भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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पृष्ठ 206

लिया जाएगा, यह डर फैजाबाद के अंग्रेजी अधिकारियों को मेरठ का समाचार सुनने के बाद लगने लगा और उस संकट से कैसे बचा जाए, इस चिंता ने उन्हें बेचैन कर दिया। अपने बाल-बच्चे लखनऊ की ओर भेजें तो लखनऊ के रास्तों पर विद्रोहियों की पक्की नाकाबंदी होने से उधर जाना कठिन था और फैजाबाद शहर में दो-दो हाथ करने की तैयारी की जाए तो वहां पूरी सेना नेटिव थी। ऐसी विकट विवशता में फंसे फैजाबाद के अंग्रेज अधिकारी अंत में राजा मान सिंह की शरण गए। अवध प्रांत के सारे हिंदू लोगों का राजा मानसिंह की तलवार म्यान के बाहर ही रहती थी। सन् 1857 के मई माह में इस राजा को किसी वसूली प्रकरण में कारावास में डाल रखा था। परंतु अब मेरठ के विद्रोह के कारण अंग्रेजों की कमर टूट सी जाने से उन्होंने राजा मान सिंह को मनाने को उसे कैदखाने से मुक्त कर दिया। उसने अंग्रेज स्त्रियों और बच्चों को अपने लोगों को आश्रय दे रहा हूं, यह बात लोगों को पसंद नहीं आएगी। इतना ही नहीं, इसके लिए वे मुझपर भी प्रहार करने से नहीं चूकेंगे।'' 7 जून को मान सिंह के यहां अंग्रेज अधिकारियों के परिवार आश्रय के लिए गए और उसके शाहगंज किले में सुरक्षित रहने लगे। अंग्रेज लोग अपनी सुरक्षा की ऐसी तैयारी कर रहे थे, तभी फैजाबाद में आग लपटों में बदल गई। फैजाबाद में जो अनेक तालुकेदार थे उनमें से एक का नाम मौलवीअहमद शाह था। यह नाम इतिहास में अजर-अमर होने को था। यह नाम देशभक्तों, देशवीरों की माला में गूंथा जानेवाला था। इस नाम ने अपने तालुके की तालुकेदारी ही नहीं, अपने देश की देशदारी करने का कंकण भी अपने हाथ में बांधा था।देश के दरवाजे पर पहरा देने के लिए रतजगा किया था और उस दरवाजे से देश में घुसना चाहनेवाली विदेशी सत्ता को रोकने के लिए अब उसने हाथ में अपना सर्वस्व स्वदेश और स्वधर्म को अर्पण किया और वह मौलवी स्वयं हिंदुस्थान भर राज्य क्रांति का उपदेश देते हुए पर्यटन करने निकला। यह राजनीतिक संन्यासी जिस-जिस प्रदेश में अपनी चरणरज डालता गया वहां-वहां लोकशक्ति में कुछ विलक्षण चेतना का संचार होता गया। क्रांति पक्ष के बड़े-बड़े नेताओं से वह स्वयं मिला। अवध के राजपरिवार में उसकी सलाह के बिना पत्ता भी नहीं हिलता था। उसने आगरा में गुप्त मंडली की स्थापना की। उसने लखनऊ में ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने का खुला उपदेश दिया। अवध प्रदेश के जनपदों की उस पद बड़ी श्रद्धा उत्पन्न हो गयी थी। शरीर, मन, वाणी एवं बुद्धि से स्वदेश की स्वतंत्रता के उपदेश और गुप्त संगठनों के जाल बुनने का अश्रांत श्रम करने के बाद 1857 का स्वातंत्र्य समर - 210