भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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प्रदर्शित की। उनको जिन अंग्रेज अधिकारियों ने अभी हाल में ही प्रताड़ित किया था उन्हें भी कितनी बार शरण और जीवनदान दिया है। यही अधिकारी फिर भविष्य में उनसे लड़ने आ सकते हैं, इसलिए उनको छोड़ना उचित नहीं, सारी जनता की ऐसी पक्की समझ होते हुए भी उन्होंने वह उदारता प्रदर्शित की। हिंदुस्तान के सिवाए यह वीरता और यह उदारता-ऐसी प्रचंड राज्य क्रांतिकारी और लोकक्षोभक अवधि में अन्य कितने देशों में देखने को मिलेगी? अवध की यह उदारता हतबलता का परिचायक नहीं थी। मई की 31 तारीख से जून का पहला हफ्ता समाप्त होते-न-होते सारा अवध प्रांत एक धड़ाके से विद्रोह कर उठा। उस अवध प्रदेश के अनेक जमींदार राजा अंग्रेजी सत्ता के अधीन थे। वे हजारों सिपाही, पैदल, घुड़सवार, तोपखाना, सरकारी और अन्य विभागों के सारे नौकर, किसान, व्यापारी एवं विद्यार्थी, हिंदू या मुसलमान, हाथ में हाथ थामे एक ही भूमि के दास्य विमोचन हेतु तलवार खींचकर उठ खड़े हुए। निजी वैर, धर्मभेद, जातिभेद, मान-सम्मान, सारे स्वदेश के लिए विलीन हो गए। एक पवित्र ध्येय के लिए न्याय-युद्ध में कूद रहे हैं, प्रत्येक को ऐसा जोश चढ़ा था। दस दिन के अंदर अवध प्रांत में वाजिद अली शाह का शासन लोकशक्ति ने स्वयं प्रेरणा से प्रस्थापित किया। अवध के लोगों के कल्याण के लिए मैंने वाजिद अली शाह को सिंहासन से भूमि पर गिराया, ऐसा डलहौजी ने जो कारण दिया था यह उसका कितना करारा उत्तर था। जून के पहले हफ्ते के अंत में ऐसा एक भी गांव शेष न रहा जहां डलहौजी को करारा उत्तर देने के लिए ब्रिटिश झंडे को फाड़कर टुकड़े नहीं किए गए। इस पूरी परिस्थिति का सूक्ष्म चित्र देते हुए प्रसिद्ध इतिहास संशोधक फॉरेस्ट अपनी प्रस्तावना में लिखता है-"इस तरह दस दिन में अंग्रेजी शासन किसी स्वप्न को तरह था या नहीं था-ऐसा हो गया। उसका लेशमात्र भी न रहा। लश्कर ने विद्रोह किया, जनता ने जुआ उतार फेंका। परंतु इसमें बदला या क्रूरता कहीं भी नहीं। उन बहादुर और क्रोधित लोगों ने कुछ अपवाद छोड़कर राजपक्ष के शरणागत लोगों के साथ बहुत दयालुता से व्यवहार किया। जिन्होंने अपने शासनकाल में मदांध होकर अवध के इन्हीं सरदारों को बहुत गहरे घाव किए थे, आज उन्हीं सत्ताधारियों के पदच्युत होने पर उन सरदारों ने उनसे वीरोचित सम्मान का व्यवहार किया।'' 101 अवध के इस वीरोदार्य से यदि बड़े-बड़े अनुभवी और मंजे हुए अंग्रेज अधिकारी जीवित न छूटते तो अवध को फिर से जीतने के लिए अंग्रेजों के नौसिखया लोग कितने काम आते? जून की 10 तारीख तक अवध प्रांत के स्वतंत्र होते ही उस जिले में स्थान-स्थान पर स्थित सारे लड़ाके लोग और लश्कर के सिपाही लखनऊ की ओर बढ़ चले। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 214 101 फॉरेस्ट कृत-'भूमिका', खंड 2, पृष्ठ 37 ।