भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 208, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 208

बड़े अधिकारियों ने तय कर अंग्रेजों को जीवित छोड़ दिया। उन्हें सूचित किया गया-‘6आप में से जिनकी इच्छा हो वे अपनी निजी संपत्ति ले जाएं, पर सार्वजनिक संपत्ति में सुतली का टुकड़ा भी आपको नहीं ले जाने दिया जाएगा, क्योंकि वह अब अवध के वाजिद अली शाह की संपत्ति है।’100 इसके बाद विद्रोहियों ने अंग्रेजों को नौकाएं दिलवाईं, उन्हें पैसा दिया और फिर सिपाहियों से विदा लेकर वे सारे अधिकारी नौकाओं में बैठ घाघरा नदी से चले गए। 9 जून का प्रातः फैजाबाद स्वतंत्र हो गया और कंपनी का राज वहां समाप्त करके वाजिद अली शाह का राज शुरू हो जाने की डोंड़ी पीटी गई। जिन चार नौकाओं में बैठकर अंग्रेज जा रहे थे उनपर 17वीं रेजिमेंट की नजर पड़ी। उस रेजिमेंट को फैजाबाद से सिपाहियों ने पत्र भेजा था कि वहां से जा रहे फिरंगियों को मार डालें। उसी के अनुसार उन नौकाओं पर हमला हुआ। फैजाबाद का मुख्य कमिश्नर गोल्डवे मारा गया। लेफ्टिनेंट थॉमस, रिचे मेल, एडवर्डर्स, कैरी आदि सारे अंग्रेज मौत के घाट उतारे गए। महोबा गांव में जो थे उन्हें भी वहां की पुलिस ने मार डाला। एक नौका बच गई। उसका सहब भूसे में अंत तक छिपा रहा, इसलिए और मल्लाहों की कृपा से अंग्रेजी पलटन में सुरक्षित पहुंच गया। अपने घर में छिपे अंग्रेजों के स्त्री-बच्चों की कैसे रक्षा करें, यह चिंता राजा मान सिंह को थी। तभी बहुत से अंग्रेज पुरूष भी वहां आश्रय के लिए आ गए। मान सिंह उस समय अवध में था। उसने लिख भेजा कि मैंने विद्रोहियों को यह समझा दिया है कि यदि अंग्रेज स्त्री-बच्चों को रखने की अनुमति आप देंगे तो अंग्रेज पुरूषों को मैं आश्रय नहीं दूंगा। इस शर्त का पालन मान सिंह करता है या नहीं, देसरे दिन इसकी जांच करने की बात भी तय हुई। तब उसके किले में छिपे अंग्रेज संकटों से जूझते हुए जो बचे वे गोपालपुर के राजा के यहां पहुंचे। उन 29 अंग्रेजों को बहुत सम्मान के साथ रखकर उस राजा ने उन्हें अंग्रेजी ठिकाने पर पहुंचा दिया। इस सन् 1857 के साल में जो अंग्रेज मरते-मरते बचे उनमें से अधिकतर लोगों ने राष्ट्र की उदात्त मनोवृति के जीवंत स्मारक हैं। अवध में इतना द्वेष व्याप्त होते हुए भी विद्रोहियों की ओर से लड़ रहे राजाओं के घर शरण में आए अंग्रेज मजे में थे। ऐसे हजारों उदाहरण घटित हुए हैं। बुशर लिखता है-“आज मैं अकेला जीवित बचा हूं। भागते-भागते एक गांव में मैं पहुंचा । उसमें घुसते ही जो पहला आदमी मिला वह ब्राह्मण था। मैंने पीने को पानी मांगा। मेरी दुर्दशा देख उसे दया आ गई और उसने कहा-इस गांव में सभी ब्राह्मण हैं, तुझे कोई मारेगा नहीं˙˙। बुली सिंह पीछा करते 1857 का स्वातंत्र्य समर – 212 100 “Might take with them all private property but no public property, as that all belongs to thekind of Oudh.”&Charles Ball, Vol. II, Page 394

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर) · पृष्ठ 208, कुल 418 में से · BharatKosha