भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 207, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 207

उसने लेखनी पकड़ी और राज्य क्रांतिकारक लेखों को वह सारे अवध प्रांत में फैलाने लगा। एक हाथ में तलवार और एक हाथ में लेखनी! ऐसे लोकोत्तर पुरुष के तेज से स्वराज्य की ज्वाला भड़कने लगी है-यह देखकर अंग्रेजों ने उसे पकड़ने का आदेश जारी किया। परंतु अवध की पुलिस ने उस लोकनाथ को नहीं पकड़ा। तब सेना भेजकर उसे पकड़ा गया। राजद्रोह का आरोप लगाकर उसकी छानबीन की गई और उसे फांसी का दंड देकर फैजाबाद के कारावास में रखा गया। मौलवी की और अंग्रेजी सत्ता की एक-दूसरे को फांसी पर चढ़ाने की जंगी प्रतियोगिता शुरू हो गई। मौलवी अंग्रेजी सत्ता को फांसी देने की तैयारी कर रहे थे तो अंग्रेजी सत्ता मौलवी को फांसी चढ़ाने का स्थान बनाने की जल्दी कर रही थी। परंतु इस जल्दी में उन्होंने मौलवी का फैजाबाद कैद में रखकर अपने लिए ही फांसी के खंभे खड़े किए; क्योंकि मौलवी को फैजाबाद कैद में रख ने से क्रांति की बारूद से ठसाठस भरी गुप्त सुरंग पर मानो चिंगारी पड़ी। वह शहर वहां के लश्कर के साथ 'हर-हर महादेव' की घोषणा के साथ विद्रोह कर उठा। सिपाहियों को काबू में रखने के लिए अधिकारी परेड पर गए तो सिपाहियों ने उन्हें साफ कहा कि अब हम स्वदेशी अधिकारियों के अधीन हैं और हमारा नेता सूबेदार दिलीप सिंह है। सूबेदार दिलीप सिंह ने सारे अधिकारियों के घर पर पहरा बैठा दिया और उन्हें बारह कदमों से अधिक इधर-उधर हिलने पर कड़ी रोक लगा दी और फिर नागरिकों और सिपाहियों ने उस लोकनाथ की ध्वनि से खुला और मौलवी अहमद शाह टुकड़े-टुकड़े हुई श्रृंखलाओं को फेंककर जय-जयकार से आकर मिले। मौलवी का पुनर्जन्म हुआ था। उन्हें अंग्रेज सत्ता फांसी पर चढ़ाने वाली थी, उन्होंने अंत में उसे ही फांसी पर चढ़ा दिया था। उन्होंने अपनी मुक्ति होते ही नेतृत्व स्वीकार किया और अंग्रेजों की दी हुई फांसी का प्रतिशोध लेने के लिए पहला काम यह किया कि पहरे में बंद मुख्य अंग्रेज अधिकारी लेनाक्स को संदेश भेजा कि मेरे कारावास की अवधि में मुझे हुक्का भिजवाने के लिए मैं आभारी हूं। वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि। लोकोत्तराणां चेतांसि को हि विज्ञातुमर्हति।। फांसी का दंड जिन्होंने दिया उसने हुक्का दिया, इसलिए आभार व्यक्त करते हुए मौलवी अहमद शाह ने अंग्रेज अधिकारियों के सुरक्षार्थ फैजाबाद शहर में विद्रोह होते ही दूसरे स्थानों पर जो लूटमार होती थी वह न हो, इसलिए सिपाहियों की टोलियां भेजकर नोकबंदी कर दी। सार्वजनिक भवन और बारूदखानों पर पहरा बैठाया गया। 15वीं रेजिमेंट के सिपाहियों ने एक युद्ध समिति बनाकर यह तय किया कि अंग्रेज अधिकारियों को मार डाला जाए, परंतु पहले दिए हुए वचन के अनुसार ऐसा करना ठीक नहीं, यह 1857 का स्वातंत्र्य समर - 211