१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 195, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंमांस बीच-बीच में दिया जाता था।⁹³ किसी भी तरह के कष्टकारी श्रम का काम बलपूर्वक कैदियों पर नहीं लादा जाता। बच्चों को दूध मिलता था। उनकी निगरानी के लिए बेगम नाम की एक महिला नियुक्त थी। कैद में हैजा और पेचिश शुरू हो जाने पर कैदियों को शुद्ध हवा मिले, इसलिए रोज तीन समय खुले में लाया जाता।⁹⁴ फिर भी फिरंगियों के प्रति लोगों में कैसा भयंकर क्षोभ था यह दर्शाने के लिए यहां एक कहानी प्रस्तुत कर रहा हूं। कैदखाने की दीवार पर से एक ब्राह्मण में झांककर देखा कि आज तक जो स्त्रियां पालकी के सिवाय एक कदम भी उठाती नहीं थीं वे सवयं के कपड़े धो रही हैं। ब्राह्मण को उनपर दया आ गई और उसने पड़ोसी से कहा, "उनके कपड़े धोबी को क्यों नहीं दिए जाते?'' उस ब्राह्मण द्वारा बिना बात दिखाई गई इस मानवता के प्रति घृणा से उस पड़ोसी ने ब्राह्मण को एक चांटा मारा। कैद की कुछ ही स्त्रियों से चक्की पिसवाई जाती और उसके बदले में उनको एक रोटी का आटा दिया जाता। स्वयं जीवित रहने के लिए कितने कष्ट उठाने पड़ते हैं-इसका पाठ उन्हें मिला। ऐसी कैद का अंत क्या हुआ और उसके लिए क्या कारण घटित हुआ, इसका खुलासा यथा अवसर आने तक इन महिलाओं और बच्चों को उस कैद में ही छोड़कर अधिक महत्त्व की बातों को देखें। 25 जून को कानपुर के अंग्रेजी शासन का पूर्ण निर्मूलन हो जाने के बाद लगभग पांच बजे श्री नाना ने एक विशाल दरबार आयोजित किया। उस राजदरबार के सम्मानार्थ उस समय उपस्थित सारे लश्कर की भी परेड बुलाई गई। पैदल सेना की छह पूरी रेजिमेंट और घुड़सवारों की दो रेजिमेंट उस समारोह में उपस्थित थीं। इसके अतिरिक्त गांव-गांव से इस स्वदेशीय युद्ध के लिए आई हुई स्वयंसेवकों की टोलियां भी अपने-अपने निशान लेकर खड़ी थी। जिसके पराक्रम से कानपुर जीता जा सका था उस मुट्ठी भर परंतु शौर्ययुक्त तोपखाने का मान इस दिन यथार्थ में प्रथम रखा हुआ था। बाला साहब सेना में पहले से ही प्रिय होने से उनके आते ही उनको 'खड़ी तालीम' दी गई। प्रथमतः दिल्ली के बादशाह के नाम एक सौ एक तोपें दागी गईं। सन् 1857 में हिंदू-मुसलमानों ने कितने आदर से और बंधुत्व भाव से एक-दूसरे से अंत तक व्यवहार किया-यह यहां ध्यान में रखने लायक है। बाद में श्रीमंत नाना साहब की सवारी मैदान में आई, यह देखते ही सबने महाराज की जय-जयकार की और उन्हें भी इक्कीस तोपों की सलामी दी गई। लड़ाई के इक्कीस दिनों के लिए ये इक्कीस तोपें थीं-ऐसा अनेक कहते हैं । उस सम्मान के लिए महाराज ने उस विशाल सेना का आभार माना और वे 1857 का स्वातंत्र्य समर - 199
⁹³ 'नैरेटिव्स', पृष्ठ 113 । ⁹⁴ नील ने स्वयं अपने प्रतिवेदन में लिखा है-"प्रारंभ में बंदियों को ठीक भोजन नहीं मिलता था; किंतु बाद में उन्हें अच्छा भोजन दिया गया और उनकी सेवा के लिए नौकर भी नियुक्त कर दिए गए।"