१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआया। मैं एक गली में भागा-वहां मुझे एक बुढ़िया मिली। उसमें झोपड़ी की ओर अंगुली की। मैं वहां गया और वहां लगे भूसे के ढेर में छिप गया। कुछ ही देर में बुली सिंह के लोग वहां आए और तलवार के सिरे इधर-उधर घुसेड़ने लगे। जल्दी ही मैं मिल गया। उन्होंने मुझे बाल पकड़कर खींचते हुए बाहर फेंक दिया। गांव के लोगों ने फिरंगियों पर गालियों की बौछार शुरू की। फिर बुली सिंह मुझे वहां से निकाल दूसरी ओर ले चला। हर गांव में मैं घुटने टेक शरणागत भाव दिखाता और मुत्यु टल जाती। इस तरह मैं बुली सिंह के बाड़े में पहुंचा। वहां से मुझे बहुत दिनों बाद अंग्रेजों की ओर पहुंचा दिया गया। कर्नल मेनॉक्स लिखता है-'6जब हम भाग रहे थे तब हमें नाजिम हुसैन खान के आदमियों ने पकड़ लिया। उसमेंमें से एक पिस्तौल निकाल दांत भींचता बोला, "फिरंगियों को चुटकी बजाते गारद करन की मेरे हाथ फड़फड़ा रहे हैं। परंतु क्या करूं?' वे हमें उस नाजिम के पास ले गए। वह दरबार में मसनद से टिका बैठा था। उसमें हमें कहा कि आप आराम फरमाओं और थोड़ा शरबत पियो। डरो नहीं। हमें रहने को कौन सा स्थान दिया जाए? यह प्रश्न उपस्थित हुआ तो एक गुस्सैल नौकर बोला, 'घोड़ों का तबेला कुछ बुरा नहीं है।' उसकी इस बात पर नाजिम क्रोधित हुआ। परंतु इतने में दूसरे ने कहा, 'इतना झंझट ही क्यों उठाएं, मैं इन फिरंगी कुत्तों को मार ही डालता हूं।'' इसपर नाजिम ने डपटकर सबको चुप किया और हमें अभय वचन दिया। विद्रोहियों के डर से हम जनानाखाने के पास छिपे रहे। हमें उत्तम अन्न, वस्त्र और आराम मिलता रहा। बाद में हम सबको नेटिवों के वेश में नाजिम ने अंग्रेजी छावनी में पहुंचा दिया।'' फैजाबाद शहर से अंग्रेज अधिकारियों के भागते ही उस प्रांत के अन्य जिलों ने भी विद्रोह का झंडा खड़ा किया। सुलतानपुर में उसी दिन अर्थात् 9 जून को ही विद्रोह हुआ। तीसरे जिला स्थान सलोनी में 10 जून को विद्राह प्रारंभ हुआ। वहां के भागते हुए अधिकारियों में से कुछ के प्राण रुसतमशाह नामक सरदार ने और कुछ के राजा हनुमंत सिंह ने बचाए। अंग्रेज लोगों के शरणागत होने पर केवल उन्हें जीवनदान देकर ही ये अवध के शूर और उदार राजे रुके नहीं बल्कि उन्होंने उनकी यथायोग्य आवभगत भी की। वास्तव में उन प्रत्येक राजा और जमींदारों की अंग्रेजों ने बहुत हानि की थी और उनका अपमान भी किया था। उनका देव राज नामशेष हो गया था और उनके धर्म को नष्ट किया-ये बातें जमींदार और राजे भूल गए थे, ऐसा भी नहीं। अपने-अपने अनुयायियों को लेकर उन्होंने खुला रण किया और अंग्रेजों को हिंदुस्तान से भगा देने के पहले आराम नहीं करना है, उन्होंने ऐसी प्रतिज्ञा की। परंतु इस वीरोचित स्वतंत्रता-प्राप्ति के साथ ही वीरोचित उदारता दिखाने में भी उन्होंने कमी नहीं की। लोक समाज बिना रुके गुस्से में काटता चल रहा था, तब भी उन्होंने अंग्रेज स्त्री-बच्चों को सम्मान देकर अपूर्व दयाशीलता 1857 का स्वातंत्र्य समर – 213