१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबोले, "यह आज की विजय आप सबकी है, इसलिए इसमें आप सबका भी समान सम्मान हैं˙˙˙।''⁹⁵ बाद में इस संयुक्त धर्मयुद्ध की उस विजय के लिए नाना ने एक लाख रूपए उस लश्कर को पुरस्कार देने का आदेश दिया है, यह घोषित होते ही इक्कीस तोपों की ओर सलामी हुई। बाद में नाना के भतीजे राव साहब और बाला साहब प्रत्येक को सोलह-सत्रह तोपों की सलामी दी गई। ब्रिगेडियर ज्वाला प्रसाद और सेनापति तात्या टोपे को भी ग्यारह-ग्यारह तोपों का सम्मान मिला। इस तरह उस दिन के सूर्यनारायण को स्वातंत्र्य समर में विजयी तोपों के धमाके सुनाकर सारी सेना को अपने शिविर में भेज दिया गया। लश्कर की यह परेड हो जाने के बाद श्रीमंत नाना साहब श्रीमंत बाला साहब के साथ ब्रह्मवर्त के उस इतिहास-प्रसिद्ध राजभवन की क्या शोभा होगी! पेशवाओं का वह पुरातन सिंहासन समारोहपूर्वक सुमंत्रित कर दरबार में लाया गया। श्रीमंत नाना साहब के मस्तिष्क पर राजतिलक लगाया गया और हजारों नागरिकों और तोपों के धमाकों-जयघोषों में श्रीमंत नाना साहब पेशवा एक स्वतंत्र और स्वकष्टार्जित, स्वदेश-सम्मत और स्वधर्म-प्रतिपालक सिंहासन पर चढ़ गए। उस दिन कानपुर से हजारों लोगों ने नाना को नजराने और उपहार भेजे थे।⁹⁶ हिंदू लोग खुला कहने लगे-'आज से अब राजा रामचंद्र की विजय होगी।⁹⁷ स्वधर्म और स्वराज्य की मंगल सुगंध बहुत दिनों बाद बह रही है। मराठों की जिस गद्दी को रायगढ़ से अंग्रेजों ने धकेला था, वह अंग्रेजी रक्त और मांस से ब्रह्मवर्त में पुनर्भूर्त हुई हैं। आज उसके समृद्ध वृक्ष को उसमें स्वराज्य का फल लगा देखकर नाना को क्या लगा होगा? पर नाना की बालसखी छबीली उधर क्या कर रही है? नाना को घोड़े पर बैठते देख जो घोड़े पर बैठती थी, नाना हाथी पर बैठें तो वह भी हाथी पर बैठे बिना न रहती थी, वह कानपुर में नाना के स्वातंत्र्य तिलक से विभूषित सिंहासन पर विराजमान होने के पश्चात् झांसी में स्वकीय सिंहासनरोहण किए बिना-भूमि पर थोड़े ही बैठेगी। स्वतंत्रता के रण पट पर सिंहासन का भयानक दांव लगाने के लिए नाना साहब ने जिस दिन अपना पासा कानपुर में फेंका उसी दिन रानी ने भी अपना पासा झांसी में फेंका। इसी का नाम है साथी'गुड़यां! 4 जून को इधर कानपुर में स्वातंत्र्य घोषणा की भयानक गड़गड़ाहट होने लगी, तभी उधर झांसी की चपला भी समर आकाश में कड़कने लगी। झांसी में सन् 1857 के मई माह में नेटिव पैदल सेना की 12वीं रेजिमेंट, 14वीं 1857 का स्वातंत्र्य समर – 200
⁹⁵ ट्रेवेलियन कृत- 'कानपुर', पृष्ठ 293 । ⁹⁶ वही, पृष्ठ 294 । ⁹⁷ सर कॉलिन कृत-'नेटिव' ।