भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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लखनऊ शहर में अंग्रेजों का धुरंधर अधिकारी हेनरी लॉरेंस मृत्यु की ओर बढ़ रह ब्रिटिश सत्ता में चैतन्य भरने का प्रयास गन से कर रहा था। सारा प्रदेश हाथ से निकल गया, तब भी राजधानी पर उसने अपना नियंत्रण ढीला नहीं होने दिया था। उसे विद्रोह की गंध बहुत दूर से बहुत पहले ही आ जाने के कारण उसने राजधानी के मच्छी भवन और रेजिडेंसी-ये दो स्थान हर तरह से मजबूत कर लश्करी शक्ति से पूर्ण कर लिये थे, यह पहले ही कहा है। लखनऊ की नेटिव सेना 31 मई को विद्रोह कर निकल जाने के बाद उसने सिख लोगों की एक उत्तम रेजिमेंट तैयार की और पक्के राजनिष्ठ नेटिव लोगों को लेकर एक और रेजिमेंट बनाई। इसके अतिरिक्त नेटिव लश्कर के जो-जो भाग अभी तक राजनिष्ठ बचे हुए थे वे सारे 12 जून तक विद्रोह कर निकल गए। इस विद्रोह से सर हेनरी को एक तरह का संतोष ही हुआ। क्योंकि इससे उसके शिविर में यूरोपियन सेना की रेजिमेंट, यूरोपियन तोपखाना और मंजे हुए राजनिष्ठ सिख और हिंदुस्थानी रेजिमेंट-ऐसा चुना हुआ और विश्वासपात्र लश्कर शेष रह गया था। सर हेनरी अब लड़ाई के लिए हर तरह से तैयार हो गया था। लखनऊ के आसपास अवध प्रांत के विद्रोही सिपाही और लड़ाकू लोग इकट्ठा होते जा रहे थे। उनकी और अंग्रेजों की भिड़ते होने से पहले वे एक अलग ही दांव की राह देख रहे थे। उधर कानपुर का घेरा पूरी रंगत पर होने से लखनऊ के अंग्रेज या आसपास के विद्रोही कोई भी कानपुर का अंतिम समाचार आने तक एक-दूसरे का सामना नहीं कर रहे थे। कानपुर की जय या पराजय पर हर पक्ष की भावी आशा या निराशा टिकी हुई थी। "यदि कानपुर की जय या पराजय पर हर पक्ष की भावी आशा या निराशा टिकी हुई थी। "यदि कानपुर टिका रहा तो लखनऊ घेरा जाएगा या नहीं, यह शंका ही थी।" सर हेनरी ने लॉर्ड केनिंग को आशंकित मन से 13 जून को यह सूचित किया था। 28 जून का लखनऊ समाचार मिला कि कानपुर में एक भी अंग्रेज जीवित नहीं बचा। विजय से उत्साहित होकर विद्रोही अंग्रेजों पर हमला करते चिनहट तक आ पहुंचे। कानपुर में अंग्रेजों की इस भारी पराजय से अंग्रेजी सत्ता जड़ से डगमगाने लगी थी। इस पराजय का किसी भी तरह बदला लिये बिना न सिर्फ लखनऊ की रेजिडेंसी अपितु कलकत्ता के फोर्ट विलियम का जीवन भी सुरक्षित रहना कठिन है, यह जानकर सर हेनरी लॉरेंस ने कानपुर का अपमान विद्रोहियों के रक्त से धो डालने का निश्चय किया। 39 जून को प्रातः ही अंग्रेजी सेना लोहा पुल के पास एकत्र हुई। लगभग चार सौ अंग्रेज सोल्जर, चार सौ नेटिव राजनिष्ठ सिपाही और दस तोपों की चुनी हुई सेना लेकर सर हेनरी लखनऊ से निकला। चलते-चलते काफी आगे आ गया तो भी शत्रु दिखाई न दिया। परंतु अंत में शत्रु का सामना दिखने लगा। विद्रोहियों का सामना दिखते ही अपने दाएं हाथ की ओर एक महत्त्व का गांव जीत लेने का सर हेनरी ने नेटिव लश्कर को 1857 का स्वातंत्र्य समर – 215