंग को दिए और उन दोनों अधिकारियों ने नाना के सामने आत्मसमर्पण करने का निश्चय पक्का किया। दूसरे दिन 23 जून को नाना की ओर से ज्वाला प्रसाद और अजीमुल्ला खान, अंग्रेजों की ओर से मूर, व्हाइटिंग और रोचे मिले। अंग्रेज अपनी सारी तोपें, खजाना, गोला-बारूद और शस्त्रास्त्र नाना को सौंप दें और नाना उन्हें खाने-पीने की सामग्री देकर इलाहाबाद पहुंचा दें-यह तय हुआ। ये शर्तें एक कागज पर लिखी गईं और श्रीमंत नाना के हस्ताक्षर लेने अजीमुल्ला खान आदि लौट आए। इस भेंट में आरंभिक भाषण अंग्रेजी में होने के बाद शेष भाषण हिंदुस्थानी में हुए। 88 दोपहर के समय अंग्रेज उसी रात निकलें, या प्रातः निकलें इस संबंध में थोड़ी बातचीत होकर यह तय हुआ कि उस रात सारा कब्जा नाना के हाथ में दिया जाए और अंग्रेज दूसरे दिन भोर में निकलने की तैयारी करें। इस तरह दोनों पक्षों के मध्य निश्चित संधिपत्र को लेकर मि. टॉड (नाना के महल का अंग्रेजी वाचक) श्रीमंत के पास आया। उसे नाना ने बहुत आदर से बैठाया और कुशल-क्षेम की पूछताछ की। उसी रात अंग्रेजों ने अपने शस्त्र नीचे रखे, तोपें नाना को सौंप दी गईं और ब्रिगेडियर ज्वाला प्रसाद ने अपने दो अनुचरों के साथ उस चारदीवारी में अपना शिविर बनाया। उस रात कानपुर के मजिस्ट्रेट होला सिंह और तात्या टोपे ने मल्लाहों को पैसा देकर लगभग चालीस नौकाएं तैयार की। उनका निरीक्षण करने हाथी पर बैठकर आए अधिकारियों ने शिकायत की, इसलिए सौ मजदूर तुरंत लगाकर नौकाओं पर आच्छादन और बैठने के लिए बांस के फर्श बनाए गए। अनाज और अन्य आवश्यक सामग्री भी उस पर चढ़ा दी गई। परंतु इधर जब अंग्रेजों की जाने की तैयारी चल रही थी तब उधर कानपुर में कौन-कौन आने लगा है यह देखने के अतिरिक्त उस जावक पक्ष के साथ ही आवक पक्ष का भी ब्योरा न दिया जाए तो हिसाब बराबर ध्यान में नहीं आएगा। श्रीमंत जाना साहब ने स्वतंत्रता का ध्वज कानपुर में लगा दिया, यह समाचार चारों ओर फैल जाने के बाद से सारे धर्मवीर और देशवीर बाढ़ की तरह वहां आने लगे थे। गांव-गांव से युवा स्वयंसेवक उधर आ रहे थे। जिस गांव से स्वयंसेवक भेजना संभव नहीं था, उस गांव से धन की सहायता आ रही थी। परंतु केवल इन स्वयंसेवकों की भीड़ ही कानपुर की ओर आ रही थी, ऐसा नहीं था। विद्रोह में विफल और हारे हुए अनाथ, अंग्रेजी दासता से बेजार हुए लोग भी, नाना के झंडे के नीचे फिरंगियों से प्रतिशोध लेना चाहिए, ऐसी 1857 का स्वातंत्र्य समर - 194 88 रेड पैंफलेट, भाग 1 ।