भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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इसलिए उसने बाल-बच्चे हाथी पर चढ़ा दिए और स्वयं पालकी में बैठा। अंग्रेज महिलाओं को भी पालकियां दी गई थीं। ऐसे ठाट से यह जुलूस निकला। कानपुर की चारदीवारी पर लगा अंग्रेजी झंडा नीचे उतारा गया और वहां सद्धर्म का संयुक्त ध्वज और स्वराज्य का झंडा लहराने लगा। अंग्रेजी अभिमान के हुए अपमान से दिल जलते हुए भी मृत्यु की कराल दाढ़ से छूटने का आनंद अंग्रेजों को हुआ था। उस आनंद के भाव में वे चारदीवारी पीछे छोड़ जाने को तैयार हो गए-पर कहां? और अब सुरक्षा का व्यवहार मिलेगा, ऐसा उनको विश्वास हो गया। पर डलहौजी की राजनीति से जिसका कुछ भी संबंध नहीं है, क्या ऐसा मनुष्य इस समूह में एक भी है? लेकिन इस प्रश्न की चर्चा अभी करने का कोई लाभ नहीं। गंगा घाट अभी डेढ़ मील दूर है। डेढ़ मील तक चलकर जानेवाला यह जुलूस गंगा की रेत पर उतरते ही उसके पीछे सिपाहियों की पंक्तियों ने पीछे का रास्ता रोक दिया। पालकी से उतरते या हाथी से उतरकर नाव पर चढ़ते अंग्रेजों को उस दिन हाथ का सहारा देने कोई नेटिव तैयार नहीं हुआ। नहीं, ऐसा नहीं। एक-दो विशेष स्थानों पर पालकी से उतरते समय सहायता मिली, परंतु वह हाथ का सहारा देने नहीं, हाथ दिखाते समय थी। कर्नल एवर्ट घायल था, अतः उसे एक डोली में डालकर ले जाया जा रहा था। उसकी वह डोली बीच में ही रोककर एक सिपाही बोला, "क्यों कर्नल साहब, ये परेड आपको कैसी लगी? रेजिमेंट की वरदी कैसी है?" ऐसी बात करते-करते उसने उसे नीचे खींचा और तलवार से उसके टुकड़े कर दिए। उस कर्नल की स्त्री पास ही खड़ी थी। उसे कुछ लोग कहने लगे, "तू स्त्री है, इसलिए तुझे जीवनदान दिया!" पर एक क्रूर साथी चिल्लाया, "अरे हटो! स्त्री! पर यह गोरी है न? फिर कर दो टुकड़ें" वाक्य समाप्त होने के पहले उस वाक्य के भयानक अर्थ की पूर्ति हो चुकी थी। नदी में सारी नौकाएं अनाज आदि से भरी तैयार थीं, यह बात अंग्रेजों की समिति ने ही खोज के बाद सिद्ध की है। उन नौकाओं पर पानी में चलकर कुछ लंगड़ाते हुए अंग्रेज लोग जाकर बैठने लगे। इधर-उधर स्तब्धता थी। नौकाएं भर गई थीं। मल्लाह नौकाओं पर चढ़ गए थे। नौकाएं आगे बढ़ें, इसलिए श्रीमंत नाना ने अपना हाथ हवा में आगे-पीछे घुमाकर आदेश दिया। इतने में एक कोने से उस भयप्रद शांति को भंग करने के लिए किसी ने एक बिगुल जोर से फूंका। उस घाट के श्री हरदेव का प्रलयकाली डमरू तो नहीं तो नहीं डमडमाया? क्योंकि उस बिगुल का कर्कश-हुंकार-होते ही तोपें, बंदूकें, तलवारें, कटारें, बैनट एकदम चलने लगे। मल्लाह नौका से कूदकर भूमि पर आ गए और सैनिक भूमि पर से पानी में कूद पड़े। "मारो फिरंगी को," "छांटो गनीम को।" इसके सिवाय एक शब्द कोई बोल नहीं रहा था। इतने में सारी नौकाएं जलने लगीं। अंग्रेजी पुरुष, स्त्रियां, बच्चे सारे गंगा में छलांगें लगाने लगे। कोई तैरने लगा, कोई 1857 का स्वातंत्र्य समर - 196