भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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ओर झुककर कहा, "तुम्हारे मित्र समय-पालन में पक्के नहीं है।" 'समय-पालन में पक्के नहीं है!' यह वाक्य हेनरी लॉरेंस कह भी न पाया कि 71वीं पैदल पलटन द्वारा छोड़ी गई बंदूकों की आवाज उसके कानों में आने लगी। इस रेजिमेंट के पहले से बनाए गए कार्यक्रम के अनुसार नौ बजे की तोप छूटते ही उसकी अलग-अलग टोलियां यूरोपियनों के बंगलों पर टूट पड़ी। 71वीं रेजिमेंट के मेस हाउस को आग लगाकर उन्होंने यूरोपियनों पर बंदूकों से गोलियों की झड़ी लगानी शुरू की। इस रेजिमेंट का लेफ्टिनेंट ग्रांट भागा जा रहा था तो किसी ने उसे खाट के नीचे से खींचकर सिपाहियों ने गारद किया। लेफ्टिनेंट हार्डिंग कुछ घुड़सवारों के साथ रास्ता रोकने आया तो उसे भी तलवार ने साफ कर दिया। पूरा कैंटोनमेंट सुलग गया। ब्रिगेडियर हर्डस्कोम भी मारा गया। रात भर अंग्रेजी झंडे को थामे रहे नेटिव और गोरे सोल्जर विद्रोह को रोके रहे। सुबह अर्थात् 31 मई को हेनरी लॉरेंस ने विद्रोहियों पर अपने मातहत यूरोपियन और अभी भी राजनिष्ठ बनी हुई नेटिव सेना को लेकर हमला किया। परंतु रास्ते में ही उसके साथ की 6वीं घुड़सवार रेजिमेंट ने विद्रोह किया, इसलिए सर हेनरी उन सब सिपाहियों को वहीं छोड़कर लौट गया। लखनऊ में यूरोपियनों की 32वीं रेजिमेंट पूरी गोरी होते हुए और गोरे तोपखाने का सहयोग होते हुए भी 31 मई की शाम के पहले नेटिवों की 71वीं पैदल रेजिमेंट, 48वीं पैदल रेजिमेंट, 7वीं घुड़सवार रेजिमेंट और अधिकतर इरेंग्यूलर सेना ने विद्रोह का झंडा गाड़ दिया। लखनऊ से इक्यावन मील दूर अवध की वायव्य दिशा का मुख्य शहर सीतापुर है। इस शहर में सन् 1857 में 41वीं पैदल, 9वीं इरेंग्यूलर पैदल पलटन ऐसी तीन नेटिव रेजिमेंट थी। वहां उसका कमिश्नर और अन्य बड़े-बड़े यूरोपियन अधिकारी भी रहते थे। 27 मई को अंग्रेजों की एक बस्ती में आग लगा दी गई थी। परंतु यह आग विद्रोह की अग्रिम सूचना है, यह अनुमान अभी तक युरोपियनों को न होने से उन्होंने उस आग को भुला दिया। और क्या कहें, स्वयं सिपाहियों ने ही उसे बुझाने में अथक श्रम किया था। इस अग्रिम सूचना ने दो काम किए। एक यह कि षड़यंत्रकारियों को समय हो जाने की सूचना और दूसरा अंग्रेज अधिकारियों के भोलेपन की जांच। जून की दूसरी तारीख को एक नई घटना हुई। सिपाहियों को दी गई नमक की बोरियों को उन्होंने यह कहकर नहीं लिया कि उसमें हड्डियों का चूरा है। इतना हीनहीं, उन्हें तत्काल गंगा में डाल दिया जाए, ऐसी जिद भी की। अंग्रेजों ने इसीलिए वे बोरियां नदी में फेंक भी दी। अब और भी मजा आ गया, उसी दिन दोपहर के समय यूरोपियन लोगों के बगीचों में एकाएक सिपाही घुस गए और चाहे जिस पेड़ पर चढ़कर आनंद से फल खाने लगे। अंग्रेज अधिकारी चिल्लाते रहे, पर सिपाहियों का फलाहार किसी तरह भी रोका न जा सका। इस तरह भयंकर फलाहार करने के बाद उसे हजम करने के लिए उतना ही भयंकर व्यायाम शुरू हो गया। 3 जून को सिपाहियों की एक टोली ने खजाने पर हमला 1857 का स्वातंत्र्य समर - 207