भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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गर्जना करते रात-दिन आ रहे थे। जलाए गए गांवों का धुआं वहां आ गया। मृत व्यक्तियों की आत्मा के विकृत भूत भी वहां आए थे। इलाहाबाद और काशी के सिपाहियों पर और उनके बीवी-बच्चों से क्रूर प्रतिशोध लिये जाने की खबरों के साथ वहां के सैकड़ों सिपाही गत हफ्ते कानपुर आए थे। जिनके बूढ़े बाप पेड़ों पर अंग्रेजी अंक आठ (8) के आंकड़े बनाकर अंग्रेजों ने टांगे थे, ऐसे सैकड़ों भारतीय तरुण पुत्र वहां आए थे। जिनकी युवा पत्नियों को उनके पालने में सोए बच्चे सहित नील ने जीवित जलाया था उनके पति भी वहां आए थे। जिनकी बच्चियों के घुंघराले बालों और कपड़ों को आग लगाकर उसे देख-देखकर सोल्जर तालियां पीट रहे थे-ऐसे बाप वहां इकट्ठा हो गए थे। जिनका देश बेचिराग हुआ था, जिनका धर्म पैरों से कुचला जाता था जिनके राष्ट्र की स्वतंत्रता छीन ली गई थी-ऐसी बेचैन आत्माएं-इसका प्रतिशोध लेना है-इसका बदला लेना है, ऐसा कहती हुई उस राष्ट्रध्वज के चारों और हल्ला-गुल्ला कर रही थीं। और अब यह विजय दिवस आने पर भी जब श्रीमंत नाना साहब अंग्रेजों को इलाहाबाद पहुंचा देने का वचन देने लगे तब उन सिपाहियों और लोगों के मन में आशा भंग होने से बादल गरजने लगे। नदी पर नौकाओं की तैयारी देखने आए हुए अंग्रेज अधिकारियों को भागीरथी के तीर पर इधर-उधर डेरा लगाए सिपाहियों में-कत्ल-कत्ल की चल रही फुसफुसाहट स्पष्ट सुनाई दे रही थी। ऐसा कहते हैं कि राजमहल के एक पंडित ने राष्ट्र के साथ विश्वासघात करनेवालों और हत्यारों का शिरश्छेद करने में धर्म की कोई रोक नहीं है, यह भी सिपाहियों को समझा दिया था।⁸⁹ इस भयानक वातावरण में जून की 27 तारीख का उदय हुआ। सत्तीचौरा घाट से अंग्रेजों को संदेश दिया जाना था। उस घाट के इधर-उधर तोपें तनी हुई थीं और घुड़सवार और पैदल सेना भी वहां भीड़ किए थी। कानपुर शहर के हजारों नागरिक गंगा किनारे आज क्या देखने को मिलेगा, इस संबंध में अपने-अपने मन में भिन्न-भिन्न चित्र बनाते हुए सवेरा होते ही उस घाट की ओर चल पड़े थे। अजीमुल्ला खान, श्रीमंत बाबा साहब और सेनापति तात्या टोपे भी उस घाट के पास एक मंदिर के चबूतरे पर जाकर खड़े थे। उस मंदिर का नाम भी उस प्रलय काल को शोभा देनेवाला था। मानो सारे प्रदेश का अधिपति पद उस मंदिर को दिया गया है, ऐसा लगता है। क्योंकि उस मंदिर में हरदेव की मूर्ति स्थापित थी। चारदीवारी का स्थान छोड़कर गंगा किनारे अंग्रेजों को लाने के लिए नाना ने उत्तम वाहन भेज दिए थे। सर हो व्हीलर के लिए तो उत्तम रीति से सजे हाथी लेकर स्वयं नाना साहब के हाथी का महावत चारदीवारी के दरवाजे का आकर खड़ा हुआ था। उस हाथी पर अपना जुलूस निकलवाना सर व्हीलर के मन को नहीं जंचा, 1857 का स्वातंत्र्य समर – 195 ⁸⁹ ट्रेवेलियन कृत-'कानपुर'।