भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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सबने प्रार्थना की और वह पूरी होते ही सिपाहियों की तलवारों ने उनके सिर सटासट उड़ा दिए। उन चालीस में से एक नौका भाग गई और उस नौका में रास्ते के गांवों के हमले से बचे दो-चार अंग्रेज यदि रह गए तो वह दुर्विजय सिंह नामक जमींदार की करूणा से। इस जमींदार ने उन नंगे, मरते साहबों को घी-रोटी खिलाकर एक माह मेहमानी करके इलाहाबाद भिजवा दिया। सारांश यह कि कानपुर में 7 जून को जो एक हजार अंग्रेज जीवित थे उनमें से चार पुरूष और एक सौ पच्चीस स्त्री-पुरूष ही 30 जून को जीवित थे। उनमें से ये एक सौ पच्चीस स्त्री, बच्चे नाना की कैद में थे और चार अधमारे पुरूष दुर्विजय सिंह के दीवानखाने में दवा-दारू करवा रहे थे। पर यह सूची अभी अंतिम नहीं हुई है, इसमें भी अभी जोड़-घटाव होना है। यह जोड़-घटाव होने तक अंग्रेज स्त्रियों और बच्चों को नाना ने कैद में डालने के बाद उनकी व्यवस्था कैसे क्या रखी गई थी, यह भी संक्षेप में कहने लायक है। इन स्त्रियों पर जबरदस्ती की गई, रास्ते में उनके स्तन काटे गए और स्वयं नाना ने उनपर बलात्कार करने का प्रयास किया आदि बेशर्मी के आरोप एवं तथाकथित 'सत्य जानकारियां' बड़े-बड़े उन अंग्रेजों के इन सब आरोपों की छानबीन करने के लिए नियुक्त कमीशन की रिपोर्ट में ये सारे बयान पूरे-के-पूरे झूठे हैं, यह स्पष्ट लिखा ही है।⁹¹ फिर भी इतने से यह हकीकत समाप्त नहीं होती। उन स्त्रियों को नाना ने मार-काट से बचाकर-नील, रेनाल्ड्स, हैवलॉक इन सबको लज्जित किया। इतना ही नही अपितु उन स्त्रियों को कैद में रखकर उनको अमानुषकि यंत्रणाएं भी नहीं दी गई। इतना ही नहीं, अंग्रेजों ने हिंदुस्थान में या ऑस्ट्रिया ने इटली में या स्पेन ने मूरिश लोगों को या ग्रीक ने तुर्की लोगों को ऐसी ही परिस्थिति में जितनी कठोरता से सताया है उसकी शतांश कठोरता भी अपने व्यक्ति, राष्ट्र या धर्म संबंधी कृतघ्न शत्रु जाति को उस सन् 1857 के उग्र प्रलय में नहीं दिखाई गई! यह अंग्रेजी इतिहास से प्रमाणित है। कानपुर हत्याकांड की इस पहली गड़बड़ी में कुछ घुड़सवारों ने चार अंग्रेज और कुछ धर्मांतरित स्त्रियों को भगाया था। नाना साहब को यह समाचार मिलते ही उन्होंने उन सवारों को पकड़वाकर उनकी भर्त्सना की और भगाई हुई औरतों को छोड़ देने के आदेश दिए।⁹² कैदी स्त्रियों और बच्चों को रोटी और 1857 का स्वातंत्र्य समर – 198 ⁹¹ 1. म्योर का प्रतिवेदन तथा विल्सन का प्रतिवेदन; के और मैलसन कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड 2, पृष्ठ 267। ⁹² 2. ट्रेवेलियन कृत-'कानपुर', पृष्ठ 299 ।