भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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प्रकरण-10 संकलन दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, बरेली आदि मृतप्राय हुए राजसिंहासनों में फिर से स्वतंत्रता के पवन का संचार करनेवाले इस अद्भुत क्रांति विस्फोट का कुछ एक अंशों में जीवित रहीं अन्य रियासतों पर क्या और कितना प्रभाव हुआ? सन् 1857 के वर्ष में लोक-मन को यह ज्ञात हो चुका था कि अपने देश पर जब तक विदेशी शासन है तब तक विलुप्त हुई रियासतें जितनी मृतवत् हैं उतनी ही बची हुई रियासतें भी मृतवत् हैं। इस पवित्रतम और महत्तम ध्येय से चैतन्य हुआ हिंदुस्थानी जन-सागर किसी विशेष रंक या राजा के लिए नहीं उफना था। व्यक्ति-रंक या राजा-जिए या मरे, देश या राज्य न मरे, मरने नहीं देना है। गुलामी के कालपाश को तोड़कर देश में स्वतंत्रता स्थापित करो, फिर उस लोक हेतु की प्राप्ति के लिए चाहे जितनी झोंपडियां और सिंहासनों की राख के ढेर पर से चलना पड़े, ऐसे लोक पद का रण-घंटा घनघनाया! एक राजा-जो देश को स्वतंत्रता दिलाए वह! अन्य सारे राजा-जो हो बात बराबर! इसलिए ग्वालियर, इंदौर, राजपूताना, भरतपुर आदि अपना प्राण बचाए जी रही रियासतों के लोकमन को संपूर्ण स्वतंत्र प्रदेश की तरह ही क्रांति समर की चेतना हुई थी। अपना राजा और अपनी रियासत बनी है तो फिर दूसरों के लिए संकट क्यों लिया जाए, यह अमंगल विचार किसी को छू नहीं सका। पराया? एक माता के एक पुत्र को दूसरा पुत्र बाहर। तो ग्वालियर के सिंधिया, अब आप हमें अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ने का ओदश दें। 103 1857 का स्वातंत्र्य समर - 218 103 1857 का स्वातंत्र्य समर

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