१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर उसे कब्जे में ले लिया और बाकी के सिपाही कमिश्नर के बंगले की ओर बढ़े। रास्ते में कर्नल बर्च और लेफ्टिनेंट ग्रोव्स मिले तो उन्हें मार डाला गया। एक इर्रेंग्यूलर ने भी अपने अंग्रेज अधिकारी काट डाले और सारे-के-सारे सिपाही “यूरोपियन शासन खत्म हुआ”, ऐसा चिल्लाते-चिल्लाते गोरे लोगों पर टूट पड़े। एक नदी के रास्ते में कमिश्नर अपनी पत्नी को लेकर भागने लगा। उसे उसकी पत्नी और लड़के को लेकर नदी पर जोन से पहले ही मार डाला गया। थॉर्नहिल और उसकी पत्नी भी गोली लगने से मर गए। रामकोट के जमींदार की शरण में चले गए और आठ-आठ, दस-दस माह तक सुरक्षित रखकर लखनऊ पहुंचाए गए। सीतापुर के सारे सिपाही फिर फर्रुखाबाद की ओर चले गए। वहां के यूरोपियनों ने जिस किले का आश्रय लिया था वह किला बहुत प्रयास से जीतने के बाद उन्होंने सारे यूरोपियनों को काट डाला। नवाब तफुज्जुर हुसैन खान को अंग्रेजों द्वारा अधिगृहीत गद्दी पर फिर से बैठाया गया। इस नवाब ने भी अपने प्रदेश में मिले हर यूरोपियन को पकड़वाकर मार डाला। इस तरह फर्रुखाबाद प्रदेश में 1 जुलाई को एक भी अंग्रेज शेष नहीं रहा। सीतापुर के उत्तर में चौवालीस मील पर बसे मलान शहर में जो अंग्रेज अधिकारी थे उन्हें सिपाहियों और नागरिकों के षड्यंत्र तथा सीतापुर का समाचार मिलते ही वे घोड़ो पर बैठकर भाग गए और वह जिला बिना रक्त की एक बूंद बहाए स्वतंत्र हो गया। तीसरा जिला महम्मदी है। वहां के यूरोपियनों ने अपनी महिलाएं मिटौली के राजा के यहां भेजीं तो उस राजा ने उनसे कहा कि तुम्हें मेरे जंगल में छिपकर रहना पड़ेगा। तुम्हारी खुली सुरक्षा करने की क्षमता मुझमें नहीं है; क्योंकि पूरे अवध के सिपाहियों ने विद्रोह करने की शपथ ली हुई है। उस राजा के पास अपनी महिलाएं पहुंचाने के बाद महम्मदी के अंग्रेज अधिकारियों ने वहां के किले में शरण ली। इसी दिन-जैसाकि पहले कहा गया है-रूहैलखंड के शाहजहांपुर से भागते हुए अंग्रेज महम्मदी पहुंच गए। पर महम्मदी में सुरक्षा न होने से वहां के अधिकारियों ने सीतापुर को संदेश भेजा कि वे इन अनाथ अंग्रेजों को सीतापुर ले जाएं। सीतापुर में तब तक विद्रोह नहीं हुआ था, इसलिए वहां से सिपाहियों की एक टोली गाड़ियों के साथ उन अनाथ अंग्रेजों को लेने के लिए पहुंची। परंतु सीतापुर के ये सिपाही महम्मदी में विद्रोह के बीच आए थे। उन्होंने सारे अंग्रेजों को गाड़ियों से भरा, सीतापुर के आधे रास्ते तक सुरक्षित लाए और वहां उन्हें गाड़ियों से उतारकर मार डाला। इसमें सात-आठ महिलाएं, चार बच्चे, आठ लेफ्टिनेंट, चार कैप्टन और कुछ अन्य पुरूष थे। इधर महम्मदी में बचे हुए अंग्रेज अधिकारी तत्काल भाग गए और इस तरह उस पूरे जिले में जून की चौथी तारीख को ब्रिटिश राज्यसत्ता का कोई चिह्न न रहा। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 208