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१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

राजनीति से जिनका किसी भी तरह का संबंध नहीं हो और जो शस्त्र नीचे रखकर शरण आने को तैयार होंगे उन्हें इलाहाबाद सुरक्षित पहुंचाया जाएगा।” यह चिट्ठी अजीमुल्ला खान के हस्ताक्षरों और नाना के आदेश से लिखी हुई है। यह चिट्ठी आते ही जनरल व्हीलर ने उस पर विचार करने के सारे अधिकार कैप्टन मूर एवं व्हाइटिंग को दिए और उन दोनों अधिकारियों ने नाना के सामने आत्मसमर्पण करने का निश्चय पक्का किया। दूसरे दिन 23 जून को नाना की ओर से ज्वाला प्रसाद और अजीमुल्ला खान, अंग्रेजों की ओर से मूर, व्हाइटिंग और रोचे मिले। अंग्रेज अपनी सारी तोपें, खजाना, गोला-बारूद और शस्त्रास्त्र नाना को सौंप दें और नाना उन्हें खाने-पीने की सामग्री देकर इलाहाबाद पहुंचा दें-यह तय हुआ। ये शर्तें एक कागज पर लिखी गईं और श्रीमंत नाना के हस्ताक्षर लेने अजीमुल्ला खान आदि लौट आए। इस भेंट में आरंभिक भाषण अंग्रेजी में होने के बाद शेष भाषण हिंदुस्थानी में हुए। 88 दोपहर के समय अंग्रेज उसी रात निकलें, या प्रातः निकलें इस संबंध में थोड़ी बातचीत होकर यह तय हुआ कि उस रात सारा कब्जा नाना के हाथ में दिया जाए और अंग्रेज दूसरे दिन भोर में निकलने की तैयारी करें। इस तरह दोनों पक्षों के मध्य निश्चित संधिपत्र को लेकर मि. टॉड (नाना के महल का अंग्रेजी वाचक) श्रीमंत के पास आया। उसे नाना ने बहुत आदर से बैठाया और कुशल-क्षेम की पूछताछ की। उसी रात अंग्रेजों ने अपने शस्त्र नीचे रखे, तोपें नाना को सौंप दी गईं और ब्रिगेडियर ज्वाला प्रसाद ने अपने दो अनुचरों के साथ उस चारदीवारी में अपना शिविर बनाया। उस रात कानपुर के मजिस्ट्रेट होला सिंह और तात्या टोपे ने मल्लाहों को पैसा देकर लगभग चालीस नौकाएं तैयार की। उनका निरीक्षण करने हाथी पर बैठकर आए अधिकारियों ने शिकायत की, इसलिए सौ मजदूर तुरंत लगाकर नौकाओं पर आच्छादन और बैठने के लिए बांस के फर्श बनाए गए। अनाज और अन्य आवश्यक सामग्री भी उस पर चढ़ा दी गई। परंतु इधर जब अंग्रेजों की जाने की तैयारी चल रही थी तब उधर कानपुर में कौन-कौन आने लगा है यह देखने के अतिरिक्त उस जावक पक्ष के साथ ही आवक पक्ष का भी ब्योरा न दिया जाए तो हिसाब बराबर ध्यान में नहीं आएगा। श्रीमंत जाना साहब ने स्वतंत्रता का ध्वज कानपुर में लगा दिया, यह समाचार चारों ओर फैल जाने के बाद से सारे धर्मवीर और देशवीर बाढ़ की तरह वहां आने लगे थे। गांव-गांव से युवा स्वयंसेवक उधर आ रहे थे। जिस गांव से स्वयंसेवक भेजना संभव नहीं था, उस गांव से धन की सहायता आ रही थी। परंतु केवल इन स्वयंसेवकों की भीड़ ही कानपुर की ओर आ रही थी, ऐसा नहीं था। विद्रोह में विफल और हारे हुए अनाथ, अंग्रेजी दासता से बेजार हुए लोग भी, नाना के झंडे के नीचे फिरंगियों से प्रतिशोध लेना चाहिए, ऐसी 1857 का स्वातंत्र्य समर - 194 88 रेड पैंफलेट, भाग 1 ।

गर्जना करते रात-दिन आ रहे थे। जलाए गए गांवों का धुआं वहां आ गया। मृत व्यक्तियों की आत्मा के विकृत भूत भी वहां आए थे। इलाहाबाद और काशी के सिपाहियों पर और उनके बीवी-बच्चों से क्रूर प्रतिशोध लिये जाने की खबरों के साथ वहां के सैकड़ों सिपाही गत हफ्ते कानपुर आए थे। जिनके बूढ़े बाप पेड़ों पर अंग्रेजी अंक आठ (8) के आंकड़े बनाकर अंग्रेजों ने टांगे थे, ऐसे सैकड़ों भारतीय तरुण पुत्र वहां आए थे। जिनकी युवा पत्नियों को उनके पालने में सोए बच्चे सहित नील ने जीवित जलाया था उनके पति भी वहां आए थे। जिनकी बच्चियों के घुंघराले बालों और कपड़ों को आग लगाकर उसे देख-देखकर सोल्जर तालियां पीट रहे थे-ऐसे बाप वहां इकट्ठा हो गए थे। जिनका देश बेचिराग हुआ था, जिनका धर्म पैरों से कुचला जाता था जिनके राष्ट्र की स्वतंत्रता छीन ली गई थी-ऐसी बेचैन आत्माएं-इसका प्रतिशोध लेना है-इसका बदला लेना है, ऐसा कहती हुई उस राष्ट्रध्वज के चारों और हल्ला-गुल्ला कर रही थीं। और अब यह विजय दिवस आने पर भी जब श्रीमंत नाना साहब अंग्रेजों को इलाहाबाद पहुंचा देने का वचन देने लगे तब उन सिपाहियों और लोगों के मन में आशा भंग होने से बादल गरजने लगे। नदी पर नौकाओं की तैयारी देखने आए हुए अंग्रेज अधिकारियों को भागीरथी के तीर पर इधर-उधर डेरा लगाए सिपाहियों में-कत्ल-कत्ल की चल रही फुसफुसाहट स्पष्ट सुनाई दे रही थी। ऐसा कहते हैं कि राजमहल के एक पंडित ने राष्ट्र के साथ विश्वासघात करनेवालों और हत्यारों का शिरश्छेद करने में धर्म की कोई रोक नहीं है, यह भी सिपाहियों को समझा दिया था।⁸⁹ इस भयानक वातावरण में जून की 27 तारीख का उदय हुआ। सत्तीचौरा घाट से अंग्रेजों को संदेश दिया जाना था। उस घाट के इधर-उधर तोपें तनी हुई थीं और घुड़सवार और पैदल सेना भी वहां भीड़ किए थी। कानपुर शहर के हजारों नागरिक गंगा किनारे आज क्या देखने को मिलेगा, इस संबंध में अपने-अपने मन में भिन्न-भिन्न चित्र बनाते हुए सवेरा होते ही उस घाट की ओर चल पड़े थे। अजीमुल्ला खान, श्रीमंत बाबा साहब और सेनापति तात्या टोपे भी उस घाट के पास एक मंदिर के चबूतरे पर जाकर खड़े थे। उस मंदिर का नाम भी उस प्रलय काल को शोभा देनेवाला था। मानो सारे प्रदेश का अधिपति पद उस मंदिर को दिया गया है, ऐसा लगता है। क्योंकि उस मंदिर में हरदेव की मूर्ति स्थापित थी। चारदीवारी का स्थान छोड़कर गंगा किनारे अंग्रेजों को लाने के लिए नाना ने उत्तम वाहन भेज दिए थे। सर हो व्हीलर के लिए तो उत्तम रीति से सजे हाथी लेकर स्वयं नाना साहब के हाथी का महावत चारदीवारी के दरवाजे का आकर खड़ा हुआ था। उस हाथी पर अपना जुलूस निकलवाना सर व्हीलर के मन को नहीं जंचा, 1857 का स्वातंत्र्य समर – 195 ⁸⁹ ट्रेवेलियन कृत-'कानपुर'।

इसलिए उसने बाल-बच्चे हाथी पर चढ़ा दिए और स्वयं पालकी में बैठा। अंग्रेज महिलाओं को भी पालकियां दी गई थीं। ऐसे ठाट से यह जुलूस निकला। कानपुर की चारदीवारी पर लगा अंग्रेजी झंडा नीचे उतारा गया और वहां सद्धर्म का संयुक्त ध्वज और स्वराज्य का झंडा लहराने लगा। अंग्रेजी अभिमान के हुए अपमान से दिल जलते हुए भी मृत्यु की कराल दाढ़ से छूटने का आनंद अंग्रेजों को हुआ था। उस आनंद के भाव में वे चारदीवारी पीछे छोड़ जाने को तैयार हो गए-पर कहां? और अब सुरक्षा का व्यवहार मिलेगा, ऐसा उनको विश्वास हो गया। पर डलहौजी की राजनीति से जिसका कुछ भी संबंध नहीं है, क्या ऐसा मनुष्य इस समूह में एक भी है? लेकिन इस प्रश्न की चर्चा अभी करने का कोई लाभ नहीं। गंगा घाट अभी डेढ़ मील दूर है। डेढ़ मील तक चलकर जानेवाला यह जुलूस गंगा की रेत पर उतरते ही उसके पीछे सिपाहियों की पंक्तियों ने पीछे का रास्ता रोक दिया। पालकी से उतरते या हाथी से उतरकर नाव पर चढ़ते अंग्रेजों को उस दिन हाथ का सहारा देने कोई नेटिव तैयार नहीं हुआ। नहीं, ऐसा नहीं। एक-दो विशेष स्थानों पर पालकी से उतरते समय सहायता मिली, परंतु वह हाथ का सहारा देने नहीं, हाथ दिखाते समय थी। कर्नल एवर्ट घायल था, अतः उसे एक डोली में डालकर ले जाया जा रहा था। उसकी वह डोली बीच में ही रोककर एक सिपाही बोला, "क्यों कर्नल साहब, ये परेड आपको कैसी लगी? रेजिमेंट की वरदी कैसी है?" ऐसी बात करते-करते उसने उसे नीचे खींचा और तलवार से उसके टुकड़े कर दिए। उस कर्नल की स्त्री पास ही खड़ी थी। उसे कुछ लोग कहने लगे, "तू स्त्री है, इसलिए तुझे जीवनदान दिया!" पर एक क्रूर साथी चिल्लाया, "अरे हटो! स्त्री! पर यह गोरी है न? फिर कर दो टुकड़ें" वाक्य समाप्त होने के पहले उस वाक्य के भयानक अर्थ की पूर्ति हो चुकी थी। नदी में सारी नौकाएं अनाज आदि से भरी तैयार थीं, यह बात अंग्रेजों की समिति ने ही खोज के बाद सिद्ध की है। उन नौकाओं पर पानी में चलकर कुछ लंगड़ाते हुए अंग्रेज लोग जाकर बैठने लगे। इधर-उधर स्तब्धता थी। नौकाएं भर गई थीं। मल्लाह नौकाओं पर चढ़ गए थे। नौकाएं आगे बढ़ें, इसलिए श्रीमंत नाना ने अपना हाथ हवा में आगे-पीछे घुमाकर आदेश दिया। इतने में एक कोने से उस भयप्रद शांति को भंग करने के लिए किसी ने एक बिगुल जोर से फूंका। उस घाट के श्री हरदेव का प्रलयकाली डमरू तो नहीं तो नहीं डमडमाया? क्योंकि उस बिगुल का कर्कश-हुंकार-होते ही तोपें, बंदूकें, तलवारें, कटारें, बैनट एकदम चलने लगे। मल्लाह नौका से कूदकर भूमि पर आ गए और सैनिक भूमि पर से पानी में कूद पड़े। "मारो फिरंगी को," "छांटो गनीम को।" इसके सिवाय एक शब्द कोई बोल नहीं रहा था। इतने में सारी नौकाएं जलने लगीं। अंग्रेजी पुरुष, स्त्रियां, बच्चे सारे गंगा में छलांगें लगाने लगे। कोई तैरने लगा, कोई 1857 का स्वातंत्र्य समर - 196

डूबने लगा, कोई जलने लगा और सारे-के-सारे जल्दी या देर में गोलियों से चित हो गए। मांस के लोथड़े, कटे सिर, टूटे बाल, छिन्न हुए हाथ, टूटे पैर, रक्त की बाढ़। सारा गंगाजल लाल-लाल हो गया। पानी में से कोई अंग्रेज सिर उठाता कि उसे गोली लग जाती। पानी में सिर छिपाए तो घुटकर मर जाए, ऐसा हरदेव का कोप हुआ। प्लासी का ऐसा वार्षिकोत्सव मनाया गया। यह प्रातः दस बजे का समय था। श्रीमंत नाना उस दिन उस समय अपने दीवानखाने में अकेले ही चक्कर लगा रहे थे, ऐसा कहते हैं। भागीरथी के तीर पर श्री हरदेव की अध्यक्षता में मनुष्य प्राणियों की उन दो भिन्न जातियों में सौ साल के हिसाब का मिलान हो रहा था तब श्रीमंत नाना दीवानेखाने में विचलित मन थे, इसमें आश्चर्य क्या था। ऐसे क्षण इतिहास के एक-एक अध्याय के अंतिम अक्षर होते हैं। एक-एक युग की वह समालोचना होती है। ऐसे क्षण का कर्तव्य जिसकी ओर आया था वह नाना उस समय दीवानखाने में चक्कर लगाते समय उनके मन में जो विचार आ रहे हों वह करें। परंतु उन्हें विचार करने को बहुत समय नहीं मिला। क्योंकि उसी समय एक घुड़सवार दौड़ता आया और उसने-सत्तीचौरा घाट पर सिपाही अंग्रेजों को पूरी तरह काट रहे हैं-यह समाचार दिया। यह समाचार सुनते ही नाना ने उसको वापस लौटाया और उसके साथ सख्त आदेश दिया, "गोरे पुरुषों को काटें, पर गोरी वापस लौटाया और उसके साथ सख्त आदेश दिया, "गोरे पुरूषों को काटें, पर गोरी औरतों, बच्चों को हाथ न लगाएं।'"⁹⁰ नाना के आदेश के दूसरे भाग का नील के आदेशों में अभाव ही मिलता है-यह जाते-जाते कहना ही होगा। नाना का आदेश जब सत्तीचौरा पर पहुंचा, उस समय सिपाहियों के शिकार का खेल पूरे रंग पर था। नौकाओं के कड़कड़ाकर गिरते ढेर में गोरे जल रहे थे तो कितने ही तैरकर पार निकले जाने के प्रयास में थे। उनके पीछे शिकारी कुत्तों-से आपे से बाहर क्रोध से गुर्राते सिपाही भी तैरने लगे। दांत में तलवारें पकड़ और हाथ में पिस्तौलें लेकर पानी में सिपाहियों ने भयंकर शिकार का खेल किया। जनरल व्हीलर पहले झटके में ही मारा गया। हेंडरसन मारा गया। पर कितने मार डाले गए, इसकी सूची देने की अपेक्षा ऐसे स्थान पर कौन नहीं मारा गया, इसी की सूची देना अच्छा! नाना का संदेश आते ही सारी मार-काट बंद हो गई और करीब एक सौ पच्चीस महिलाएं, बच्चे जीवित बाहर निकाले गए। उन्हें सबदा कोठी की ओर कैद करके ले जाया गया और शेष रहे सारे यूरोपियन पुरुषों को एक कतार में खड़ा कर उनका शिरश्छेद करने का आदेश उन्हें पढ़कर सुनाया गया। उसमें से एक ने प्रार्थना के लिए समय मांगा, वह दिया गया। उन 1857 का स्वातंत्र्य समर - 197 ⁹⁰ फॉरेस्ट स्टेट पेपर्स तथा के एवं मैलसन कृत 'म्यूटिनी' के खंड 2, पृष्ठ 258 पर भी यह अंकित है कि "लगभग सभी इतिहासकारों ने एकमत से यह स्वीकार किया है कि नाना साहब को समाचार प्राप्त ही उन्होंने यह आदेश दे दिया था।''

सबने प्रार्थना की और वह पूरी होते ही सिपाहियों की तलवारों ने उनके सिर सटासट उड़ा दिए। उन चालीस में से एक नौका भाग गई और उस नौका में रास्ते के गांवों के हमले से बचे दो-चार अंग्रेज यदि रह गए तो वह दुर्विजय सिंह नामक जमींदार की करूणा से। इस जमींदार ने उन नंगे, मरते साहबों को घी-रोटी खिलाकर एक माह मेहमानी करके इलाहाबाद भिजवा दिया। सारांश यह कि कानपुर में 7 जून को जो एक हजार अंग्रेज जीवित थे उनमें से चार पुरूष और एक सौ पच्चीस स्त्री-पुरूष ही 30 जून को जीवित थे। उनमें से ये एक सौ पच्चीस स्त्री, बच्चे नाना की कैद में थे और चार अधमारे पुरूष दुर्विजय सिंह के दीवानखाने में दवा-दारू करवा रहे थे। पर यह सूची अभी अंतिम नहीं हुई है, इसमें भी अभी जोड़-घटाव होना है। यह जोड़-घटाव होने तक अंग्रेज स्त्रियों और बच्चों को नाना ने कैद में डालने के बाद उनकी व्यवस्था कैसे क्या रखी गई थी, यह भी संक्षेप में कहने लायक है। इन स्त्रियों पर जबरदस्ती की गई, रास्ते में उनके स्तन काटे गए और स्वयं नाना ने उनपर बलात्कार करने का प्रयास किया आदि बेशर्मी के आरोप एवं तथाकथित 'सत्य जानकारियां' बड़े-बड़े उन अंग्रेजों के इन सब आरोपों की छानबीन करने के लिए नियुक्त कमीशन की रिपोर्ट में ये सारे बयान पूरे-के-पूरे झूठे हैं, यह स्पष्ट लिखा ही है।⁹¹ फिर भी इतने से यह हकीकत समाप्त नहीं होती। उन स्त्रियों को नाना ने मार-काट से बचाकर-नील, रेनाल्ड्स, हैवलॉक इन सबको लज्जित किया। इतना ही नही अपितु उन स्त्रियों को कैद में रखकर उनको अमानुषकि यंत्रणाएं भी नहीं दी गई। इतना ही नहीं, अंग्रेजों ने हिंदुस्थान में या ऑस्ट्रिया ने इटली में या स्पेन ने मूरिश लोगों को या ग्रीक ने तुर्की लोगों को ऐसी ही परिस्थिति में जितनी कठोरता से सताया है उसकी शतांश कठोरता भी अपने व्यक्ति, राष्ट्र या धर्म संबंधी कृतघ्न शत्रु जाति को उस सन् 1857 के उग्र प्रलय में नहीं दिखाई गई! यह अंग्रेजी इतिहास से प्रमाणित है। कानपुर हत्याकांड की इस पहली गड़बड़ी में कुछ घुड़सवारों ने चार अंग्रेज और कुछ धर्मांतरित स्त्रियों को भगाया था। नाना साहब को यह समाचार मिलते ही उन्होंने उन सवारों को पकड़वाकर उनकी भर्त्सना की और भगाई हुई औरतों को छोड़ देने के आदेश दिए।⁹² कैदी स्त्रियों और बच्चों को रोटी और 1857 का स्वातंत्र्य समर – 198 ⁹¹ 1. म्योर का प्रतिवेदन तथा विल्सन का प्रतिवेदन; के और मैलसन कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड 2, पृष्ठ 267। ⁹² 2. ट्रेवेलियन कृत-'कानपुर', पृष्ठ 299 ।

मांस बीच-बीच में दिया जाता था।⁹³ किसी भी तरह के कष्टकारी श्रम का काम बलपूर्वक कैदियों पर नहीं लादा जाता। बच्चों को दूध मिलता था। उनकी निगरानी के लिए बेगम नाम की एक महिला नियुक्त थी। कैद में हैजा और पेचिश शुरू हो जाने पर कैदियों को शुद्ध हवा मिले, इसलिए रोज तीन समय खुले में लाया जाता।⁹⁴ फिर भी फिरंगियों के प्रति लोगों में कैसा भयंकर क्षोभ था यह दर्शाने के लिए यहां एक कहानी प्रस्तुत कर रहा हूं। कैदखाने की दीवार पर से एक ब्राह्मण में झांककर देखा कि आज तक जो स्त्रियां पालकी के सिवाय एक कदम भी उठाती नहीं थीं वे सवयं के कपड़े धो रही हैं। ब्राह्मण को उनपर दया आ गई और उसने पड़ोसी से कहा, "उनके कपड़े धोबी को क्यों नहीं दिए जाते?'' उस ब्राह्मण द्वारा बिना बात दिखाई गई इस मानवता के प्रति घृणा से उस पड़ोसी ने ब्राह्मण को एक चांटा मारा। कैद की कुछ ही स्त्रियों से चक्की पिसवाई जाती और उसके बदले में उनको एक रोटी का आटा दिया जाता। स्वयं जीवित रहने के लिए कितने कष्ट उठाने पड़ते हैं-इसका पाठ उन्हें मिला। ऐसी कैद का अंत क्या हुआ और उसके लिए क्या कारण घटित हुआ, इसका खुलासा यथा अवसर आने तक इन महिलाओं और बच्चों को उस कैद में ही छोड़कर अधिक महत्त्व की बातों को देखें। 25 जून को कानपुर के अंग्रेजी शासन का पूर्ण निर्मूलन हो जाने के बाद लगभग पांच बजे श्री नाना ने एक विशाल दरबार आयोजित किया। उस राजदरबार के सम्मानार्थ उस समय उपस्थित सारे लश्कर की भी परेड बुलाई गई। पैदल सेना की छह पूरी रेजिमेंट और घुड़सवारों की दो रेजिमेंट उस समारोह में उपस्थित थीं। इसके अतिरिक्त गांव-गांव से इस स्वदेशीय युद्ध के लिए आई हुई स्वयंसेवकों की टोलियां भी अपने-अपने निशान लेकर खड़ी थी। जिसके पराक्रम से कानपुर जीता जा सका था उस मुट्ठी भर परंतु शौर्ययुक्त तोपखाने का मान इस दिन यथार्थ में प्रथम रखा हुआ था। बाला साहब सेना में पहले से ही प्रिय होने से उनके आते ही उनको 'खड़ी तालीम' दी गई। प्रथमतः दिल्ली के बादशाह के नाम एक सौ एक तोपें दागी गईं। सन् 1857 में हिंदू-मुसलमानों ने कितने आदर से और बंधुत्व भाव से एक-दूसरे से अंत तक व्यवहार किया-यह यहां ध्यान में रखने लायक है। बाद में श्रीमंत नाना साहब की सवारी मैदान में आई, यह देखते ही सबने महाराज की जय-जयकार की और उन्हें भी इक्कीस तोपों की सलामी दी गई। लड़ाई के इक्कीस दिनों के लिए ये इक्कीस तोपें थीं-ऐसा अनेक कहते हैं । उस सम्मान के लिए महाराज ने उस विशाल सेना का आभार माना और वे 1857 का स्वातंत्र्य समर - 199


⁹³ 'नैरेटिव्स', पृष्ठ 113 । ⁹⁴ नील ने स्वयं अपने प्रतिवेदन में लिखा है-"प्रारंभ में बंदियों को ठीक भोजन नहीं मिलता था; किंतु बाद में उन्हें अच्छा भोजन दिया गया और उनकी सेवा के लिए नौकर भी नियुक्त कर दिए गए।"

तृतीय भाग: ज्वाला (कानपुर, अवध, झाँसी व तात्या टोपे)

बोले, "यह आज की विजय आप सबकी है, इसलिए इसमें आप सबका भी समान सम्मान हैं˙˙˙।''⁹⁵ बाद में इस संयुक्त धर्मयुद्ध की उस विजय के लिए नाना ने एक लाख रूपए उस लश्कर को पुरस्कार देने का आदेश दिया है, यह घोषित होते ही इक्कीस तोपों की ओर सलामी हुई। बाद में नाना के भतीजे राव साहब और बाला साहब प्रत्येक को सोलह-सत्रह तोपों की सलामी दी गई। ब्रिगेडियर ज्वाला प्रसाद और सेनापति तात्या टोपे को भी ग्यारह-ग्यारह तोपों का सम्मान मिला। इस तरह उस दिन के सूर्यनारायण को स्वातंत्र्य समर में विजयी तोपों के धमाके सुनाकर सारी सेना को अपने शिविर में भेज दिया गया। लश्कर की यह परेड हो जाने के बाद श्रीमंत नाना साहब श्रीमंत बाला साहब के साथ ब्रह्मवर्त के उस इतिहास-प्रसिद्ध राजभवन की क्या शोभा होगी! पेशवाओं का वह पुरातन सिंहासन समारोहपूर्वक सुमंत्रित कर दरबार में लाया गया। श्रीमंत नाना साहब के मस्तिष्क पर राजतिलक लगाया गया और हजारों नागरिकों और तोपों के धमाकों-जयघोषों में श्रीमंत नाना साहब पेशवा एक स्वतंत्र और स्वकष्टार्जित, स्वदेश-सम्मत और स्वधर्म-प्रतिपालक सिंहासन पर चढ़ गए। उस दिन कानपुर से हजारों लोगों ने नाना को नजराने और उपहार भेजे थे।⁹⁶ हिंदू लोग खुला कहने लगे-'आज से अब राजा रामचंद्र की विजय होगी।⁹⁷ स्वधर्म और स्वराज्य की मंगल सुगंध बहुत दिनों बाद बह रही है। मराठों की जिस गद्दी को रायगढ़ से अंग्रेजों ने धकेला था, वह अंग्रेजी रक्त और मांस से ब्रह्मवर्त में पुनर्भूर्त हुई हैं। आज उसके समृद्ध वृक्ष को उसमें स्वराज्य का फल लगा देखकर नाना को क्या लगा होगा? पर नाना की बालसखी छबीली उधर क्या कर रही है? नाना को घोड़े पर बैठते देख जो घोड़े पर बैठती थी, नाना हाथी पर बैठें तो वह भी हाथी पर बैठे बिना न रहती थी, वह कानपुर में नाना के स्वातंत्र्य तिलक से विभूषित सिंहासन पर विराजमान होने के पश्चात् झांसी में स्वकीय सिंहासनरोहण किए बिना-भूमि पर थोड़े ही बैठेगी। स्वतंत्रता के रण पट पर सिंहासन का भयानक दांव लगाने के लिए नाना साहब ने जिस दिन अपना पासा कानपुर में फेंका उसी दिन रानी ने भी अपना पासा झांसी में फेंका। इसी का नाम है साथी'गुड़यां! 4 जून को इधर कानपुर में स्वातंत्र्य घोषणा की भयानक गड़गड़ाहट होने लगी, तभी उधर झांसी की चपला भी समर आकाश में कड़कने लगी। झांसी में सन् 1857 के मई माह में नेटिव पैदल सेना की 12वीं रेजिमेंट, 14वीं 1857 का स्वातंत्र्य समर – 200


⁹⁵ ट्रेवेलियन कृत- 'कानपुर', पृष्ठ 293 । ⁹⁶ वही, पृष्ठ 294 । ⁹⁷ सर कॉलिन कृत-'नेटिव' ।

घुड़सवार और एक तोपखाना-इतनी सेना रखी हुई थी और इस सेना का मुख्य अधिकारी कैप्टन डनलप था। मई माह के प्रारंभ में उस सेना में कुछ गुप्त योजना चलने का उड़ता समाचार अंग्रेज अधिकारियों के कानों में आने लगा। झांसी के मुख्य कमिश्नर स्कीन और डिप्टी कमिश्नर गार्डन के हाथ में सिपाहियों के कुछ पत्र लग जाने से यह स्पष्ट दिखने लगा कि रानी के किसी ब्राह्मण नौकर लक्ष्मणराव ने 12वीं रेजिमेंट से संपर्क साधा हुआ है और सिपाही विद्रोह कर अपने अधिकारियों को गारद करें, इसके लिए उसके लगातार प्रयास चल रहे हैं।⁹⁸ यह ब्राह्मण-लक्ष्मणराव पांडे-बाद में स्वतंत्र झांसी का दीवान बना। झांसी के धनवान ठाकुर लोगों में एक तरह की खलबली मची है और वे अंग्रेजी राज उलटने की चर्चा कर रहे हैं-पर यह बात कोई बहुत महत्त्व की नहीं है, क्योंकि ये ठाकुर कभी किसी सरकार के राजनिष्ठ रहे ही नहीं। फिर भी झांसी की सेना राजनिष्ठ रहेगी, यह अंग्रेजों का दृढ़ विचार था। सेना की राजनिष्ठा के साथ ही रानी राजनिष्ठा के संबंध में भी कुछ संशय करने का कोई कारण नहीं था। क्योंकि अभी कुछ समय पूर्व ही उसने समय आने पर अंग्रेजों की यथासंभव सहायता करना कबूल किया है। इतना ही नहीं अपितु वह सहायता कर सके, इसलिए अपने पास की सेना बढ़ाने की अनुमति उसने मांगी है। ऐसी स्थिति में झांसी विद्रोह की ज्वाला से निर्भय है। मई माह की 31 तारीख को भी वरिष्ठ अधिकारियों को झांसी के अंग्रेज ऐसी रिपोर्ट करें तो उसमें क्या हर्ज है। तारीख 1 जून को झांसी में कुछ अंग्रेज अधिकारियों के बंगलों को आग लगी। यह आग जून के पहले हफ्ते को इतना संदेश देकर निकल गई कि जिस दिन उधर कानपुर उठा उसी दिन 4 जून को झांसी भी विद्रोह कर उठी। सिपाहियों की एक टोली ने अपने हवलदार के इशारे पर अकस्मात् चढ़ाई कर स्टार फोर्ट को उसमें स्थित बारूदखाने और शस्त्रागार सहित हथिया लिया। कैप्टन डनलप ने घुड़सवारों और शेष बचे हुए पैदल और तोपखाने को परेड पर बुलाकर घटना की जानकारी दी तो सारे नेटिव सिपाहियों ने राजनिष्ठा और कंपनी की जय-जयकार कर कहा कि हम कंपनी के लिए जान देने में भी नहीं हिचकेंगे। राजनिष्ठा का ऐसा प्रदर्शन इधर चल रहा था तो उधर अंग्रेजों ने अपने बाल-बच्चे किले में पहुंचाकर उस किले को लड़ाने की तैयारी शुरू कर दी और सहायता के लिए नौगांव अंग्रेजी छावनी को तथा अन्य स्थानों पर भी तत्काल पत्र भेजे। ये पत्र डालने डनलप साहब डाकघर की ओर जाने लगे तो उन्हें परेड के मैदान पर 12वीं पलटन के सिपाहियों ने गोली से मार डाला। एनसाइन टेलर भी मारा गया। तब सारे अंग्रेज डर के मारे किले की ओर चले गए। उस किले में अंग्रेजों ने सुरक्षा के लिए तोपें निशाने पर लगाकर बारूद की व्यवस्था की हुई थी और उनका यह निश्चय था कि 1857 का स्वातंत्र्य समर – 201 ⁹⁸ चार्ल्स बाल, खंड 1, पृष्ठ 271।

बाहर से सहायता आने तक एक हफ्ते तक किला बड़ी सहजता से लड़ाया जा सकता है। सिपाहियों ने, छावनी में जो यूरोपियन मिले, उन्हें मारकर फिर किले पर चढ़ाई की। अंग्रेजों ने रानी की सहायता प्राप्त करने के लिए स्कॉट और पर्सेल बंधु जैसे तीन आदमी भेजे थे। उन्हें रास्ते में ही पकड़कर मार डाला गया। 7 जून को विद्रोहियों ने किले पर जोरदार आक्रमण किया। उनके पास अच्छी तोपें न होने से किला जीतना बहुत कठिन होने लगा। फिर भी उनका संख्या बल अधिक होने से वे वैसे ही आगे बढ़ते रहे। किले में अंग्रेजों के साथ कुछ विश्वासपात्र नेटिव भी घुसे हुए थे। उनमें से एक किले दरवाजे को बंद करने के लिए बनी दीवार चुपचाप गिराने लगा। उनमें से एक किले दरवाजे को बंद करने के लिए बनी चुपचाप गिराने लगा। लेफ्टिनेंट पावस ने यह देखते ही उस सेवक पर गोली मारी, तभी दूसरे सेवक ने लेंफ्टिनेंट को तलवार से काट डाला। लेंफ्टिनेंट को गर्गेस ने उस सेवक का काम तमाम किया। अंग्रेजों ने अपने को छिपाकर तोपों और बंदूकों का हमला चालू रखा था। कमिश्नर गार्डन ऐसे ही चोरी से बंदूकें चला रहा था तो उसके चेहरे से परिचित एक विद्रोही ने सीधे तीर चलाकर उसे मार डाला। गार्डन साहब के मरते ही किले के अंग्रेजों का धीरज टूटने लगा और बाहर विद्रोहियों का उत्साह बढ़ने लगा। अंग्रेजों की गोलीबारी की परवाह न करते हुए घुड़सवारों का रिसालदार काले खान और झांसी का तहसीलदार अहमद हुसैन–इन दो बहादुर योद्धाओं ने विद्रोहियों का झंडा किले की दीवार तक जा भिड़ाया और अब विद्रोही सेना किले में पल–दो–पल में घुसेगी, ऐसा रंग दिखने लगा। तब अंग्रेजों ने किले पर संधि का झंडा लगाया और लड़ाई बंद हो गई। दूसरे दिन विजयी विद्रोहियों के प्रतिनिधि झांसी का प्रसिद्ध हकीम सालेह मोहम्मद से अंग्रेजों ने बातचीत शुरू की और जीवनदान मांगा। यह शर्त सालेह मोहम्मद ने कुरान पर हाथ रखकर स्वीकार की और अंग्रेजों ने तुरंत किले के दरवाजे खोल दिए। अंग्रेजों को शस्त्र नीचे रखने के आदेश हुए। उन्होंने शस्त्र नीचे रखे और वे हतभागी गोरे लोग बाहर आने लगे और सिपाही उन्हें देखते ही 'मारो फिरंगी को' कहते हुए उनपर टूट पड़े। 8 जून को अंग्रेज पुरुषों के हाथ बांधकर उनका एक जंगी जुलूस शहर में से निकाला गया। उस जुलूस में ही झांसी का मुख्य कमिश्नर स्कीन अधोमुख चल रहा था। जोगन बाग के पास आते ही रिसालदार साहब ने आदेश दिया-“एक-एक गोरा काटा जाय।” झांसी के कैदखाने के मुसलमान दारोगा ने स्कीन साहब का सिर कलम किया और तत्काल ही पुरुष, महिला, बच्चे मिलाकर साठ गोरे सिर गेंद की तरह उछलकर खड़े थे। वे औरतें, उनकी गोद के छोटे बच्चे और सटकर खड़े बड़े बच्चे भी गोरे रंग अपराध के कारण काले रंग की तलवार से 'सटाक' काटे गए। एक क्षण में रक्त की तेज धार बहने लगी। झांसी के घनीभूत अन्याय का ऐसा द्रवीकरण हुआ। 1857 का स्वातंत्र्य समर — 202

झांसी के गुस्सैल जबड़े में पचहत्तर अंग्रेज पुरूषों, बारह महिलाओं और तेईस बच्चों की विद्रोहियों ने बलि ली। 4 जून को झांसी ने विद्रोह किया और 8 जून को अंग्रेजी राज्यसत्ता का झांसी से अंत हो गया। और अंग्रेजों की ओर से अपने को वारिस कहनेवाला कोई न बचने से विद्रोही सिपाहियों ने रानी साहब लक्ष्मीबाई को झांसी के स्वातंत्र्य सिंहासन पर प्रतिष्ठित किया और वीर रानी के नाम से नारा लगाया–‘‘खल्क खुदा का, मुल्क बादशाह का और शासन रानी लक्ष्मीबाई का।‘’⁹⁹

1857 का स्वातंत्र्य समर – 203

⁹⁹ झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के चरित्र पर एक ग्रंथ मराठी में श्री पारसनीस ने लिखा है। उस विद्वान ग्रंथकार ने सैकड़ों सबूतों से प्रस्तुत कर यह दिखाया है कि अंग्रेजों के इस हत्याकांड को उस युवा रानी ने रत्ती भर भी नहीं भड़काया था। श्री पारसनीस का ग्रंथ मराठी पाठकों के अच्छे परिचय का ग्रंथ है और उसका अन्या भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है और इसीलिए हमने उसे यहां उद्धृत किया है।

प्रकरण-9 अवध का रण अवध का राज डलहौजी द्वारा अधिगृहीत किए जाने के बाद से उस प्रदेश की प्रजा की दुर्दशा बढ़ती ही जा रही थी। अवध की स्वतंत्रता नष्ट हो जाने के बाद नवाब के राज्य में अंग्रेज अधिकारियों की नियुक्ति होने के कारण बड़े-बड़े पद-सम्मान से सारे स्वदेशी लोगों को पदच्युत होना पड़ा था। नवाब की सेना समाप्त कर दी गई। उसके सरदार दरिद्रता में धकेल दिए गए। उसके सरदार और मंत्री वैभव-विहीन होकर उपजीविका की कनिष्ठ सीढ़ी पर पहुंच गए। जिस गुलामी के कारण यह दुर्दशा उत्पन्न हुई थी उससे सबके मन में उसके प्रति भारी द्वेष बढ़ने लगा। राजधानी और राजदरबार में ही केवल दासता के ये पाश कसने लगे थे, ऐसा नहीं था। उस सारे प्रदेश में बड़े-बड़े जमींदारों और राजाओं के पीढ़ी-दर-पीढ़ी जो अधिकार, जागीरें, इनाम आदि चले आ रहे थे वे सब अंग्रेजों ने छीन लिये-इस कारण उन सब बड़े-बड़े राजाओं और जागीरदारों को अत्यंत कनिष्ठ स्वराज्य और अति श्रेष्ठ गुलामी में पहला कितना श्रेयस्कर, सम्मानपूर्ण और अभिनंदनीय होता है, यह पहचान हो गई थी। लगान बढ़ जाने से किसान नाराज हो गए। अंग्रेजी लश्कर के हिंदुस्थानी सिपाही, जो अधिकांश अवध के ही थे, उनके मन में भी मातृभूमि की इस दुर्दशा और दासता से व्यापक असंतोष बढ़ने लगा। युवा वाजिद अली शाह से अंग्रेजों ने कैसा घोर विश्वासघात किया था, इसे स्मरण करते हुए हर कोई अपनी तलवार पर हाथ धरे अपने होंठ चबाने लगा था। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 204

अवध के बड़े-बड़े जमींदार शूरता, उदारता और कृतज्ञता आदि गुणों से भरपूर राजपूत वंशों में उत्पन्न हुए थे। अंग्रेजों ने उनके राजा पर जो अत्याचार किए थे उसके कारण उनमें बहुत गुस्सा उत्पन्न हो गया था। अवध अधिग्रहण करने के बाद अंग्रेजों ने अपने अधीन कार्य करने के लिए जब उनसे कहा तब उन स्वतंत्रता-प्रेमी लोगों में से सैकड़ों उग्र पुरुषों ने अंग्रेजों को कहा,‘'हमने स्वराज्य का अन्न खाया है, अतः गुलामी के अन्न को छूना भी हराम है।‘’ अवध का राज्य अधिगृहीत करने के बाद उस राज्य के सर्वाधिकारी पद पर सर हेनरी लॉरेंस को नियुक्त किया गया। हेनरी लॉरेंस जॉन लॉरेंस का बड़ा भाई था, जिसने अपने जोश और कूटनीति से पंजाब में विद्रोह के बीज अंकुरित होने के पहले ही नष्ट कर दिए थे। पंजाब के चीफ कमिश्नर ने जैसे पंजाब को बचाया वैसे ही अवध के चीफ कमिश्नर ने भी अवध को बचाने के उपाय बहुत पहले से करने प्रारंभ कर दिए थे। सन् 1857 की चोट से हिंदुस्तान में ब्रिटिश शासन बचाने का श्रेय यदि किसी को देना हो तो इन लॉरेंस बंधुओं को देना होगा। सर हेनरी लॉरेंस ने अवध में पैर रखते ही वहां की परिस्थिति का सही-सही अनुमान लगाया और हिंदुस्थान में किसी भी अंग्रेज के ध्यान में आने के पूर्व ही उसने विद्रोह होने की आशंका प्रदर्शित की। अवध की मुख्य राजधानी लखनऊ होने से सर हेनरी लॉरेंस वहीं रहता था। उसने असंतुष्ट जमींदारों को मीठा बोलकर शांत करने का प्रयास किया । लखनऊ में दरबार आयोजित कर उसमें मान-सम्मान, इनाम आदि देकर जनता में पनप रही स्वराज्य की अनुभूति को भुलाने के लिए काफी प्रयास किए। जनता को शांत करने के अपने प्रयासों के साथ ही संकट के समय असावधान रहे, ऐसा नासमझ नहीं होने से उसने लोगों के विद्रोह से अपने को बचाने के लिए अलग-अलग योजनाएं भी प्रारंभ कर दीं। सर हेनरी लॉरेंस का शासन यद्यपि उसके पूर्ववर्ती अंग्रेज अधिकारियों के शासन से अच्छा था, फिर भी अवध के लोगों को अब अंग्रेजों के अच्छे शासन से बुरे शासन जैसी ही घृणा हो गई थी। स्वराज्य स्थापित कर उसपर वाजिद अली शाह को फिर से बैठाए जाने से कम में उनकी महत्त्वाकांक्षा शांत होनेवाली नहीं थी। अंग्रेजी राज्यसत्ता की जंजीरों को तोड़कर सारा हिंदुस्थान फिर से एक बार स्वतंत्र करने के सिवाय उन्हें और कुछ भी सूझ नहीं रहा था। उनका धर्म कल श्रेष्ठ पद पर आसीन हो चुका था। कल तक वह धर्म राजधर्म की प्रतिष्ठा पा चुका था। परंतु आज वह हीन सेवाधर्म हो गया था। यह उनकी मुख्य पीड़ा थी और उसका समाधान अच्छे शसन से नहीं, विदेशी शासन की समाप्ति से ही हो सकता था। मान सिंह जैसे प्रबल हिंदू राजा और सिकंदर शाह जैसे मुसलमानों के अधीकारी दोनों ही धर्म के देशभक्त नेताओं ने स्वतंत्रता के लिए अपना सबकुछ समर्पित करने का निश्चय किया था। हजारों मौलवी और पंडित इस जिहाद का गुप्त और खुला उपदेश करते हुए सारी अवध में घूमने लगे। लश्कर, पुलिस, जमींदार और सारी जनता अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ाई करने को शपथबद्ध करने का प्रचंड षड्यंत्र 1857 का स्वातंत्र्य समर - 205

खड़ा किया गया जिससे इधर-उधर लोक क्षोभ की अग्नि प्रज्वलित होने लगी। इस अग्नि क चिनगारियां बीच में ही गलती से कैसे उड़ी, यह पहले कहा है। खुद मौलवी सिकंदर शाह को राजद्रोह के अपराध के कारण पहले फांसी और बाद में कारावास का दंड दिया गया और 7वीं रेजिमेंट को निःशस्त्र किया गया। सर हेनरी लॉरेंस ने लश्कर को यथासंभव नियंत्रण में रखने के लिए 12 मई को एक बड़ा दरबार आयोजित किया। उसमें स्वयं उसने हिंदुस्थानी भाषा में एक कौशलपूर्ण व्याख्यान दिया, राजनिष्ठा का महत्त्व बतलाया। महाराजा रणजीत सिंह द्वारा किए गए मुसलिम धर्म के अपमानों और औरंगजेब द्वारा किए हिंदू धर्म के अपमानों का स्पष्ट प्रतिपादन करने के बाद अंग्रेज सरकार ने इस परस्पर द्वेष से हिंदू-मुसलमानों को कैसे बचाया-यह बात विस्तार से कही और बाद में जिस किसी सिपाही ने 7वीं रेजिमेंट की निःशस्त्रीकरण विधि में उत्तम राजनिष्ठा प्रदर्शित की थी उन्हें तलवारें, शॉल, साफे आदि पुरस्कार स्वयं लॉरेंस ने अपने हाथ से दिए। लेकिन कितना विरोधाभास! इन पुरस्कार प्राप्त राजनिष्ठों को ही कुछ समय बाद विद्रोह के षड़यंत्र में सम्मिलित सिद्ध होने पर फांसी दी गई। राजनिष्ठा का यह दरबार 12 मई को हुआ और 13 मई को खबर आई कि मेरठ शहर ने विद्रोह किया और 14 मई को समाचार आया-दिल्ली पर विद्रोहियों का कब्जा हो गया है और वहां स्वतंत्रता की घोषणा हो गई है। ये समाचार आते ही सर हेनरी लॉरेंस ने लखनऊ शहर के पास के मच्छी भवन और रेजिडेंसी-ये दो स्थान चुनकर उन्हें अंग्रेजों के रहने योग्य बनाना प्रारंभ किया। अंग्रेजों की सारी महिलाएं, बच्चें वहां ले जाए गए और गैर लश्करी अधिकारी, बाबू, व्यापारी आदि सभी वयस्क पुरुषों को लश्करी कवायद, अनुशासन और शस्त्र आदि का प्रशिक्षण देकर तैयार किया गया। मेरठ की ओर बगावत हो जाने के बाद वहां के असैनिक अधिकारियों आदि को भी तत्काल ऐसा ही फौजी प्रशिक्षण देकर कोई दस दिन में युद्ध के लिए तैयार किया गया था। सर हेनरी लॉरेंस को ही पूरे प्रदेश का मुख्य फौजी अधिकारी बनाया गया। अवध का प्रदेश नेपाल से लगा होने के कारण लॉरेंस का प्रयास नेपाल के राजा जंग बहादुर को अपनी सहायता के लिए सेना लेकर बुलाने का चल रहा था। इन सारी व्यवस्थाओं के चालू रहते सर लॉरेंस को रोज यह पक्का समाचार मिलता कि आज विद्रोह होगा। ऐसा समाचार मिलते ही लॉरेंस विशेष बंदोबस्त करने लगता। पर दूसरा दिन उदय हो जाने के बाद भी विद्रोह न होता-ऐसा बार-बार होता रहा। 30 मई को लॉरेंस को किसी अधिकारी ने समाचार दिया कि आज रात नौ बजे विद्रोह होगा। 30 मई का सूर्यास्त हो गया। हेनरी लॉरेंस अपने साथियों सहित भोजन करने बैठा था, तभी रात नौ बजे की तोप की आवाज हुई। जिसने इस बार विद्रोह होने का पक्का समाचार दिया था वह पहले की तरह ही गलत हुआ, इसलिए लॉरेंस ने उसकी 1857 का स्वातंत्र्य समर – 206

ओर झुककर कहा, "तुम्हारे मित्र समय-पालन में पक्के नहीं है।" 'समय-पालन में पक्के नहीं है!' यह वाक्य हेनरी लॉरेंस कह भी न पाया कि 71वीं पैदल पलटन द्वारा छोड़ी गई बंदूकों की आवाज उसके कानों में आने लगी। इस रेजिमेंट के पहले से बनाए गए कार्यक्रम के अनुसार नौ बजे की तोप छूटते ही उसकी अलग-अलग टोलियां यूरोपियनों के बंगलों पर टूट पड़ी। 71वीं रेजिमेंट के मेस हाउस को आग लगाकर उन्होंने यूरोपियनों पर बंदूकों से गोलियों की झड़ी लगानी शुरू की। इस रेजिमेंट का लेफ्टिनेंट ग्रांट भागा जा रहा था तो किसी ने उसे खाट के नीचे से खींचकर सिपाहियों ने गारद किया। लेफ्टिनेंट हार्डिंग कुछ घुड़सवारों के साथ रास्ता रोकने आया तो उसे भी तलवार ने साफ कर दिया। पूरा कैंटोनमेंट सुलग गया। ब्रिगेडियर हर्डस्कोम भी मारा गया। रात भर अंग्रेजी झंडे को थामे रहे नेटिव और गोरे सोल्जर विद्रोह को रोके रहे। सुबह अर्थात् 31 मई को हेनरी लॉरेंस ने विद्रोहियों पर अपने मातहत यूरोपियन और अभी भी राजनिष्ठ बनी हुई नेटिव सेना को लेकर हमला किया। परंतु रास्ते में ही उसके साथ की 6वीं घुड़सवार रेजिमेंट ने विद्रोह किया, इसलिए सर हेनरी उन सब सिपाहियों को वहीं छोड़कर लौट गया। लखनऊ में यूरोपियनों की 32वीं रेजिमेंट पूरी गोरी होते हुए और गोरे तोपखाने का सहयोग होते हुए भी 31 मई की शाम के पहले नेटिवों की 71वीं पैदल रेजिमेंट, 48वीं पैदल रेजिमेंट, 7वीं घुड़सवार रेजिमेंट और अधिकतर इरेंग्यूलर सेना ने विद्रोह का झंडा गाड़ दिया। लखनऊ से इक्यावन मील दूर अवध की वायव्य दिशा का मुख्य शहर सीतापुर है। इस शहर में सन् 1857 में 41वीं पैदल, 9वीं इरेंग्यूलर पैदल पलटन ऐसी तीन नेटिव रेजिमेंट थी। वहां उसका कमिश्नर और अन्य बड़े-बड़े यूरोपियन अधिकारी भी रहते थे। 27 मई को अंग्रेजों की एक बस्ती में आग लगा दी गई थी। परंतु यह आग विद्रोह की अग्रिम सूचना है, यह अनुमान अभी तक युरोपियनों को न होने से उन्होंने उस आग को भुला दिया। और क्या कहें, स्वयं सिपाहियों ने ही उसे बुझाने में अथक श्रम किया था। इस अग्रिम सूचना ने दो काम किए। एक यह कि षड़यंत्रकारियों को समय हो जाने की सूचना और दूसरा अंग्रेज अधिकारियों के भोलेपन की जांच। जून की दूसरी तारीख को एक नई घटना हुई। सिपाहियों को दी गई नमक की बोरियों को उन्होंने यह कहकर नहीं लिया कि उसमें हड्डियों का चूरा है। इतना हीनहीं, उन्हें तत्काल गंगा में डाल दिया जाए, ऐसी जिद भी की। अंग्रेजों ने इसीलिए वे बोरियां नदी में फेंक भी दी। अब और भी मजा आ गया, उसी दिन दोपहर के समय यूरोपियन लोगों के बगीचों में एकाएक सिपाही घुस गए और चाहे जिस पेड़ पर चढ़कर आनंद से फल खाने लगे। अंग्रेज अधिकारी चिल्लाते रहे, पर सिपाहियों का फलाहार किसी तरह भी रोका न जा सका। इस तरह भयंकर फलाहार करने के बाद उसे हजम करने के लिए उतना ही भयंकर व्यायाम शुरू हो गया। 3 जून को सिपाहियों की एक टोली ने खजाने पर हमला 1857 का स्वातंत्र्य समर - 207

कर उसे कब्जे में ले लिया और बाकी के सिपाही कमिश्नर के बंगले की ओर बढ़े। रास्ते में कर्नल बर्च और लेफ्टिनेंट ग्रोव्स मिले तो उन्हें मार डाला गया। एक इर्रेंग्यूलर ने भी अपने अंग्रेज अधिकारी काट डाले और सारे-के-सारे सिपाही “यूरोपियन शासन खत्म हुआ”, ऐसा चिल्लाते-चिल्लाते गोरे लोगों पर टूट पड़े। एक नदी के रास्ते में कमिश्नर अपनी पत्नी को लेकर भागने लगा। उसे उसकी पत्नी और लड़के को लेकर नदी पर जोन से पहले ही मार डाला गया। थॉर्नहिल और उसकी पत्नी भी गोली लगने से मर गए। रामकोट के जमींदार की शरण में चले गए और आठ-आठ, दस-दस माह तक सुरक्षित रखकर लखनऊ पहुंचाए गए। सीतापुर के सारे सिपाही फिर फर्रुखाबाद की ओर चले गए। वहां के यूरोपियनों ने जिस किले का आश्रय लिया था वह किला बहुत प्रयास से जीतने के बाद उन्होंने सारे यूरोपियनों को काट डाला। नवाब तफुज्जुर हुसैन खान को अंग्रेजों द्वारा अधिगृहीत गद्दी पर फिर से बैठाया गया। इस नवाब ने भी अपने प्रदेश में मिले हर यूरोपियन को पकड़वाकर मार डाला। इस तरह फर्रुखाबाद प्रदेश में 1 जुलाई को एक भी अंग्रेज शेष नहीं रहा। सीतापुर के उत्तर में चौवालीस मील पर बसे मलान शहर में जो अंग्रेज अधिकारी थे उन्हें सिपाहियों और नागरिकों के षड्यंत्र तथा सीतापुर का समाचार मिलते ही वे घोड़ो पर बैठकर भाग गए और वह जिला बिना रक्त की एक बूंद बहाए स्वतंत्र हो गया। तीसरा जिला महम्मदी है। वहां के यूरोपियनों ने अपनी महिलाएं मिटौली के राजा के यहां भेजीं तो उस राजा ने उनसे कहा कि तुम्हें मेरे जंगल में छिपकर रहना पड़ेगा। तुम्हारी खुली सुरक्षा करने की क्षमता मुझमें नहीं है; क्योंकि पूरे अवध के सिपाहियों ने विद्रोह करने की शपथ ली हुई है। उस राजा के पास अपनी महिलाएं पहुंचाने के बाद महम्मदी के अंग्रेज अधिकारियों ने वहां के किले में शरण ली। इसी दिन-जैसाकि पहले कहा गया है-रूहैलखंड के शाहजहांपुर से भागते हुए अंग्रेज महम्मदी पहुंच गए। पर महम्मदी में सुरक्षा न होने से वहां के अधिकारियों ने सीतापुर को संदेश भेजा कि वे इन अनाथ अंग्रेजों को सीतापुर ले जाएं। सीतापुर में तब तक विद्रोह नहीं हुआ था, इसलिए वहां से सिपाहियों की एक टोली गाड़ियों के साथ उन अनाथ अंग्रेजों को लेने के लिए पहुंची। परंतु सीतापुर के ये सिपाही महम्मदी में विद्रोह के बीच आए थे। उन्होंने सारे अंग्रेजों को गाड़ियों से भरा, सीतापुर के आधे रास्ते तक सुरक्षित लाए और वहां उन्हें गाड़ियों से उतारकर मार डाला। इसमें सात-आठ महिलाएं, चार बच्चे, आठ लेफ्टिनेंट, चार कैप्टन और कुछ अन्य पुरूष थे। इधर महम्मदी में बचे हुए अंग्रेज अधिकारी तत्काल भाग गए और इस तरह उस पूरे जिले में जून की चौथी तारीख को ब्रिटिश राज्यसत्ता का कोई चिह्न न रहा। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 208

अवध प्रांत के सीतापुर से लगा हुआ जिला है बहराइच। यहां का कमिश्नर विंगफील्ड था और उसके अधिकार में चार शहर सिकोरा, मालापुर, गोंडा और बहराइच थे। इसमें से सिकोरा में नेटिवों की दो पैदल रेजिमेंट और एक तोपखाना था। वहां विद्रोह होने के संकेत दिखते ही अंग्रेज स्त्री-बच्चों को लखनऊ भेज दिया। 9 जून की प्रातः अंग्रेजों में से बहुत से अधिकारी घोड़े पर बैठकर स्वयं की बलरामपुर के राजा के यहां चले गए। केवल तोपखाने का अधिकारी बोन्हम अपने अधीनस्थ सिपाहियों पर पूरा भरोसा कर डटा रहा। परंतु शाम को उसे सिपाहियों ने साफ-साफ कहा कि "यद्यपिह म आपको तनिक भी क्षति नहीं पहुंचाएंगे, फिर भी हमने अंग्रेजी गुलामी छोड़ दी है और हम अपने देशबंधुओं पर कभी भी गोलियां नहीं चलाएंगे।" यह सुनते ही हारकर वह अधिकारी भी स्थान छोड़कर निकल गया। उसे सिपाहियों ने यह भी बता दिया कि सुरक्षित राह कौन सी है और वह सुरक्षित लखनऊ पहुंच गया। सिकोरा स्वतंत्र होने की सूचना गोंडा में आते ही वह शहर भी विद्रोह कर उठा। यह देखते ही स्वयं कमिश्नर विंगफील्ड के साथ सारे अंग्रेज लोग बलरामपुर के राजा के पास भाग गएं इस राजा ने कोई पच्चीस अंग्रेज शरणार्थियों को शरण दी और उन्हें उचित अवसर पर ब्रिटिश छावनी में पहुंचा दिया। सिकोरा और गोंडा स्वतंत्र हो जाने का समाचार बहराइच में पहुंचते ही वहां स्थित अंग्रेज अधिकारी विद्रोह होने की राह न देख उस मुख्य शहर को छोड़कर 10 जून को ही लखनऊ की ओर भाग खड़े हुए। पर इस समय सारे अवध प्रांत में विद्रोहियों कीचौकियां स्थान-स्थान पर बन जाने के कारण नेटिव लोगों के स्वांग धरे और एक नाव में बैठकर घाघरा नदी पार करने लगे। पहले उनकी ओर किसी 1क ध्यान नहीं गया, पर आधी नदी पार होते-होते 'फिरंगी-फिरंगी' की आवाजें आने लगीं। मल्लाहों ने नौकाएं छोड़ दीं और वे अंग्रेज अधिकारी मार डाले गए। इन अधिकारियों के साथ ही उस बहराइच प्रांत से ब्रिटिश सत्ता समाप्त हो गई। मालापुर में अभी तक लश्करी छावनी नहीं थी फिर भी वह जिला छोड़कर भाग जाने के सिवाय अंग्रेजों को कोई गति नहीं रही-इतना लोकक्षोभ वहां था। वे जब भाग रहे थे तब एक राजा ने उन्हें जितना बना उतना संरक्षण दिया। परंतु जल्द ही विद्रोहियों की तलवार या वनवास के कष्टों ने उनकी बलि ली। अवध प्रांत के पूर्व भाग का मुख्य शहर फैजाबाद था और उसका कमिश्नर गोल्डवे भी वहीं रहता था। फैजाबाद विभाग में सुललानपुर, सलोनी और फैजाबाद तीन जिले आते थे। फैजाबाद शहर में इस समय 22वीं पैदल और 6वीं इरेंग्युलर पैदल रेजिमेंट, कुछ घुड़सवार और तोपखाना था। कर्नल लेनाक्स इन सबका सेनापति था। फैजाबाद विभाग में जुल्म बहुत बढ़ गया था। सर हेनरी स्वयं लिखता है-"तालुकेदारों से क्रूरता का व्यवहार किया गया है। फैजाबाद प्रांत में उनके आधे गांव छीन लिये गए हैं और कहीं-कहीं तो पूरे ही छीने गए हैं" ऐसे अत्याचारों का प्रतिशोध जल्द ही 1857 का स्वातंत्र्य समर - 209

लिया जाएगा, यह डर फैजाबाद के अंग्रेजी अधिकारियों को मेरठ का समाचार सुनने के बाद लगने लगा और उस संकट से कैसे बचा जाए, इस चिंता ने उन्हें बेचैन कर दिया। अपने बाल-बच्चे लखनऊ की ओर भेजें तो लखनऊ के रास्तों पर विद्रोहियों की पक्की नाकाबंदी होने से उधर जाना कठिन था और फैजाबाद शहर में दो-दो हाथ करने की तैयारी की जाए तो वहां पूरी सेना नेटिव थी। ऐसी विकट विवशता में फंसे फैजाबाद के अंग्रेज अधिकारी अंत में राजा मान सिंह की शरण गए। अवध प्रांत के सारे हिंदू लोगों का राजा मानसिंह की तलवार म्यान के बाहर ही रहती थी। सन् 1857 के मई माह में इस राजा को किसी वसूली प्रकरण में कारावास में डाल रखा था। परंतु अब मेरठ के विद्रोह के कारण अंग्रेजों की कमर टूट सी जाने से उन्होंने राजा मान सिंह को मनाने को उसे कैदखाने से मुक्त कर दिया। उसने अंग्रेज स्त्रियों और बच्चों को अपने लोगों को आश्रय दे रहा हूं, यह बात लोगों को पसंद नहीं आएगी। इतना ही नहीं, इसके लिए वे मुझपर भी प्रहार करने से नहीं चूकेंगे।'' 7 जून को मान सिंह के यहां अंग्रेज अधिकारियों के परिवार आश्रय के लिए गए और उसके शाहगंज किले में सुरक्षित रहने लगे। अंग्रेज लोग अपनी सुरक्षा की ऐसी तैयारी कर रहे थे, तभी फैजाबाद में आग लपटों में बदल गई। फैजाबाद में जो अनेक तालुकेदार थे उनमें से एक का नाम मौलवीअहमद शाह था। यह नाम इतिहास में अजर-अमर होने को था। यह नाम देशभक्तों, देशवीरों की माला में गूंथा जानेवाला था। इस नाम ने अपने तालुके की तालुकेदारी ही नहीं, अपने देश की देशदारी करने का कंकण भी अपने हाथ में बांधा था।देश के दरवाजे पर पहरा देने के लिए रतजगा किया था और उस दरवाजे से देश में घुसना चाहनेवाली विदेशी सत्ता को रोकने के लिए अब उसने हाथ में अपना सर्वस्व स्वदेश और स्वधर्म को अर्पण किया और वह मौलवी स्वयं हिंदुस्थान भर राज्य क्रांति का उपदेश देते हुए पर्यटन करने निकला। यह राजनीतिक संन्यासी जिस-जिस प्रदेश में अपनी चरणरज डालता गया वहां-वहां लोकशक्ति में कुछ विलक्षण चेतना का संचार होता गया। क्रांति पक्ष के बड़े-बड़े नेताओं से वह स्वयं मिला। अवध के राजपरिवार में उसकी सलाह के बिना पत्ता भी नहीं हिलता था। उसने आगरा में गुप्त मंडली की स्थापना की। उसने लखनऊ में ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने का खुला उपदेश दिया। अवध प्रदेश के जनपदों की उस पद बड़ी श्रद्धा उत्पन्न हो गयी थी। शरीर, मन, वाणी एवं बुद्धि से स्वदेश की स्वतंत्रता के उपदेश और गुप्त संगठनों के जाल बुनने का अश्रांत श्रम करने के बाद 1857 का स्वातंत्र्य समर - 210

उसने लेखनी पकड़ी और राज्य क्रांतिकारक लेखों को वह सारे अवध प्रांत में फैलाने लगा। एक हाथ में तलवार और एक हाथ में लेखनी! ऐसे लोकोत्तर पुरुष के तेज से स्वराज्य की ज्वाला भड़कने लगी है-यह देखकर अंग्रेजों ने उसे पकड़ने का आदेश जारी किया। परंतु अवध की पुलिस ने उस लोकनाथ को नहीं पकड़ा। तब सेना भेजकर उसे पकड़ा गया। राजद्रोह का आरोप लगाकर उसकी छानबीन की गई और उसे फांसी का दंड देकर फैजाबाद के कारावास में रखा गया। मौलवी की और अंग्रेजी सत्ता की एक-दूसरे को फांसी पर चढ़ाने की जंगी प्रतियोगिता शुरू हो गई। मौलवी अंग्रेजी सत्ता को फांसी देने की तैयारी कर रहे थे तो अंग्रेजी सत्ता मौलवी को फांसी चढ़ाने का स्थान बनाने की जल्दी कर रही थी। परंतु इस जल्दी में उन्होंने मौलवी का फैजाबाद कैद में रखकर अपने लिए ही फांसी के खंभे खड़े किए; क्योंकि मौलवी को फैजाबाद कैद में रख ने से क्रांति की बारूद से ठसाठस भरी गुप्त सुरंग पर मानो चिंगारी पड़ी। वह शहर वहां के लश्कर के साथ 'हर-हर महादेव' की घोषणा के साथ विद्रोह कर उठा। सिपाहियों को काबू में रखने के लिए अधिकारी परेड पर गए तो सिपाहियों ने उन्हें साफ कहा कि अब हम स्वदेशी अधिकारियों के अधीन हैं और हमारा नेता सूबेदार दिलीप सिंह है। सूबेदार दिलीप सिंह ने सारे अधिकारियों के घर पर पहरा बैठा दिया और उन्हें बारह कदमों से अधिक इधर-उधर हिलने पर कड़ी रोक लगा दी और फिर नागरिकों और सिपाहियों ने उस लोकनाथ की ध्वनि से खुला और मौलवी अहमद शाह टुकड़े-टुकड़े हुई श्रृंखलाओं को फेंककर जय-जयकार से आकर मिले। मौलवी का पुनर्जन्म हुआ था। उन्हें अंग्रेज सत्ता फांसी पर चढ़ाने वाली थी, उन्होंने अंत में उसे ही फांसी पर चढ़ा दिया था। उन्होंने अपनी मुक्ति होते ही नेतृत्व स्वीकार किया और अंग्रेजों की दी हुई फांसी का प्रतिशोध लेने के लिए पहला काम यह किया कि पहरे में बंद मुख्य अंग्रेज अधिकारी लेनाक्स को संदेश भेजा कि मेरे कारावास की अवधि में मुझे हुक्का भिजवाने के लिए मैं आभारी हूं। वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि। लोकोत्तराणां चेतांसि को हि विज्ञातुमर्हति।। फांसी का दंड जिन्होंने दिया उसने हुक्का दिया, इसलिए आभार व्यक्त करते हुए मौलवी अहमद शाह ने अंग्रेज अधिकारियों के सुरक्षार्थ फैजाबाद शहर में विद्रोह होते ही दूसरे स्थानों पर जो लूटमार होती थी वह न हो, इसलिए सिपाहियों की टोलियां भेजकर नोकबंदी कर दी। सार्वजनिक भवन और बारूदखानों पर पहरा बैठाया गया। 15वीं रेजिमेंट के सिपाहियों ने एक युद्ध समिति बनाकर यह तय किया कि अंग्रेज अधिकारियों को मार डाला जाए, परंतु पहले दिए हुए वचन के अनुसार ऐसा करना ठीक नहीं, यह 1857 का स्वातंत्र्य समर - 211

बड़े अधिकारियों ने तय कर अंग्रेजों को जीवित छोड़ दिया। उन्हें सूचित किया गया-‘6आप में से जिनकी इच्छा हो वे अपनी निजी संपत्ति ले जाएं, पर सार्वजनिक संपत्ति में सुतली का टुकड़ा भी आपको नहीं ले जाने दिया जाएगा, क्योंकि वह अब अवध के वाजिद अली शाह की संपत्ति है।’100 इसके बाद विद्रोहियों ने अंग्रेजों को नौकाएं दिलवाईं, उन्हें पैसा दिया और फिर सिपाहियों से विदा लेकर वे सारे अधिकारी नौकाओं में बैठ घाघरा नदी से चले गए। 9 जून का प्रातः फैजाबाद स्वतंत्र हो गया और कंपनी का राज वहां समाप्त करके वाजिद अली शाह का राज शुरू हो जाने की डोंड़ी पीटी गई। जिन चार नौकाओं में बैठकर अंग्रेज जा रहे थे उनपर 17वीं रेजिमेंट की नजर पड़ी। उस रेजिमेंट को फैजाबाद से सिपाहियों ने पत्र भेजा था कि वहां से जा रहे फिरंगियों को मार डालें। उसी के अनुसार उन नौकाओं पर हमला हुआ। फैजाबाद का मुख्य कमिश्नर गोल्डवे मारा गया। लेफ्टिनेंट थॉमस, रिचे मेल, एडवर्डर्स, कैरी आदि सारे अंग्रेज मौत के घाट उतारे गए। महोबा गांव में जो थे उन्हें भी वहां की पुलिस ने मार डाला। एक नौका बच गई। उसका सहब भूसे में अंत तक छिपा रहा, इसलिए और मल्लाहों की कृपा से अंग्रेजी पलटन में सुरक्षित पहुंच गया। अपने घर में छिपे अंग्रेजों के स्त्री-बच्चों की कैसे रक्षा करें, यह चिंता राजा मान सिंह को थी। तभी बहुत से अंग्रेज पुरूष भी वहां आश्रय के लिए आ गए। मान सिंह उस समय अवध में था। उसने लिख भेजा कि मैंने विद्रोहियों को यह समझा दिया है कि यदि अंग्रेज स्त्री-बच्चों को रखने की अनुमति आप देंगे तो अंग्रेज पुरूषों को मैं आश्रय नहीं दूंगा। इस शर्त का पालन मान सिंह करता है या नहीं, देसरे दिन इसकी जांच करने की बात भी तय हुई। तब उसके किले में छिपे अंग्रेज संकटों से जूझते हुए जो बचे वे गोपालपुर के राजा के यहां पहुंचे। उन 29 अंग्रेजों को बहुत सम्मान के साथ रखकर उस राजा ने उन्हें अंग्रेजी ठिकाने पर पहुंचा दिया। इस सन् 1857 के साल में जो अंग्रेज मरते-मरते बचे उनमें से अधिकतर लोगों ने राष्ट्र की उदात्त मनोवृति के जीवंत स्मारक हैं। अवध में इतना द्वेष व्याप्त होते हुए भी विद्रोहियों की ओर से लड़ रहे राजाओं के घर शरण में आए अंग्रेज मजे में थे। ऐसे हजारों उदाहरण घटित हुए हैं। बुशर लिखता है-“आज मैं अकेला जीवित बचा हूं। भागते-भागते एक गांव में मैं पहुंचा । उसमें घुसते ही जो पहला आदमी मिला वह ब्राह्मण था। मैंने पीने को पानी मांगा। मेरी दुर्दशा देख उसे दया आ गई और उसने कहा-इस गांव में सभी ब्राह्मण हैं, तुझे कोई मारेगा नहीं˙˙। बुली सिंह पीछा करते 1857 का स्वातंत्र्य समर – 212 100 “Might take with them all private property but no public property, as that all belongs to thekind of Oudh.”&Charles Ball, Vol. II, Page 394

आया। मैं एक गली में भागा-वहां मुझे एक बुढ़िया मिली। उसमें झोपड़ी की ओर अंगुली की। मैं वहां गया और वहां लगे भूसे के ढेर में छिप गया। कुछ ही देर में बुली सिंह के लोग वहां आए और तलवार के सिरे इधर-उधर घुसेड़ने लगे। जल्दी ही मैं मिल गया। उन्होंने मुझे बाल पकड़कर खींचते हुए बाहर फेंक दिया। गांव के लोगों ने फिरंगियों पर गालियों की बौछार शुरू की। फिर बुली सिंह मुझे वहां से निकाल दूसरी ओर ले चला। हर गांव में मैं घुटने टेक शरणागत भाव दिखाता और मुत्यु टल जाती। इस तरह मैं बुली सिंह के बाड़े में पहुंचा। वहां से मुझे बहुत दिनों बाद अंग्रेजों की ओर पहुंचा दिया गया। कर्नल मेनॉक्स लिखता है-'6जब हम भाग रहे थे तब हमें नाजिम हुसैन खान के आदमियों ने पकड़ लिया। उसमेंमें से एक पिस्तौल निकाल दांत भींचता बोला, "फिरंगियों को चुटकी बजाते गारद करन की मेरे हाथ फड़फड़ा रहे हैं। परंतु क्या करूं?' वे हमें उस नाजिम के पास ले गए। वह दरबार में मसनद से टिका बैठा था। उसमें हमें कहा कि आप आराम फरमाओं और थोड़ा शरबत पियो। डरो नहीं। हमें रहने को कौन सा स्थान दिया जाए? यह प्रश्न उपस्थित हुआ तो एक गुस्सैल नौकर बोला, 'घोड़ों का तबेला कुछ बुरा नहीं है।' उसकी इस बात पर नाजिम क्रोधित हुआ। परंतु इतने में दूसरे ने कहा, 'इतना झंझट ही क्यों उठाएं, मैं इन फिरंगी कुत्तों को मार ही डालता हूं।'' इसपर नाजिम ने डपटकर सबको चुप किया और हमें अभय वचन दिया। विद्रोहियों के डर से हम जनानाखाने के पास छिपे रहे। हमें उत्तम अन्न, वस्त्र और आराम मिलता रहा। बाद में हम सबको नेटिवों के वेश में नाजिम ने अंग्रेजी छावनी में पहुंचा दिया।'' फैजाबाद शहर से अंग्रेज अधिकारियों के भागते ही उस प्रांत के अन्य जिलों ने भी विद्रोह का झंडा खड़ा किया। सुलतानपुर में उसी दिन अर्थात् 9 जून को ही विद्रोह हुआ। तीसरे जिला स्थान सलोनी में 10 जून को विद्राह प्रारंभ हुआ। वहां के भागते हुए अधिकारियों में से कुछ के प्राण रुसतमशाह नामक सरदार ने और कुछ के राजा हनुमंत सिंह ने बचाए। अंग्रेज लोगों के शरणागत होने पर केवल उन्हें जीवनदान देकर ही ये अवध के शूर और उदार राजे रुके नहीं बल्कि उन्होंने उनकी यथायोग्य आवभगत भी की। वास्तव में उन प्रत्येक राजा और जमींदारों की अंग्रेजों ने बहुत हानि की थी और उनका अपमान भी किया था। उनका देव राज नामशेष हो गया था और उनके धर्म को नष्ट किया-ये बातें जमींदार और राजे भूल गए थे, ऐसा भी नहीं। अपने-अपने अनुयायियों को लेकर उन्होंने खुला रण किया और अंग्रेजों को हिंदुस्तान से भगा देने के पहले आराम नहीं करना है, उन्होंने ऐसी प्रतिज्ञा की। परंतु इस वीरोचित स्वतंत्रता-प्राप्ति के साथ ही वीरोचित उदारता दिखाने में भी उन्होंने कमी नहीं की। लोक समाज बिना रुके गुस्से में काटता चल रहा था, तब भी उन्होंने अंग्रेज स्त्री-बच्चों को सम्मान देकर अपूर्व दयाशीलता 1857 का स्वातंत्र्य समर – 213