१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंखड़ा किया गया जिससे इधर-उधर लोक क्षोभ की अग्नि प्रज्वलित होने लगी। इस अग्नि क चिनगारियां बीच में ही गलती से कैसे उड़ी, यह पहले कहा है। खुद मौलवी सिकंदर शाह को राजद्रोह के अपराध के कारण पहले फांसी और बाद में कारावास का दंड दिया गया और 7वीं रेजिमेंट को निःशस्त्र किया गया। सर हेनरी लॉरेंस ने लश्कर को यथासंभव नियंत्रण में रखने के लिए 12 मई को एक बड़ा दरबार आयोजित किया। उसमें स्वयं उसने हिंदुस्थानी भाषा में एक कौशलपूर्ण व्याख्यान दिया, राजनिष्ठा का महत्त्व बतलाया। महाराजा रणजीत सिंह द्वारा किए गए मुसलिम धर्म के अपमानों और औरंगजेब द्वारा किए हिंदू धर्म के अपमानों का स्पष्ट प्रतिपादन करने के बाद अंग्रेज सरकार ने इस परस्पर द्वेष से हिंदू-मुसलमानों को कैसे बचाया-यह बात विस्तार से कही और बाद में जिस किसी सिपाही ने 7वीं रेजिमेंट की निःशस्त्रीकरण विधि में उत्तम राजनिष्ठा प्रदर्शित की थी उन्हें तलवारें, शॉल, साफे आदि पुरस्कार स्वयं लॉरेंस ने अपने हाथ से दिए। लेकिन कितना विरोधाभास! इन पुरस्कार प्राप्त राजनिष्ठों को ही कुछ समय बाद विद्रोह के षड़यंत्र में सम्मिलित सिद्ध होने पर फांसी दी गई। राजनिष्ठा का यह दरबार 12 मई को हुआ और 13 मई को खबर आई कि मेरठ शहर ने विद्रोह किया और 14 मई को समाचार आया-दिल्ली पर विद्रोहियों का कब्जा हो गया है और वहां स्वतंत्रता की घोषणा हो गई है। ये समाचार आते ही सर हेनरी लॉरेंस ने लखनऊ शहर के पास के मच्छी भवन और रेजिडेंसी-ये दो स्थान चुनकर उन्हें अंग्रेजों के रहने योग्य बनाना प्रारंभ किया। अंग्रेजों की सारी महिलाएं, बच्चें वहां ले जाए गए और गैर लश्करी अधिकारी, बाबू, व्यापारी आदि सभी वयस्क पुरुषों को लश्करी कवायद, अनुशासन और शस्त्र आदि का प्रशिक्षण देकर तैयार किया गया। मेरठ की ओर बगावत हो जाने के बाद वहां के असैनिक अधिकारियों आदि को भी तत्काल ऐसा ही फौजी प्रशिक्षण देकर कोई दस दिन में युद्ध के लिए तैयार किया गया था। सर हेनरी लॉरेंस को ही पूरे प्रदेश का मुख्य फौजी अधिकारी बनाया गया। अवध का प्रदेश नेपाल से लगा होने के कारण लॉरेंस का प्रयास नेपाल के राजा जंग बहादुर को अपनी सहायता के लिए सेना लेकर बुलाने का चल रहा था। इन सारी व्यवस्थाओं के चालू रहते सर लॉरेंस को रोज यह पक्का समाचार मिलता कि आज विद्रोह होगा। ऐसा समाचार मिलते ही लॉरेंस विशेष बंदोबस्त करने लगता। पर दूसरा दिन उदय हो जाने के बाद भी विद्रोह न होता-ऐसा बार-बार होता रहा। 30 मई को लॉरेंस को किसी अधिकारी ने समाचार दिया कि आज रात नौ बजे विद्रोह होगा। 30 मई का सूर्यास्त हो गया। हेनरी लॉरेंस अपने साथियों सहित भोजन करने बैठा था, तभी रात नौ बजे की तोप की आवाज हुई। जिसने इस बार विद्रोह होने का पक्का समाचार दिया था वह पहले की तरह ही गलत हुआ, इसलिए लॉरेंस ने उसकी 1857 का स्वातंत्र्य समर – 206