१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघुड़सवार और एक तोपखाना-इतनी सेना रखी हुई थी और इस सेना का मुख्य अधिकारी कैप्टन डनलप था। मई माह के प्रारंभ में उस सेना में कुछ गुप्त योजना चलने का उड़ता समाचार अंग्रेज अधिकारियों के कानों में आने लगा। झांसी के मुख्य कमिश्नर स्कीन और डिप्टी कमिश्नर गार्डन के हाथ में सिपाहियों के कुछ पत्र लग जाने से यह स्पष्ट दिखने लगा कि रानी के किसी ब्राह्मण नौकर लक्ष्मणराव ने 12वीं रेजिमेंट से संपर्क साधा हुआ है और सिपाही विद्रोह कर अपने अधिकारियों को गारद करें, इसके लिए उसके लगातार प्रयास चल रहे हैं।⁹⁸ यह ब्राह्मण-लक्ष्मणराव पांडे-बाद में स्वतंत्र झांसी का दीवान बना। झांसी के धनवान ठाकुर लोगों में एक तरह की खलबली मची है और वे अंग्रेजी राज उलटने की चर्चा कर रहे हैं-पर यह बात कोई बहुत महत्त्व की नहीं है, क्योंकि ये ठाकुर कभी किसी सरकार के राजनिष्ठ रहे ही नहीं। फिर भी झांसी की सेना राजनिष्ठ रहेगी, यह अंग्रेजों का दृढ़ विचार था। सेना की राजनिष्ठा के साथ ही रानी राजनिष्ठा के संबंध में भी कुछ संशय करने का कोई कारण नहीं था। क्योंकि अभी कुछ समय पूर्व ही उसने समय आने पर अंग्रेजों की यथासंभव सहायता करना कबूल किया है। इतना ही नहीं अपितु वह सहायता कर सके, इसलिए अपने पास की सेना बढ़ाने की अनुमति उसने मांगी है। ऐसी स्थिति में झांसी विद्रोह की ज्वाला से निर्भय है। मई माह की 31 तारीख को भी वरिष्ठ अधिकारियों को झांसी के अंग्रेज ऐसी रिपोर्ट करें तो उसमें क्या हर्ज है। तारीख 1 जून को झांसी में कुछ अंग्रेज अधिकारियों के बंगलों को आग लगी। यह आग जून के पहले हफ्ते को इतना संदेश देकर निकल गई कि जिस दिन उधर कानपुर उठा उसी दिन 4 जून को झांसी भी विद्रोह कर उठी। सिपाहियों की एक टोली ने अपने हवलदार के इशारे पर अकस्मात् चढ़ाई कर स्टार फोर्ट को उसमें स्थित बारूदखाने और शस्त्रागार सहित हथिया लिया। कैप्टन डनलप ने घुड़सवारों और शेष बचे हुए पैदल और तोपखाने को परेड पर बुलाकर घटना की जानकारी दी तो सारे नेटिव सिपाहियों ने राजनिष्ठा और कंपनी की जय-जयकार कर कहा कि हम कंपनी के लिए जान देने में भी नहीं हिचकेंगे। राजनिष्ठा का ऐसा प्रदर्शन इधर चल रहा था तो उधर अंग्रेजों ने अपने बाल-बच्चे किले में पहुंचाकर उस किले को लड़ाने की तैयारी शुरू कर दी और सहायता के लिए नौगांव अंग्रेजी छावनी को तथा अन्य स्थानों पर भी तत्काल पत्र भेजे। ये पत्र डालने डनलप साहब डाकघर की ओर जाने लगे तो उन्हें परेड के मैदान पर 12वीं पलटन के सिपाहियों ने गोली से मार डाला। एनसाइन टेलर भी मारा गया। तब सारे अंग्रेज डर के मारे किले की ओर चले गए। उस किले में अंग्रेजों ने सुरक्षा के लिए तोपें निशाने पर लगाकर बारूद की व्यवस्था की हुई थी और उनका यह निश्चय था कि 1857 का स्वातंत्र्य समर – 201 ⁹⁸ चार्ल्स बाल, खंड 1, पृष्ठ 271।