भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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में बंद कर दी गई थी। 102 शहर में अवध के वाजिद अली शाह के नाम से उसकी बेगम राज्य चलाने लगी। लखनऊ के घेराव में अंग्रेजों से लड़ने के लिए अनेक शूर नेता अपने-अपने अनुयायियों के साथ उधर आने लगे। जिन्होंने अंग्रेजों को शरणागत और अनाथ अवस्था में भागते हुए जीवनदान दिया था वे सारे जमींदार, जागीरदार और राजा इस समय अपनी उदारता झटककर स्वदेश की मुक्ति के लिए लखनऊ की ओर आने लगे। राजा मान सिंह, अन्य सरदार और अहमदशाह के साथ सारे मुसलमान सरदार हाथों में हाथ थामें अंग्रेजी झंडे पर टूट पड़े। राजा हनुमंत सिंह शरण आए हुए अंग्रेजों को विद्रोहियों से बचाने में जितना बढ़-चढ़कर प्रयास कर रहा था उतनी ही प्रमुखता से`अब स्वदेश-मुक्ति के लिए विद्रोहियों के साथ कंधा भिड़ाकर लड़ने लगा। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 217 102 रेड पैंफलेट के सुप्रसिद्ध लेखक ने लिखा है-"संपूर्ण अवध प्रांत हमारे विरुद्ध हथियार लेकर खड़ा हो गया था। स्थायी सेना के सैनिक मात्र ही नहीं, भूतपूर्व शासक के साठ हजार सिपाही, जमींदार तथा उनके सिपाही और दो सौ पचास दुर्ग, जिनमें से अनेक बड़ी-बड़ी तोपों से सुरक्षित थे, हमारे विरूद्ध हो गए थे। ईस्ट इंडिया कंपनी के राज्य की तुलना जनसाधारण ने अपने पुराने शासकों के शासन के साथ की और लगभग सर्वसम्मति से ही उन्होंने अपने पुराने शासकों के पक्ष में अपना मत व्यक्त किया। जिन लोगों को सेना से पेंशन प्रदान कर दी गई थी, ऐसे सेवानिवृत्त सैनिक प्रकट रूप से ही हमारी भर्त्सना करते हुए विद्रोह में सम्मिलित हो गए हैं।"