१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंडूबने लगा, कोई जलने लगा और सारे-के-सारे जल्दी या देर में गोलियों से चित हो गए। मांस के लोथड़े, कटे सिर, टूटे बाल, छिन्न हुए हाथ, टूटे पैर, रक्त की बाढ़। सारा गंगाजल लाल-लाल हो गया। पानी में से कोई अंग्रेज सिर उठाता कि उसे गोली लग जाती। पानी में सिर छिपाए तो घुटकर मर जाए, ऐसा हरदेव का कोप हुआ। प्लासी का ऐसा वार्षिकोत्सव मनाया गया। यह प्रातः दस बजे का समय था। श्रीमंत नाना उस दिन उस समय अपने दीवानखाने में अकेले ही चक्कर लगा रहे थे, ऐसा कहते हैं। भागीरथी के तीर पर श्री हरदेव की अध्यक्षता में मनुष्य प्राणियों की उन दो भिन्न जातियों में सौ साल के हिसाब का मिलान हो रहा था तब श्रीमंत नाना दीवानेखाने में विचलित मन थे, इसमें आश्चर्य क्या था। ऐसे क्षण इतिहास के एक-एक अध्याय के अंतिम अक्षर होते हैं। एक-एक युग की वह समालोचना होती है। ऐसे क्षण का कर्तव्य जिसकी ओर आया था वह नाना उस समय दीवानखाने में चक्कर लगाते समय उनके मन में जो विचार आ रहे हों वह करें। परंतु उन्हें विचार करने को बहुत समय नहीं मिला। क्योंकि उसी समय एक घुड़सवार दौड़ता आया और उसने-सत्तीचौरा घाट पर सिपाही अंग्रेजों को पूरी तरह काट रहे हैं-यह समाचार दिया। यह समाचार सुनते ही नाना ने उसको वापस लौटाया और उसके साथ सख्त आदेश दिया, "गोरे पुरुषों को काटें, पर गोरी वापस लौटाया और उसके साथ सख्त आदेश दिया, "गोरे पुरूषों को काटें, पर गोरी औरतों, बच्चों को हाथ न लगाएं।'"⁹⁰ नाना के आदेश के दूसरे भाग का नील के आदेशों में अभाव ही मिलता है-यह जाते-जाते कहना ही होगा। नाना का आदेश जब सत्तीचौरा पर पहुंचा, उस समय सिपाहियों के शिकार का खेल पूरे रंग पर था। नौकाओं के कड़कड़ाकर गिरते ढेर में गोरे जल रहे थे तो कितने ही तैरकर पार निकले जाने के प्रयास में थे। उनके पीछे शिकारी कुत्तों-से आपे से बाहर क्रोध से गुर्राते सिपाही भी तैरने लगे। दांत में तलवारें पकड़ और हाथ में पिस्तौलें लेकर पानी में सिपाहियों ने भयंकर शिकार का खेल किया। जनरल व्हीलर पहले झटके में ही मारा गया। हेंडरसन मारा गया। पर कितने मार डाले गए, इसकी सूची देने की अपेक्षा ऐसे स्थान पर कौन नहीं मारा गया, इसी की सूची देना अच्छा! नाना का संदेश आते ही सारी मार-काट बंद हो गई और करीब एक सौ पच्चीस महिलाएं, बच्चे जीवित बाहर निकाले गए। उन्हें सबदा कोठी की ओर कैद करके ले जाया गया और शेष रहे सारे यूरोपियन पुरुषों को एक कतार में खड़ा कर उनका शिरश्छेद करने का आदेश उन्हें पढ़कर सुनाया गया। उसमें से एक ने प्रार्थना के लिए समय मांगा, वह दिया गया। उन 1857 का स्वातंत्र्य समर - 197 ⁹⁰ फॉरेस्ट स्टेट पेपर्स तथा के एवं मैलसन कृत 'म्यूटिनी' के खंड 2, पृष्ठ 258 पर भी यह अंकित है कि "लगभग सभी इतिहासकारों ने एकमत से यह स्वीकार किया है कि नाना साहब को समाचार प्राप्त ही उन्होंने यह आदेश दे दिया था।''