भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 418 में से

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पृष्ठ 198

बाहर से सहायता आने तक एक हफ्ते तक किला बड़ी सहजता से लड़ाया जा सकता है। सिपाहियों ने, छावनी में जो यूरोपियन मिले, उन्हें मारकर फिर किले पर चढ़ाई की। अंग्रेजों ने रानी की सहायता प्राप्त करने के लिए स्कॉट और पर्सेल बंधु जैसे तीन आदमी भेजे थे। उन्हें रास्ते में ही पकड़कर मार डाला गया। 7 जून को विद्रोहियों ने किले पर जोरदार आक्रमण किया। उनके पास अच्छी तोपें न होने से किला जीतना बहुत कठिन होने लगा। फिर भी उनका संख्या बल अधिक होने से वे वैसे ही आगे बढ़ते रहे। किले में अंग्रेजों के साथ कुछ विश्वासपात्र नेटिव भी घुसे हुए थे। उनमें से एक किले दरवाजे को बंद करने के लिए बनी दीवार चुपचाप गिराने लगा। उनमें से एक किले दरवाजे को बंद करने के लिए बनी चुपचाप गिराने लगा। लेफ्टिनेंट पावस ने यह देखते ही उस सेवक पर गोली मारी, तभी दूसरे सेवक ने लेंफ्टिनेंट को तलवार से काट डाला। लेंफ्टिनेंट को गर्गेस ने उस सेवक का काम तमाम किया। अंग्रेजों ने अपने को छिपाकर तोपों और बंदूकों का हमला चालू रखा था। कमिश्नर गार्डन ऐसे ही चोरी से बंदूकें चला रहा था तो उसके चेहरे से परिचित एक विद्रोही ने सीधे तीर चलाकर उसे मार डाला। गार्डन साहब के मरते ही किले के अंग्रेजों का धीरज टूटने लगा और बाहर विद्रोहियों का उत्साह बढ़ने लगा। अंग्रेजों की गोलीबारी की परवाह न करते हुए घुड़सवारों का रिसालदार काले खान और झांसी का तहसीलदार अहमद हुसैन–इन दो बहादुर योद्धाओं ने विद्रोहियों का झंडा किले की दीवार तक जा भिड़ाया और अब विद्रोही सेना किले में पल–दो–पल में घुसेगी, ऐसा रंग दिखने लगा। तब अंग्रेजों ने किले पर संधि का झंडा लगाया और लड़ाई बंद हो गई। दूसरे दिन विजयी विद्रोहियों के प्रतिनिधि झांसी का प्रसिद्ध हकीम सालेह मोहम्मद से अंग्रेजों ने बातचीत शुरू की और जीवनदान मांगा। यह शर्त सालेह मोहम्मद ने कुरान पर हाथ रखकर स्वीकार की और अंग्रेजों ने तुरंत किले के दरवाजे खोल दिए। अंग्रेजों को शस्त्र नीचे रखने के आदेश हुए। उन्होंने शस्त्र नीचे रखे और वे हतभागी गोरे लोग बाहर आने लगे और सिपाही उन्हें देखते ही 'मारो फिरंगी को' कहते हुए उनपर टूट पड़े। 8 जून को अंग्रेज पुरुषों के हाथ बांधकर उनका एक जंगी जुलूस शहर में से निकाला गया। उस जुलूस में ही झांसी का मुख्य कमिश्नर स्कीन अधोमुख चल रहा था। जोगन बाग के पास आते ही रिसालदार साहब ने आदेश दिया-“एक-एक गोरा काटा जाय।” झांसी के कैदखाने के मुसलमान दारोगा ने स्कीन साहब का सिर कलम किया और तत्काल ही पुरुष, महिला, बच्चे मिलाकर साठ गोरे सिर गेंद की तरह उछलकर खड़े थे। वे औरतें, उनकी गोद के छोटे बच्चे और सटकर खड़े बड़े बच्चे भी गोरे रंग अपराध के कारण काले रंग की तलवार से 'सटाक' काटे गए। एक क्षण में रक्त की तेज धार बहने लगी। झांसी के घनीभूत अन्याय का ऐसा द्रवीकरण हुआ। 1857 का स्वातंत्र्य समर — 202

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