भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 212, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 212

आदेश दिया। उसने हमला किया और वह मौके का गांव इसमाइलगंज अंग्रेज सोल्जर ने अपने कब्जे में लिया। विद्रोहियों की तोपों पर भी अंग्रेजी तोपखाने के नेटिव और अंग्रेजी अधिकारियों ने इतने जोर की गोलाबारी की कि `कवे जल्द ही बंद पड़ने लगी। चिनहट की लड़ाई मानो अंग्रेजों ने जीती। इतने में उस बाएं बाजू के गांव में छिपते-छिपते आकर विद्रोहियों ने प्रवेश कर लिया है, यह समाचार उडत्रा और अंग्रेज सोल्जरों पर एक बार फिर इतने जोर का हमला हुआ कि उन्हें उस गांव से भगाकर विद्रोहियों ने उसपर अपना कब्जा कर लिया और वहां से अंग्रेजों पर पीछे और मध्य से बड़े वेग का हमला किया। अंग्रेज सोल्जर जैसे-जैसे हटते वैसे-वैसे विद्रोही उन्हें दबाते जाते। अंग्रेजी सेना उखड़ने लगी और अब खड़े रहे तो सारे मारे जाएंगे, यह देखते ही सर हेनरी ने लौट जाने का बिगुल बजाया। लौटते हुए भी अंग्रेजों का उस दिन बुरा हाल होने लगा; क्योंकि चिनहट की जीत के बाद भी न रूकते विद्रोहियों ने अब अंग्रेजों के पीछे लड़ते हुए चलने का उपक्रम किया। अंग्रेजों की ओर से तोपखाने पर जो नेटिव थे, अब वे लड़ने में टालमटोल करने लगे। परंतु शेष नेटिव घुड़सवार और पैदल सेना ने स्वयं अंग्रेजी सोल्जरों से भी अधिक शूरता से पिछाड़ी की रक्षा की। थोड़ी ही देर में पीछे हटना छोड़ भागना आरंभ हो गया। अंग्रेजी सेना हताश होकर अपने अपमान के साथ लखनऊ की ओर भाग खड़ी हुई। चार सौ सोल्जरों में से डेढ़ सौ सोल्जर उस दिन खेत रहे। नेटिव राजनिष्ठों की तो कोई गिनती नहीं। दो तोपें और एक बड़ी हाविट्जर तोप अंग्रेजों ने मैदान में ही छोड़ दी। कानपुर का बदला भी उन्हें रणांगण में छोड़ना पड़ा। इस तरह मार खाते-खाते सर हेनरी लॉरेंस लखनऊ की रेजिडेंसी में घुस रहा था, तब भी शत्रु उसके पीछे ही था। रेजिडेंसी की सुरक्षा के लिए रखी गई तोपों की सुरक्षा में जब अंग्रेजी राजनिष्ठ सिख-नेटिवों सहित आ गया तब चिनहट की लड़ाई समाप्त हुई। परंतु उसका परिणाम अभी भी समाप्त नहीं हुआ था। अब रेजिडेंसी और मच्छी भवन इन दोनों स्थानों पर विद्रोहियों के शह दिए जाने से सर हेनरी ने मच्छी भवन भी छोड़ देने का निश्चय किया। उसमें संग्रह किए गए भरपूर गोला-बारूद के साति वहां का शस्त्रागार आग लगाकर जला दिया गया। सारे अंग्रेज अब रेजिडेंसी में ही आ गए। रेजिडेंसी में सर हेनरी ने बहुत बढ़िया तैयारी, रसद, शस्त्रास्त्र, गोला-बारूद संग्रह कर रखा था। उस स्थान में अब करीब एक हजार यूरोपियनों और आठ सौ नेटिव सिपाही थे, जो बाहर इकट्ठा हो रहे विद्रोहियों का प्रतिकार करने के लिए सुसज्ज थे। चिनहट की लड़ाई हारने के बाद मच्छी भवन हाथ से छूटते ही अंग्रेजी योद्धाओं ने रेजिडेंसी पर लड़ने के लिए वहां उत्साह से जमाव किया है, यह देखते ही विद्रोहियों ने उसे ही घेरना आरंभ किया। इस तरह अवध प्रांत से अंग्रेजी सत्ता भागते-भागते अंत में इस छोटी सी रेजिडेंसी 1857 का स्वातंत्र्य समर – 216

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर) · पृष्ठ 212, कुल 418 में से · BharatKosha