१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
प्रकरण-10 संकलन दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, बरेली आदि मृतप्राय हुए राजसिंहासनों में फिर से स्वतंत्रता के पवन का संचार करनेवाले इस अद्भुत क्रांति विस्फोट का कुछ एक अंशों में जीवित रहीं अन्य रियासतों पर क्या और कितना प्रभाव हुआ? सन् 1857 के वर्ष में लोक-मन को यह ज्ञात हो चुका था कि अपने देश पर जब तक विदेशी शासन है तब तक विलुप्त हुई रियासतें जितनी मृतवत् हैं उतनी ही बची हुई रियासतें भी मृतवत् हैं। इस पवित्रतम और महत्तम ध्येय से चैतन्य हुआ हिंदुस्थानी जन-सागर किसी विशेष रंक या राजा के लिए नहीं उफना था। व्यक्ति-रंक या राजा-जिए या मरे, देश या राज्य न मरे, मरने नहीं देना है। गुलामी के कालपाश को तोड़कर देश में स्वतंत्रता स्थापित करो, फिर उस लोक हेतु की प्राप्ति के लिए चाहे जितनी झोंपडियां और सिंहासनों की राख के ढेर पर से चलना पड़े, ऐसे लोक पद का रण-घंटा घनघनाया! एक राजा-जो देश को स्वतंत्रता दिलाए वह! अन्य सारे राजा-जो हो बात बराबर! इसलिए ग्वालियर, इंदौर, राजपूताना, भरतपुर आदि अपना प्राण बचाए जी रही रियासतों के लोकमन को संपूर्ण स्वतंत्र प्रदेश की तरह ही क्रांति समर की चेतना हुई थी। अपना राजा और अपनी रियासत बनी है तो फिर दूसरों के लिए संकट क्यों लिया जाए, यह अमंगल विचार किसी को छू नहीं सका। पराया? एक माता के एक पुत्र को दूसरा पुत्र बाहर। तो ग्वालियर के सिंधिया, अब आप हमें अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ने का ओदश दें। 103 1857 का स्वातंत्र्य समर - 218 103 1857 का स्वातंत्र्य समर
केवल आदेश नहीं, आप हमारे नेता बनें। रणांगण में स्वदेश और स्वधर्म के मंत्र की गर्जना करें और महादजी का अपूर्ण हेतु पूर्ण करने रण-मैदान की ओर ससैन्य चलें। सारा देश एक जयाजी के शब्द पर अवलंबित है। आप युद्ध करें तो आगरा धराशायी हो जाए, दिल्ली खुल जाए, दक्षिण घन-गर्जना करता उठे, शत्रु देश पार हो! देश स्वतंत्र हो जाए और आप उसके स्वतंत्रतादाता। द्विदश करोड़ लोगों का जीना एक जीभ के हिलने पर अवलंबित है। ऐसा अवसर विश्व में कभी आया नहीं था। पर सिंधिया की जीभ पहले तो बिल्कुल हिली ही नहीं और जब हिली तब 'युद्ध' कहने की जगह उसने 'मित्रता' कहा। सिंधिया की मित्रता देश के लिए नहीं, अंग्रेजों को बचाने के लिए है-यह देखते हुए कि सिंधिया युद्ध नहीं चाहते तो भी हम युद्ध करेंगे, देश माता को मुक्त करने तू नहीं चल रहा तो तेरे बिना, तेरे विरूद्ध हम दौड़ेंगे और उसे मुक्त करेंगे। आज 14 जून, रविवार है। आज तक हमने सिंधिया की राह देखी। आज रविवार को केवल सूर्यनारायण की राह देखेंगे। सूर्यास्त होते ही हर-हर महादेव! उस गाड़ी में बैठा कौन जा रहा है? कूपलैंड, मेम साहब! खबरदार किसी ने उसे सलाम किया तो ! गोरे को सलाम? आज जून की 14 तारीख को? इस गोरे को ही क्या आगे स्वयं ब्रिगेडियर साहब आ रहा है, परंतु कोई भी सिर या हाथ न हिलाए। ब्रिगेडियर? किसने बनाया इसे ब्रिगेडियर ? प्रासाद शिखरस्थोऽपि काको न गरुडायते अतः अपनी टोली उस ब्रिगेडियर की छाती पर से छाती तानकर चलाओ!104 और ग्वालियर कांटिजेंट के सिपाही ब्रिगेडियर को सलाम न करते आगे निकल गए। हृदय गुहा में जाग्रत् हुए आर्यत्व का सिंह अब आभिजात्य के ऐसे खेल खेलने लगा। फिर भी, शाम तक कोई गड़बड़ी न करे। शाम हुई और एक बंगले को आग लगी। लो, अब आ गया गड़बड़ी करने का सही समय! अरे तोपखाने, तू विद्रोह कर, पैदलों चलो-एक हाथ में जलती मशाल की लपटें और दूसरे हाथ में चमचमाती तलवार लेकर दौड़ो भूत जैसे चिल्लाते, दसों दिशाओं को। जो-जो रास्ते में दिखाई दे-उसका रंग देखो, काला हो तो प्रेम से मिलो, गोरा हो तो चलाओ तलवार गले पर! मारो फिरंगी को। क्या घर में छिप गया? लगाओ घर में आग। घर जलते ही आएगा बाहर चटपट। देखो कौन है? गोरा! काटो उसका सिर! ये कौन-गोरी! "मत मारो, मत मारो!" जा, दिया प्राणदान। हम मेमसाब को नहीं मारेंगे। उस भयानक भूत का नाच चल रहा है जोर-जोर से। ग्वालियर के सिंधिया के राजमहल में भी कोई गोरा बचा न रहे। सारे गोरों को सिंधिया के राज्य के बाहर आगरा भगा दिया। गोरी महिलाओं को इकट्ठी कर कैद कर लिया। पर उनसे कुछ भी बात न की जाए, यह ठीक नहीं है। धूप से तिलमिलाती यह औरत सामने है। उससे बात करना चालू करें। आओ। एक नौकर इसीलिए उससे पूछता है-"क्यों मेम साहब, तुम्हें यहां की धूप कितनी अच्छी लगती है? अब तो खूब जलन हो रही है न? तुम अपने ठंडे देश में रही होती तो इस देश की धूप में क्यों जलना पड़ता?" इस महिला को आंखें 1857 का स्वातंत्र्य समर – 219 104 श्रीमती कूपलैंड द्वारा लिखित-'नैरेटिव्स' ।
मटकाते हुए व्यंग्य भरा, devilish उपदेश देकर अब दूसरी महिला! देखें, उसे यह क्या कहती है? "क्या आपको आगरा भेजें? आगरा? आगरे में तो तुम्हारे सारे गोरे पुरुष मारे गए। और अब आगरा दिल्ली के बादशाह के अधीन है। जाएंगी उधर?'' और वे खिलखिलाते हंसने लगे। सिंधिया को एक बेजान गुड़िया जैसा बनाकर ग्वालियर की कांटिजेंट सेना ने विद्रोह किया। अंग्रेजों का रक्त तबीयत से बहाया। गोरी महिलाओं, गोरे झंडे और गोरी सत्ता को ग्वालियर रियासत के बाहर भगाकर, ग्वालियर रियासत पूर्ण स्वतंत्र करके वे सिंधिया को आदेश देने लगे कि अब हिंदुस्थान देश स्वतंत्र करने के लिए, कानपुर और दिल्ली की ओर सेना सहित तू हमरा सेनापति बनकर निकले।'' $^{105}$ सिंधिया ने उन्हें आज निकलता हूं, कल निकलूंगा-ऐसी गपों में उलझाकर और कुछ दिन चुप रखा। तात्या टोपे गुप्त रूप से ग्वालियर आया और उसके द्वारा इस भुलावे से सिंधिया की फौज को निकालने तक सिंधिया की सेना ऐसी ही निश्चय रही, इसीलिए अभी आगरा के अंग्रेजों की जान में जान है। क्योंकि आगरा के वायव्य प्रदेश का मुख्य लेफ्टिनेंट गर्वनर सर कोलविन हर पल मृत्यु के आगमन की राह देखते कांपता खड़ा हुआ था। मेरठ के विद्रोह से प्रभावित सिपाहियों को उसने राजनिष्ठा पर एक व्याख्यान दिया था और माफीनामे की घोषणा भी की थी। माफीनामा! उससे माफी मांगने आगे आनेवाला एक भी गरीब सिपाही उसे नहीं मिला। इतना ही नहीं, उसके माफीनामें के उत्तर में उन्होंने 5 जुलाई को आगरा पर हमला किया। नसीराबाद और नीमच की विद्रोही रेजिमेंट आगरा पर आक्रमण करने गई है तो करौली और भरतपुर रियासतों की सेनाएं उनपर भेज दो। उन रियासतों द्वारा भेजी गई सेना ने अंग्रेजों से कहा, "हमारी रियासत का आदेश है, इसलिए आपके विरुद्ध नहीं किया; लेकिन हम अपने स्वदेश बंधुओं पर हथियार बिलकुल नहीं उठाएंगे।'' कोटा की कांटिजेंट सेना ने तो विद्रोह किया ही। यह धोखा हुआ। नेटिव रियासत राजनिष्ठ पर उनका लोकमत और सेना-सब स्वदेश बंधुओं पर हथियार उठाने को तैयार नहीं। तब शेष बची गोरी सेना के साथ ब्रिगेडियर पॉलवल आगरे पर चढ़े आ रहे विद्रोहियों से लड़ने चल पड़ा। सिसीआ में दोनों पक्ष दिन भर एक-दूसरे से भिड़े रहे। अंत में विद्रोहियों की मार के आगे टिके रहना अंग्रेजों को कठिन हो गया और अंग्रेजी सेना पीछे लौट पड़ी। यह देखते ही विजयानंद से उत्साहित विद्रोही उन्हें पीठ पर मारते-कूदते आगे बढ़े। आगरा में वह
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$^{105}$ "उसके (शिंदे) के लिए अपने खोए हुए राज्य को पुनः प्राप्त कर लेने का यही सुअवसर था। वह यदि विद्रोहियों का प्रस्ताव मान लेना तो अंग्रेजों से प्रतिकार ले सकता था। यदि वह विद्रोहियों का नेतृत्व स्वीकार कर अपने सिद्धहस्त सैनिकों के साथ चल पड़ता तो हमारे (अंग्रेजों के) लिए इसका परिणाम नितांत ही भयावह होता। इसके कम-से-कम बीस हजार सैनिक थे, जिनमें से आधे के लगभग ने अंग्रेजों से पूर्ण सैनिक शिक्षा प्राप्त की थी। वे हमारे (अंग्रेजों के) कच्चे मोर्चों पर टूट पड़ते । आगरा और लखनऊ से हम सर्वदा के लिए हाथ धो बैठते। प्रयाग के दुर्ग में ही हैवलॉक बंद हो जाता और या तो वह किला घेरा जाता अथवा उसे अलग छोड़ते हुए विद्रोही काशी होकर कलकत्ता पहुंच जाते।'' -रेड पैंफलेट, पृष्ठ 194
पराभूत अंग्रेजी सेना घुसते ही और उनके पीछे विद्रोहियों की विजय ध्वनि सुनकर आगरा को, जो अवसर वह चाहता था, मिल गया। यह 6 जुलाई का दिन था। आगरा विद्रोह कर उठा और उसकी अगुवाई का जिम्मा पुलिस ने लिया। ये सारे पुलिसवाले पहले ही गुप्त रूप से तैयार थे। उनका, नागरिकों का, धर्मनिष्ठ हिंदुओं और मुसलमानों का एक विशाल जुलूस निकला। शहर कोतवाल और पुलिस अधिकारी उस जुलूस के आगे-आगे चले, उन्होंने स्वधर्म और स्वराज्य की जय-जयकार करते हुए घोषणा की कि फिरंगी राज्य समाप्त हो गया है और दिल्ली का बादशाह हमारा राजा हो गया है। इस तरह आगरा स्वतंत्र होते ही अंग्रेजों के साथ पराजय और अपमान के क्षुब्ध, चिंताग्रस्त सर कोलविन किले में जाकर बैठ गया। उसे अब एक ही डर था कि शिंदे क्या करता है? शिंदे विद्रोहियों से मिल गया, केवल इतने समाचार भर से वह प्रचंड किला विद्रोहियों के हाथ लग जाता। परंतु सिंधिया विरुद्ध नहीं है-यह उसके द्वारा भेजे जानेवाले पत्रों और रसद से स्पष्ट होते ही आगरे के अंग्रेजी झंडे में जान आ गई। परंतु उस झंडे के भार से कोलविन 9 सितंबर, 1857 को मर गया और अंग्रेजी राज्यसत्ता को दुःखी छोड़ गया। ग्वालियर से हुई लोकपद की इस क्रांति-चेतना का इंदौर में भी ऐसा ही भयानक विस्फोट हुआ। इंदौर के पास स्थित महू छावनी की सारी सेना और इंदौर की राज्यसत्ता का गुप्त व्यवहार निरंतर चालू था और विद्रोह का विचार भी इसी से बना। 1 जुलाई को इंदौर दरबार के एक मुसलमान सरदार सादत खान ने रेजिडेंसी के फिरंगियों पर टूट पड़ने का सेना को आदेश दिया। महाराज की मुझे यही आज्ञा है, ऐसा भी उसने कहा। पर इस कथन की जिसे कोई आवश्यकता नहीं थी, उस इंदौरी सेना ने विद्रोह का झंडा तत्काल खड़ा किया और रेजिडेंसी पर तोपों के साथ हमला कर दिया। रेजिडेंसी की नेटिव सेना ने अंग्रेजों की ओर से स्वदेश बंधुओं पर गोली चलाने से मना कर दिया। अंग्रेज बलहीन हो गए। उन्होंने चुपचाप अपनी गठरी बांधी और इंदौर से जान बचाकर भाग खड़े हुए। उनकी प्राणरक्षा की जिम्मेदारी उनकी नेटिव सेना ने ली हुई थी और इस तरह अंत तक उन्होंने उनकी सुरक्षा की। महाराज होलकर अंग्रेजों के अनुकूल थे या प्रतिकूल, यह सिद्ध करने का प्रयास अंग्रेज ग्रंथकार बहुत करते हैं, परंतु सन् 1857 की स्थिति और 1857 का इतिहास थोड़ी गहराई से देखनेवाले को यह तुरंत समझ में आ जाएगा कि अधिकतर नेटिव रियासतों ने उस क्रांति में ऐसा संशय का व्यवहार जान-बूझकर किया था। मनुष्य के हृदय में प्राकृतिक रूप से बैठी स्वतंत्रता की इच्छा उनमें मनुष्यता के साथ ही थी। अतः उन्होंने क्रांति की विजय होने पर भी अपना हित सुरक्षित रहे, इसलिए पूरी तरह अंग्रेजों का साथ नहीं दिया और परिणाम उलटा हो जाए तो भी हित बना रहे, इसलिए पूरी तरह क्रांति का भी साथ न देने का दांव चलाया था। लोग और सेना अपनी 1857 का स्वातंत्र्य समर - 221
रेजिडेंसी से अंग्रेजों को भगा देना चाहते हैं तो उन्हें वैसा करने दिया जाए, जिससे राज्य स्वतंत्र हो जाए; परंतु इधर अंग्रेजों से मित्रता की बातचीत चालू रहे, जिससे उनकी जीत हो तो भी जो था वह तो न जाए। कच्छ, ग्वालियर, इंदौर, बुंदेला, राजपुताना आदि अधिकतर रियासतों का यह व्यवहार दिखाई देता है। इस स्वार्थी व्यवहार से ही क्रांति का नाश हुआ। उन्होंने 'स्वतंत्रता या मृत्यु'-ऐसी करारी गर्जना की होती तो स्वतंत्रता मिलती ही। स्वतंत्रता और स्वार्थ ऐसी आधी कच्ची, उदात्तनुदात्त, ऊपर-नीचे लुका-छुपी करने से सारा शुभत्व विफल हुआ और अशुभ का दर्शन हुआ। स्वदेश से उन्होंने पटियाला आदि रियासतों जैसा द्रोह नहीं किया-परंतु यह अप्रत्यक्ष द्रोह किया कि केवल स्वतंत्रता के शुभ अस्तित्व की आशा में स्वार्थ का अशुभ भाव मन में रखा। इसीलिए वह सिपाहियों का विद्रोह विफल और देश पराजित हुआ। राज आचरण की इस शुभ-अशुभता ने या अशुभ-शुभता ने लोक आचरण को स्पर्श नहीं किया और इस लोकवर्तन के तेजस्वी आघात से ही पेशावर से कलकत्ता तक रक्त की बरसात हुई। प्रचंड आग जली, ज्वालामुखी की भयंकर ध्वनि के कारण अंग्रेजी सत्ता-मंदिर गिरकर ध्वस्त हो गया।106 परंतु यह ऐसा प्रलयी धक्का होगा, इसकी कलकत्ता और इंग्लैंड को कैसी अपूर्ण कल्पना थी। मेरठ के समाचार से पहले सरकार के विचार से हिंदुस्थान में पूर्ण शांति का राज था। यह छोड़ें, मेरठ में विस्फोट के बाद दिल्ली में नए साम्राज्य की घोषणा हुई, इस विस्फोट का अर्थ कलकत्ता की समझ में नहीं आया था। मेरठ के 10 मई के विस्फोट से 31 मई के सार्वजनिक विस्फोट तक विद्रोह की जलहर कहीं चली ही नहीं, यह देखकर हिंदुस्थान में कहीं भी गड़बड़ी नहीं है, यही कल्पना कलकत्ता से सिर में मजबूती से बनी रही। 25 मई को गृह सचिव ने खुले रूप में घोषित किया- "कलकत्ता से 600 मील की दूरी तक हर स्थान पर पूरी शांति है। बीच में लगा क्षण भर का विरल संकट अब नष्ट हो गया है और 'थोड़े ही दिनों' में सब ओर शांति और निर्भयता होगी, ऐसी आशा है।" ये थोड़े दिन भी बीत गए, 31 मई आ गई। इधर-उधर शांति और निर्भयता 1857 का स्वातंत्र्य समर — 222 106 जहां भी भारतीय नरेशों ने क्रांति में योगदान देने में संकोच किया, उनकी प्रजा पर से उनका नियंत्रण हट गया। प्रजा अपने राजा का जुआ भी उतारकर फेंक देने को संकल्पबद्ध हो गई। प्रजा की इस विचित्र मानसिक दशा को देखकर ही मैलसन ने कहा था, "ग्वालियर और इंदौर के समान ही यहां भी यह परिलक्षित हुआ कि जब पूरब के लोगों की धर्मभावना पूर्णतः उभार दी जाती है तो उनका स्वामी उनका राजा भी, जिसे वे पिता तुल्य ही नहीं प्रभु का अंश भी मानते हैं, वह भी उन्हें उनकी श्रद्धा के विरुद्ध झुका पाने में सफल नहीं हो पाता। जयपुर तथा जोधपुर नरेश की सेनाओं ने अपने देश-बांधवों के विरुद्ध संघर्ष करने से स्पष्ट शब्दों में इंकार कर दिया था। वे अपने राजाओं के आदेश पर भी ऐसा करने का तैयार नहीं हुए।" मैलसन कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 3, पृष्ठ 172
दिखने लगी। लखनऊ की रेजिडेंसी के चारों ओर कानपुर के मैदान में, झांसी के झोकन बाग में, इलाहाबाद के बाजार में, बनारस के घाट पर, सब ओर शांति और निर्भयता। तारयंत्र के राई-राई से टुकड़े, रेलगाड़ियां, लोहे की पटरियां और रेल के पुल टूटे-फूटे धूल में मिले हुए, हर नदी में यूरोपियनों के शव बहते हुए, रास्ते-रास्ते में रक्त के ताल तलैया-सब ओर शांति और निर्भयता। तब कलकत्ता का मोहभंग हुआ। 12 जून, को सारे यूरोपियना नागरिकों ने स्वंयसेवकों की टोलियां बनाना चालू किया। यूरोपियन दुकानदार, बाबू, लेखक, असैनिक अधिकारी आदि सारे गोरों को लश्कर में भरती कर उनको कवायद सिखाना शुरू किया गया। तीन हफ्ते के अंदर नूतन शिक्षित स्वयंसेवकों की एक ब्रिगेड तैयार हो गई। घुड़सवार, पैदल और तोपखाना आदि की सहायता और शक्ति से कलकत्ता शहर की सुरक्षा करने की पूरी शक्ति आ जाने से उन्हें वह काम दिया गया और वहां के लश्करी यूरोपियन सोल्जरों को बाहर विद्रोह के स्थानों पर भेजने की सुविधा सरकार को मिली। तारीख 13 जून को लॉर्ड केनिंग ने स्वयं विधान परिषद् जाकर नेटिव पत्रकारों के विरुद्ध एक बहुत कठोर और भयानक विधेयक पारित करा लिया' क्योंकि विद्रोह शुरू होते ही बंगाल के नेटिव पत्र खुलेआम विद्रोहियों की सहानुभूति में उत्साहवर्धक लेख लिखने लग गए थे। तारीख 14 जून, रविवार के दिन कलकत्ता में शांति और निर्भयता का वास्तविक महोत्सव मनाया गया। उस दिन का वर्णन अंग्रेजी लेखक ही करें। "जहां-तहां भय, दहशत, आपाधापी और भागम-भाग। बहुत विचित्र समाचार! सबको यह विश्वास हो गया कि बैरकपुर के सिपाही कलकत्ता पर आक्रमण करने आ रहे हैं। रास्ते के सारे गांववाले विद्रोहियों से मिल रहे हैं, अवध का नवाब और उसके अनुयायी गार्डन रीच के बगीचों में चाकू चलाते घूम रहे हैं, अवध का नवाब और उसके अनुयायी गार्डन रीच के बगीचों में चाकू चलाते घूम रहे हैं। जो मुख्य अधिकारी थे वे ही सबसे अधिक घबराए हुए थे, सरकार के सेक्रेटरी कौंसिल के सदस्यों की ओर भाग रहे हैं।, पिस्तौल भर रहे हैं, हर दरवाजे के पीछे कबाड़ खड़ा कर रहे हैं। कौंसिल के सदस्य परिवार के साथ घरबार छोड़कर भाग रहे हैं। जहाजों पर चढ़कर जान बचा रहे हैं। उनसे निचले दर्जे के अधिकारी भी वरिष्ठ जनों की राह पकड़कर अपनी-अपनी मूल्यवान चीजें इकट्ठा कर किले में घुसकर तोपों के आश्रय में शरण पाने की भिक्षा मांगने लगे। गोरे लोग घोड़ों, गाड़ियों, पालकियां, हर तरह और प्रकार के वाहनों में भर-भरकर जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे। शहर के बाहर का हर ईसाई घर खुला पड़ा था। आध दर्जन निश्चयी धर्मांध रहे होते तो शहर का तीन-चौथाई भाग जलाकर रख कर देते।''107 अंग्रेज सरकार की राजधानी में केवल एक बाजारू गप से इतनी 'शांति और 1857 का स्वातंत्र्य समर - 223 107 रेड पैंफलेट, पृष्ठ 105।
निर्भरता' व्याप्त हो गई। उस शांति-निर्भयता के उत्पादक बैरकपुर के सिपाहियों और कलकत्ता में रह रहे अवध के नवाब के वजीर अली नक्की खान का उच्चाटन करने के लिए सरकार ने कमर कसी। 14 जून की रात को बैरकपुर के सिपाही विद्रोह करेंगे, यह समाचार उन्हीं में से एक के द्वारा मिलने पर 14 जून को विद्रोह होने के पूर्व ही उनको तोपखाने के सामने लाकर निःशस्त्र किया गया और 15 जून को अवध के नवाब और उसके वजीर को तत्काल जाकर 'राज्य की सुरक्षा' के लिए पकड़ा गया । उनके जनानखाने से लेकर सारी जगहों की छानबीन की गई; पर उसमें कुछ भी सबूत नहीं मिला। फिर भी नवाब और उसके वजीर को कलकत्ता के किले में कैद कर दिया गया। इस तरह कलकत्ता शहर में जमा हो रहा बारूद का भंडार चिंगारी पड़ने से पहले ही खाली कर दिया गया। बंगाल प्रदेश भर के सिपाहियों में क्रांति-रचना की गुप्त तैयारी करने वाला और कलकत्ता के एक निरुपद्रवी बाग में बैठकर अवध के राजसिंहासन को पुनः स्थापित करने के लिए इस विद्रोह का भयानक जाल बुननेवाले वजीर नक्की खान के किले में कैद होते ही बंगाल प्रांत की क्रांति का मानो सिर ही कट गया। किले में बंद होकर विद्रोहियों को गाली देनेवाले अंग्रेजों को वजीर ने एक बार साफ-साफ ही सुनाया- "हिंदुस्थान में रचा गया यह भयानक विद्रोह मेरी दृष्टि से न्यायिक है, अवध की स्वतंत्रता छीनने का यह जैसे-को-तैसा प्रतिशोध है। न्याय का राजमार्ग छोड़कर तुम धोखे और स्वार्थ के कंटीले रास्ते पर जान-बूझकर घुसे हो तो लहूलुहान होने लगो तो इसमें आश्चर्य क्या है? प्रतिशोध के बीज बोए-तब तुम हंस रहे थे, अब उसकी फसल पक गई है तो उसका दोष लोगों पर क्यों डालते हो?"108 यदि कलकत्ता को सन् 1857 के इस अति उग्र विद्रोह की ऐसी अधूरी, धुंधली और अस्पष्ट कल्पना थी तो कलकत्ता से आनेवाली डाक रिपोर्ट पर पूरी तरह अवलंबित इंग्लैंड देश की कल्पना पहले कितनी अज्ञानजनक सुरक्षा में सोई होगी और बाद में एकाएक ज्ञात होने पर कैसे भतबाधाग्रस्त बौराई-सी हो गई, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है। पार्लियामेंट में बैरकपुर, रामपुर, दमदम आदि से विद्रोह के समाचार आने के बाद हिंदुस्थान की ओर सबकी आंखें लग गई थी। परंतु मध्यांतर में कुछ भी महत्त्वपूर्ण समाचार ज्ञात न होने से फिर से सबको सुरक्षित लगने लगा। तारीख 11 जून को पार्लियामेंट में हाउस ऑफ कॉमंस में कुछ सदस्यों के पूछे प्रश्नों पर प्रेसीडेंट बोर्ड ऑफ कॉमर्स के प्रमुख अधिकारी ने कहा- "बंगाल में हाल में घटित असंतोष से लोगों को घबराने का अब कोई कारण नहीं रह गया है। क्योंकि अपने आदरणीय और अभिजात मित्र लॉर्ड द्वारा दर्शाई गई तत्परता, कड़ाई और तुरत-फुरत कार्यवाही से सेना में 1857 का स्वातंत्र्य समर – 224 108 रेड पैंफलेट, पृष्ठ 106।
देखे गए असंतोष के बीज पूरी तरह नष्ट हो गए हैं। (Have been completely put an end to) । ये वाक्य पार्लियामेंट ने 11 जून को सुने। 11 जून! इसी समय हिंदुस्तान में घुड़सवारों की 11 रेजिमेंट, तोपखने की 5 फील्ड बैटरियां, पैदल सेना के कम-से-कम पचास रेजिमेंट और करीब सारे सैपर्स और माइनर्स ने खुला विद्रोह किया हुआ था। पूरा अवध विद्रोहियों के हाथ में था। कानपुर और लखनऊ दोनों शहर घिरे हुए थे। सरकार के खजाने से एक करोड़ रुपए से अधिक की राशि विद्रोहियों के हाथ लग गई थी। जिस क्षण पार्लियामेंट में लॉर्ड केनिंग द्वारा दर्शाई तत्परता, कड़ाई और तुरंत-फुरत कार्यवाही से सेना में देखे गए असंतोष के बीज “Have been completely put an end to” आगे फिर जल्दी ही उन विषैले बीजों की अकल्पित बाढ़ ने इंग्लैंड की मध्य रात्रि में भी नींद हराम कर दी। फिर भी, कानपुर का अधूरा समाचार आते ही अत्यंत दुःखी, भयग्रस्त एवं संक्षुब्ध अंग्रेजी जनता ने पार्लियामेंट में जब प्रश्न पूछे कि क्या कानपुर का समाचार सच है? तब अर्ल ग्रैनविल नामक सरदार ने उत्तर दिया कि सेना प्रमुख सर पैट्रिक ग्रांट ने मुझे पत्र भेजा है कि कानपुर की मार-काट का वह समाचार पूरी तरह असत्य है, केवल Vile fabrication है। एक सिपाही ने वह गप पहले बाजार में उड़ाई और उसकी उस नीचता का विस्फोट हो गया है। इस भयंकर अफवाह के लिए उसे फांसी पर भी चढ़ा दिया गया। 109 पार्लियामेंट सभा के हाउस ऑफ लॉर्ड्स में भी कानपुर के कत्लेआम की बात नर-रक्त की मसि से नर-मांस के पत्र पर घिनौने अक्षरों से खोदने में पूरा एक माह उलट गया। आउस ऑफ लॉर्ड्स की सभा में इस अफवाह को उसके उस काल्पनिक उत्पादक सिपाही के साथ ही फांसी पर चढ़ाकर अंग्रेजी कूटनीतिज्ञ थोड़े आराम से सांस ले पाए थे कि इंग्लैंड के किनारे पर वह वास्तविक आकर लग गई और सारा इंग्लैंड देश, गुस्से, अभिमान-भंग से बेहोश, पागल होकर पैर पटक-पटककर नाचने लगा। उसका वह पैर पटकना अभी तक चालू है। विद्रोह में विद्रोहियों के लिए कत्लेआम ने मनुष्य जाति के निर्मल यथ पर पक्की आसुरी कालिमा चढ़ा दी, यह उनका गुस्से में कहना- उनके लिखे इतिहास की पंक्ति-पंक्ति से वे चीखें आज तक जोर-जोर से सुनाई दे रही हैं। और उन चीखों के अखंड हल्ले-गुल्ले से विश्व के कान के परदे हमेशा के लिए फट गए। सन् 1857 का नाम लेते ही उनके शरीर पर भय से कांटे और मुंह पर लज्जा की छाया आ जाती है। विद्रोहियों के नाम का उल्लेख उनके शत्रुओं को ही नहीं, पगले अनजानों को ही नहीं-जिसके लिए उन विद्रोहियों ने रक्त बहाया, उन अपनों को भी त्याज्य लगता है, निद्य लगता है, पापकारक लगता है। उनके शत्रु उन्हें राक्षस, पिशाच, रक्तप्रिय, नरक के कीड़े कहते हैं। उनके अनजाने उन्हें अमानुष, जंगली, अघोरी कहते हैं और जिन्हें देशभंधु अपना कहने से भी
1857 का स्वातंत्र्य समर – 225
109 चार्ल्स बॉल, खंड 1 ।
कतराते हैं! ऐसा भयानक हल्ला जहां-तहां आज तक चल रहा है। और आगे सत्य का स्वर सुनने की श्रवण क्षमता ही न रहे, इसके लिए विश्व की श्रवण क्षमता के कान इस अखंड हल्ले-गुल्ले से फोड़ दिए गए हैं। विद्रोही राक्षस है ।, बाल हत्यारे हैं, रक्तप्रिय है, नरक कृमि हैं, अमानुष हैं-खबरदार, विश्व यदि दूसरा कुछ सुने तो! क्योंकि? क्योंकि विद्रोहियों ने स्वदेश के लिए और स्वधर्म के लिए हम अंग्रेजों के विरुद्ध शस्त्र उठाया और 'प्रतिशोध-प्रतिशोध' की गर्जना करते हुए हमारा कत्लेआम किया। कत्लेआम भयंकर पाप है। मनुष्य जाति के अंतिम सौंदर्य ईश्वर के अवतार द्वारा देवदूतों द्वारा और धर्मगुरुओं द्वारा प्रवर्तित अति उच्चा भविष्य जब वर्तमान होकर जिस समय न्यायसव्यवस्था में जा पहुंचेगा, जब सत्य के पहले 'अ' निषेध-प्रत्यय कभी नहीं लगाया जाएगा और जब एक गाल पर मारने पर दूसरा गाल आगे कर, ऐसे यीशु के शांतिबोध को, पहले गाल पर मारनेवाला कोई न बचने के कारण, असंभवता आ जाएगी उस आदर्श दैवी युग में यदि किसी ने विद्रोह किया, यदि किसी ने रक्त बिंदु गिराया और यदि किसी ने 'प्रतिशोध' शब्द का उच्चारण किया तो तत्काल उस कृति के कारण और उस उच्चारण से वह पापी अधमत्व को प्राप्त होगा; क्योंकि जहां-तहां सत्य का राज्य हर हृदय में समाया होने पर 'विद्रोह' पाप ही होगा। इधर-उधर अहिंसा की समता हर हृदय में दृष्टिगोचर हो रही हो तो रक्त बिंदु गिराना पाप ही होगा और इधर-उधर न्याय के चंद्र प्रकाश में हृदय में शीतलता व्याप्त होने पर 'प्रतिशोध' शब्द का उच्चारण पा ही होगा। ऐसे अबाधित न्यायकाल में ऐसा अन्यायमूलक उच्चारण सुनते ही किसी तरह की जांच किए बिना उस उच्चारण से ही उस कार्य को अधमत्व का दंड देना पूरी तरह अदुषणीय है। परंतु वह दैवी युग जब तक आया नहीं है, जब तक उस परम मंगल साध्य का अस्तित्व केवल किसी सत्कवि की प्रतिभा और ईश्वर-प्रेषितों के भविष्य में ही विद्यमान है और जब तक वह न्याय भाजन की अवस्था प्राप्ति संभव करने के लिए उसकी विरोधी अन्यायमूलक प्रवृत्ति का निर्मलन करने में मानवी मन लगा हुआ है तब तक विप्लव, विद्रोह, रक्तपात और प्रतिशोध आदि शब्द कवेल अधमता के अधिकारी नहीं होंगे। 'राज्य' शब्द जब तक न्यायमूलक दोनों सत्ताओं के लिए मान्य है तब तक तद्विरोधक विप्लव, विद्रोह शब्द भी जैसे अन्यायमूल वैसे ही न्यायमूलक भी हो सकेगा और तब तक विप्लव, रक्तपात और प्रतिशोध आदि के कथानकों और कथानायकों के-दंड के पूर्व तत्काल विवरणात्मक जांच होनी ही चाहिए। विप्लव, रक्तपात और प्रतिशोध के कृत्य जैसे स्वयमेव अन्याय स्वरूप हैं वैसे ही वह कभी-कभी न्याय के संवर्धन के लिए प्रकृति द्वारा उत्पन्न न्यायिक शस्त्र भी हैं। और जब इन भयंकर साधनों से न्यायमूर्ति-'शत्रुरुधिरदिग्धपाणिमुख 1857 का स्वातंत्र्य समर - 226
विकट प्रकट भैरवी'-ऐसी हो जाती है तब-तब उस भयंकरता का दोष उस न्यायमूर्ति का न होकर जिस मदमत्त के कारण वह क्रूर अवसर आया है उस प्रबल अन्याय पर ही वह आरोपित होता है, इसलिए फांसी का दंड देने वाला न्यायाधीश रक्तपात का उत्तरदायी न होकर फांसी पर जानेवाला अन्याय ही उस पाप का उत्तरदायी होता है। इसलिए ब्रट्स का खंजर पवित्र है। इसीलिए शिवाजी के बघनखे पुण्यपावन हैं। इसलिए इटली की राज्य क्रांति का रक्तपात यशोधवल है। इसीलिए चार्ल्स प्रथम का खून वध है। इसीलिए विलियम टेल का तीर प्रेम है। और उन सब कृत्यों की भयंकरता का अघोर पाप-उसके अधिकारी अन्याय के सिर पर वज्राघात जैसा पड़नेवाला है। और यदि विद्रोह, रक्तपात और प्रतिशोध का डर नहीं होता तो आज अत्याचार और अन्याय के अप्रतिहत भयंकर तांडव से यह वसुंधरा थर्राती रहती। जल्दी या देर से, परंतु ऐसे क्षणिक विजयी अन्याय का प्रतिशोध न्यायी प्रकृति लेगी ही, इस चिंता से यदि अत्याचारी की नींद सुरक्षित होती तो अकुतो भयता से आज सब ओर चोरी-चोरी का खुला राज होता। पर हर हिरण्यकशिपु को नृसिंह का प्रतिशोध, रह दुःशासन को भीमसेन का प्रतिशोध और हर मदमलिन गंडस्थान को हरिनखों का प्रतिशोध, अपनी रक्त भरी और विकरालता से लपलपाती जीभ से डराता रहता है। इसीलिए अन्याय प्रवृत्ति का उच्चाटन होने की थोड़ी-बहुत आशा हृदय में उत्पन्न होती है। इस तरह का प्रतिशोध अन्याय का निसर्गोदभूत शासन होता है और इसलिए उसकी क्रूरता का, अमानवीयता का पाप अन्याय प्रवर्तकों पर ही उलटकर लगता है। और ऐसे प्रतिशोध की भयानक ज्वाला सन् 1857 में हिंदुस्तान के हृदय में भड़क उठी थी। उनके सिंहासन फूटे हुए, उनके मुकुट टूटे हुए, उनका देश छीना हुआ, उनका धर्म कुचला हुआ, मानभंग, जीवन में विफलता का पहाड़, निवेदन व्यर्थ, अर्जिया व्यर्थ, रोना बेकार, चिल्लाना व्यर्थ। तब प्रकृति की प्रतिक्रिया शुरू हुई और जहां-तहां 'प्रतिशोध, बदला', ऐसी कानाफूसी होने लगी। ऊपर वर्णित एक-एक घटना प्रतिशोध को जन्म देती है, पर यहां तो ऐसी अनंत घटनाएं घटित हुईं। इतने पर भी विद्रोह न होता तो हिंदुस्तान मरा हुआ है, ऐसा की कहा जाता। इसलिए यह प्रतिशोध अन्याय की अपरिहार्य प्रतिक्रिया है तो फिर एक बार सारा देश उबल उठे और किसी एक स्थान पर जनसमूह कत्लेआम कर दें-यह आश्चर्य नहीं। आश्चर्य तो यह है कि हर स्थान पर ऐसा कत्लेआम क्यों नहीं हुआ? क्योंकि जहां कत्लेआम हुआ और जिन्होंने वह किया उनका संतप्त तर्कशास्त्र सहज ही उद्घोष कर उठा-शठे शाठ्यं समाचरेत्! काली नदी की लड़ाई में पकड़े गए सिपाहियों को फांसी पर चढ़ाने के पहले अंग्रेजों ने पूछा, "तुमने हमारी स्त्रियों और बच्चों को क्यों मारा?" तब उन्होंने तत्काल प्रत्युत्तर दिया, "साहब,
सांपों को मारकर कोई उनके बच्चों को जिंदा रखता है क्या?" कानपुर में सिपाही कहते-आग बुझाना और चिंगारियां रखना तथा सांप मारना और उसके बच्चे पालना, यह समझदारी नहीं। साहब, सांप को मारकर कोई उसके बच्चे जीवित रखता है क्या? काली नद के सिपाहियों द्वारा पूछे गए इस अखंड प्रश्न का उत्तर साहब लोग कैसे दे सकते हैं? और ये गंवारू शंका केवल हिंदुस्थान की जनता या कुछ अंग्रेजी लेखकों की कल्पना की तरह केवल एशियाटिक लोगों के ही मन मकें उत्पन्न नहीं हुई। जहां-जहां अन्याय की परमावधि होती है और राष्ट्र-के-राष्ट्र सुलग उठते हैं, जहां-जहां राष्ट्रीय युद्ध लड़े जाते हैं वहां-वहां राष्ट्रीय अन्याय का प्रतिशोध राष्ट्रीय वध से ही लिया जाता है। जब स्पेनवासियों ने मूर लोगों से अपनी स्वतंत्रता वापस छीन ली तब मूर लोगों की क्या दशा हुई? स्पेनिश लोग तो एशियाटिक नहीं थे या हिंदी भी नहीं थे। फिर उनके देश में कोई पांच-पांच सौ वर्ष से रह रहे उन मूर मुसलिमों के स्त्री-पुरूष-बच्चों सहित अनाथ परिवारों पर उन्होंने केवल एक विशिष्ट धर्म-जाति के अपराध के लिए भयंकर कत्लेआम क्यों किया? ग्रीस देश ने 1821 में कोई इक्कीस हजार तुर्की किसानों के पुरूष-महिला-बच्चों सहित अति अघोर कत्ल क्यों किए? यूरोप में जिस गुप्त संस्था को पवित्र माना जाता है उसी हिटेरिया ने उस कत्लेआम के समर्थन में कहा कि ग्रीस देश में तुर्कों की संख्या कम है और वे हमसे कभी भी वैर न छोड़नेवाले हैं, अतः उन सबको मार डालना ही अंतिम उपाय है-“ ”A necessary measure of wise policy"(सयानी नीति का आवश्यक उपाय)। यही उन्होंने कहा है या नहीं। सांप को मारनेवाला कोई उसके बच्चे जीवित नहीं रखता। यही सीधी-साध उत्तर उनके मन की प्राकृतिक दयाशीलता को जलाकर भस्म करता है। और उस भयंकर ज्वलन का संपूर्ण दोष उस विषैले सांप के कालकूट विष की ओर ही होना चाहिए। अन्यथा विष देश के विरुद्ध ऐसा भयानक प्रतिशोध मानव स्वभाव में नहीं बैठता और निर्दय शासन को विषैले सांप का डर न हो तो उसकी वह कालकूट जीभ आज इतने बिलों में भी जीवित न रहती। सारांश यह कि अन्याय के अतिरेक के कारण मानवी मन में प्रतिशोध की प्रतिक्रिया जब-जब अपरिहार्य और रक्तपात आदि अमानुषिक कार्य पक्की तरह शुरू होते ही हैं, यह इतिहास का साक्ष्य सुन लें तो सन् 1857 में हिंदुस्थान के चार-पांच स्थानों पर जो ऐसे क्रूर कर्म घटित हुए इसपर आश्चर्य होने की जगह, जिसपर वास्तव में आश्चर्य होना चाहिए वह बात यह है कि यह क्रूरतापूर्ण मारकाट इतने अल्प प्रमाण में केवल चार-पांच स्थानों पर ही घटित हुई, उसकी जगह सारे स्थानों पर इससे अधिक प्रबल रीति से इस प्रतिशोध की अघोरता ने हुड़दंग क्यों नहीं मचाया? उपर्युक्त ग्रीस एवं स्पेन देश के न्यायिक गुस्से के उदाहरण 1857 का स्वातंत्र्य समर - 227
रहने दें, पर हिंदुस्थान तब अत्याचार की ज्वाला से जला हुआ था और सरेआम मार-काट को जिस एक परिस्थिति में न्याय दंड का स्वरूप मिल जाता है उस दुर्जन पीड़ाग्रस्तता की हिंदुस्थान पर असह्य मार पड़ी थी। परंतु क्रॉमवेल जब आयरलैंड में सेना लेकर घुसा और जब वहां के लोगों के यथार्थ देशाभिमान से वह अधिक ही क्रुद हो गया और वहां के लड़ाकुओं पर ही नहीं, अशरण गरीबों पर उसकी तलवपर सरसराती पड़ी, जब उस अभागे देश में रक्त की नदी तेजी से बहने लगी और जब उस रक्त में क्रॉमवेल की तलवार से कटी अनेक निरीह महिलाएं अपने गोद के बच्चों सहित तैरने लगीं, तब आयरलैंड जीतने का मूल हेतु पापकारी होते हुए भी उस क्रॉमवेल ने, अपने स्वधर्मियों का जितना क्रूरतम प्रतिशोध लिया और क्रूरतम रक्तपात किया उतना भी हिंदुस्थान ने सन् 1857 में उन परधर्मी, परवर्णीयों का रक्तपात नहीं किया। अंग्रेज महिलाओं को बचाने के लिए नाना साहब, दिल्ली के बादशाह, अवध की बेगम ने अंत तक प्रयास किया। परंतु कानपुर में नाना द्वारा दिए गए जीवनदान का ऋण अंग्रेज महिलाओं ने किस तरह चुकाया? विश्वासघात करके। जब-जब अंग्रेज अधिकारियों को सिपाहियों ने विद्रोह होते ही जीवनदान दिया तब-तब उन अधिकारियों ने उस उपकार के बदले विश्वासघात ही किया। उन्होंने नए आए अंग्रेज अधिकारियों को प्रदेश की विस्तृत जानकारी दी, उनका सेनापति पद स्वीकार किया और जो हाथ सिपाहियों ने जीवित छोड़ दिया उसी हाथ में तलवार पकड़कर उस प्राणदाता की ही गर्दन काटी। फिर भी अतर्क्य आश्चर्य यह कि ऐसे विश्वासघात में भी स्वभाव से शांत भारतीय लोगों ने अपनी शांति उस प्रलयकाल में भी डिगने नहीं दी। कितने अंग्रेज भगोड़ों के प्राण खेत मजदूरों ने बचाए? कितनी ही महिलाओं को अपने कपड़े देकर ग्रामीण महिलाओं ने उनके प्राण बचाए? कितने ही गोरे अधिकारी भागने की शक्ति समाप्त होने से सड़कों पर बेहोश पड़े मिले और पास से गुजरते ब्राह्मण ने दूध पिलाकर उन्हें होश में लाने का उपक्रम किया। फॉरेस्ट ने माना है कि अवध ने-जिस अवध के कलेजे में अंग्रेजों ने अपने अत्याचार की छुरी घृणास्पद रीति से घोंपी थी, उस अवध के कलेजे में अंग्रेजों ने अपने अत्याचार भूलकर उनके पलायन में अतुल्य उदारता दर्शाई । विद्रोहियों के घोषणापत्र में उनके नेताओं ने अपने संतप्त अनुयायियों को कहा था कि स्थान-स्थान पर-स्त्री एवं बाल हत्या से अपने पवित्र काम में हानि होगी। नीमच, नसीराबाद के विद्रोहियों के द्वारा प्राणदान दिए जाने के बाद भाग रहे गोरों को देखकर रास्ते के ग्रामीण जब चिल्लाने लगे-मारो फिरंगी को-तब वहां के एक परिवार ने आगे बढ़कर कहा कि उन्होंने अभी-अभी हमारे साथ भोजन किया है, यद्यपि वे कट्टर शत्रु हैं, तब भी उनको कैसे मारा जा सकता है।¹¹⁰ जिसके सामान्य ग्रामीणों में भी ऐसी उदात्त वीरता व्याप्त है वह शांत हिंदुस्थान सन् 1857 का स्वातंत्र्य समर – 229 ¹¹⁰ चार्ल्स बाल कृत-'इंडियन म्यूटिनी', भाग 1 ।
1857 जैसी कितनी ही क्रूर मार-काट करे, उससे उसकी धवल नीति को तिल मात्र भी लघुता नहीं आती, उलटे कत्ल हुए अन्याय के दुष्ट अत्याचारों के घिनौनेपन में पर्वत तुल्य वृद्धि हो जाती है तथा ऐसे ही अवसरों पर मैकाले का वह प्रसिद्ध वाक्य यथार्थ हो जाता है-"The more violent the outrage, the assured we feel that a revolution was necessary". (अत्याचार जितना भयानक उतनी ही उसकी प्रतिक्रिया भी अटल) और सत्य का यह यथार्थ स्वर सुनने की क्षमता विश्व के कानों में न बचे, इसके लिए हिंदुस्थान के लोगों की क्रूरता का हल्ला-गुल्ला अगर कोई दस दिशाओं में करे तो उन अंग्रेज लोगों को ऐसा हल्ला करने का अधिकार देवदूतों ने भी स्वीकार नहीं किया, फिर मनुष्य जाति को वह कैसे मिलेगा? परंतु उस मनुष्य जाति में यदि किसी को यह अधिकार रत्ती मात्र भी न मिलना हो तो वह जाति अंग्रेज ही है। हिंदुस्थान ने सैकड़ों निरपराधियों को मार डाला, यह कौन इंग्लैंड कहेगा? नील को जन्म देनेवाला और नील की स्तुति करनेवाला इंग्लैंड ? जिस अवध ने उसे प्राणदान दिया उस अवध के गांव-के-गांव महिला-बच्चों सहित जलाकर राख करनेवाला इंग्लैंड? फांसी भी कम है, इसलिए स्वदेश के लिए लड़नेवाले पांड्य सैनिकों को वास्तव में जला देनेवाला इंग्लैंड? फांसी को या जीवित जलाने को भी जिस भय से जिन्होंने बड़े प्रेम से स्वीकार किया होता, ऐसा धर्मछल करने के लिए उन गरीब हिंदू ग्रामीणों को पकड़कर फांसी का दंड देकर उन्हें बैनेटों से छेदनेवाला और मरने के पहल उनके मुंह में गाय का रक्तरंजित मांस तलवार से ठूसनेवाला इंग्लैंड? फर्रूखाबाद के नवाब के वंशज को फांसी पर चढ़ाने के पहले-वह मुसलमान था इसलिए-उसके सारे शरीर को सूअर की चरबी लगाकर और फिर उसे सूअरे के चमड़ें में लपेटकर, भंगी से चाबुक से पिटवाकर फिर फांसी देनेवाला और यह सारा कृत्य स्वयं कमांडर-इन-चीफ सर कोलिंस की आंखों के सामने करानेवाला इंग्लैंड? हडसन को वीर कहनेवाला, आउट्रम की स्तुति करनेवाला और ये सब कृत्य विद्रोहियों का समुचित प्रतिशोध है, यह मानकर उसकी प्रशंसा करनेवाला इंग्लैंड? कानपुर की दीवारों पर वाहियात एवं नीचतापूर्ण बातें स्वयं के हाथों से लिखकर-ये मरी हुई महिलाओं की लिखी हैं, ऐसा मूलभूत छिछोरापन करनेवाला इंग्लैंड? यथार्थ प्रतिशोध˙˙! किसका? सौ वर्षों तक चक्की में पीसी गई देशमाता के लिए सतंप्त हुए पांड्य पक्ष का या उस अन्याय के कोल्हू पर निगरानी करनेवाले आंग्ल पक्ष का? किसका यथार्थ प्रतिशोध? अन्याय के ऐसे भयानक बारूदखाने के सिवाए इस शम-प्रधान हिंदुस्थान का यह भयंकर विस्फोट शांत न हुआ होता। उस अन्याय ने उनके हृदय को जलाकर रख दिया। हिंदू और मुसलमान अपनी अज्ञानजन्य शत्रुता भूलकर देशमाता के स्तन के रस से 1857 का स्वातंत्र्य समर – 230
एकरस हो गए। जितना भारतीय उतना एक विलक्षण चेतना की हवा से तांडव करने लगा। व्यक्तिगत स्वार्थ, सुख, जीवन की तुच्छ आशा प्रायः नष्ट हो गई और एक उदात्त ध्येय में सारा हिंदुस्थान अपूर्व एकता में बंध गया। देश-सेवा के लिए इस भयानक स्थिति से पत्थर भी पिघलने लगा। कैसा भयंकर विस्फोट! और कितने अकस्मात् तड़ित वेग से ! एक क्षण में यह शांत दिखनेवाला ज्वालामुखी दिग्गजों के कान के परदे फट जाए, ऐसे कड़कड़ाहट से तड़क-फूटकर दुर्भंग, शतभंग, सहस्रभंग हो गया। शत्रु जहां पैर रखे वहां उसका भस्म। एक अंग्रेज इतिहासकार लिखता है-“जिनकी जान पर हमारी सुरक्षा टिकी हुई थी वे सरकारी नौकर ही एक ही समय पर नागों की तरह टूटने लगे। विश्वासघात किए हुए सरकारी नौकरों की सूची तैयार करूं तो विद्रोह कर रहे विस्तृत प्रदेश के सभी सरकारी नौकरों के नाम-पते मुझे देने पड़ेंगे। अपवाद हैं ही नहीं।” उन सरकारी नौकरों में अत्यंत प्रमुख काजी उदल, कुजल, उत्तर पश्चिम प्रदेश का मुख्य अधिकारी, आगरा का प्रिंसिपल सदर अमीन, कानपुर का प्रिंसिपल सदर अमीनए कानपुर का डिप्टी कलेक्टर, फतेहपुर का डिप्टी कलेक्टर, जिसने रॉबर्ट टक्कर को मारा, फतेहपुर के अन्य सारे अधिकारी, इलाहाबाद का मुंसिफ, उसी प्रदेश का और एक मुंसिफ, बरेली का प्रिंसिपल सदर अमीन, आजमगढ़ का डिप्टी कलेक्टर, वहां J का प्रिंसिपल सदर अमीन, G का प्रिंसिपल सदर अमीन और यह सूची बहुत ही अधूरी-केवल नमूने के लिए दी है- ऐसा प्रलय विस्फोट कड़कड़ाया, पुलिस विद्रोह कर उठी, सिपाही बंद कर उठे। गांववाले विद्रोह कर उठे। अंग्रेजों से ईमानदारी का अर्थ धर्मद्रोह और देशद्रोह है, ऐसी एक मिनट में धर्म की व्याख्या हो गई। जो कोई भी अंग्रेजों के यहां रहेगा उसका तत्काल जाति बहिष्कार होने लगा। उसकी पंगत में कोई बैठेगा नहीं-उससे विवाह कोई करेगा नहीं। उसके यहां पूजा के लिए ब्राह्मण नहीं आएगा। सबसे बड़ी और सबसे अपमानजनक गाली हो गई-‘फिरंगियों का नौकर’। एक अंग्रेजी लेखक कहता-‘सरकारी कर्मचारियों में हम यदि बिद्रोहियों की सूची तैयार करने लग जाएं तो संभवतः विद्रोही प्रदेशों के सभी कर्मचारियों के नाम इसमें सम्मिलित करने पड़ेंगे। उनमें अपवाद रूप ही किसी का नाम इस सूची में पृथक् रह पाएगा।” ऐसी परिस्थिति होने से, ऊपर से बिलकुल शांत दिखनेवाला ज्वालामुखी इतना प्रज्वलित हो गया था कि किसी भी क्षण उसका विस्फोट हो सकता था। क्रांतिदूत आकाश मार्ग से जाकर जल्द ही प्रारंभ होनेवाले उस समारोह में उपस्थित रहने का 1857 का स्वातंत्र्य समर – 231
निमंत्रण हर एक को दे रहे थे। उस आक्रमण को स्वीकार क रवह पवित्र ध्येय साध्य करने दस दिशाओं का युद्ध देवता तुरंत निकला। रणवाद्य, युद्धघोष, समर गर्जना आदि आवश्यक सारे साधन यथोचित स्थान पर सजाकर मंडप तैयार कर लिया गया है। ज्वालामुखी के पार्श्व में अत्याचारों का कहर निर्भयता से उबल रहा है। परंतु क्रांति का क्षण जैसे-जैसे पास आ रहा है, ऊपर हरित दिखनेवाले पर्वतों के अंतर में अत्याचार का कहर आ गिरा और उसी के साथ ज्वालामुखी का विस्फोट हो गया। हां, अब होशियार! क्रांति का विस्तार हो गया है। क्रांति की ज्वालाएं बाहर फैलने लगी हैं, रक्त का रिसाव होने लगा है, कान के परदे फाड़नेवाली चीत्कार, तलवारों की खनखनाहट, भूत बेसुध होकर नाच रहे हैं, योद्धा वीर गर्जना कर रहे हैं। ऊपर से हरित और ठंडा दिखनेवाला ज्वालामुखी पर्वत दो-फाड़ हो गया, उसके सैकड़ों टुकड़े हो गए और हजारों जगह पर सुलगकर भड़क उठा है, सारी पृथ्वी पर आग और तलवार की खनखनाहट व्याप्त हो गई। काठियावाड़ के किसी भाग में 'विठरूरू' नामकचमत्कारक जलप्रवाह है। उसका पृष्ठ भाग कड़े भूभाग जैसा लगता है। पर इसकी जानकारी न रखनेवाले मनुष्य सहज विश्वास से उसपर पैर रखते हैं। और वह ऊपर से कड़ा दिखता पृष्ठ भाग थोड़ा सा हिलते ही वह मनुष्य उसपर अधिक दृढ़ता से खड़े होने का प्रयास करता है। ऐसा करते ही वह पृष्ठ भाग झुकने लगता है और वह अजनबी गहरे पानी में डूब जाता है। विठरूरू की तरह ही यह क्रांति प्रवाह सारे हिंदुस्थान में व्याप्त हो गया है। ऊपर से दिखता काला रंग देखकर, अत्याचारी को ऐसा लगा कि कुछ भी शिकायत न करते हुए अन्याय सहता यह हमेशा का सरल पृष्ठ है, इसलिए अत्याचारी ने अपना कदम उसपर बिना हिचक रखा, तभी वह काला पृष्ठ भाग हिलने लगा! तब अत्याचारी अन्याय ने गर्व से उस भू-पृष्ठ पर और जोर से पैर रखा। और अब ध्यान से देखें। वह भू-पृष्ठ झुक गया और उसके नीचे लहरों-पर-लहरें उठने लगीं, रक्त के झाग को असीम सागर उछलकर ऊपर आने लगा। अत्याचारी अन्याय उसमें डूब गया। अत्याचारी अन्याय, तू कहीं भी पैर रख, कड़ा पृष्ठ भाग तुझे मिलेगा ही नहीं। अब अंतकाल में तुम्हें समझ में आएगा कि ऊपर से काले दिखते भू-पृष्ठ के नीचे रक्त के-लाल-लाल रक्त के-प्रवाह होते हैं और उस कान के परदे फाड़नेवाले ज्वालामुखी के प्रस्फोट की वह प्रचंड ध्वनि अब तो सुन। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 232
भाग-3 अग्नि-कल्लोल
प्रकरण-9 दिल्ली लड़ती है 11 मई को अपनी स्वतंत्रता घोषित करने के बाद दिल्ली शहर उस प्रचंड लड़ाई की तैयारी करने और मची हुई अंधाधुंधी को अनुशासित करने में लगा रहा। दिल्ली के परंपरागत तख्त पर मुगल बादशाह को बैठाकर क्रांतिकारियों ने जो एक शक्ति केंद्र तैयार किया, वह इतना शक्तिशाली था कि उसके नाम के प्रभाव से स्वतंत्रता संग्राम स्थिर हो गया। परंतु पुराने मुगलों को यह तख्तारोहण पुरानी मुगल सत्ता फिर से स्थापित करने के लिए या पुरानी जंगली परंपरा चालू करने के लिए भी नहीं था। हिंदुस्थान के बादशाह के पद पर बूढ़े बहादुरशाह को बैठाना-संकुचित अर्थ में परंपरागत तख्त पर मुगल सत्ता स्थापित करना लग सकता था, पर व्यापक अर्थ में और सत्यार्थ में देखें तो वैसा नहीं था। पुरानी मुगल सत्ता इस देश के लोगों ने स्वयं नहीं चुनी थी। हिंदुस्थान पर विजय भावना और आक्रामक वृत्ति से एवं स्वाभिमानशून्य देशद्रोही कार्यवाहियों के कारण वह मुगल सत्ता पर हमपर जबरन लादी गई थी। आज कोई ऐसे बल से बहादुरशाह को बादशाही पर नहीं बैठाया गया था। नहीं! वैसा करना तो असंभव था, क्योंकि वैसे सिंहासन तो जीतने पड़ते हैं। वे स्वागत योग्य नहीं माने जाते। वैसा करना आत्मघाती होता, क्योंकि वैसा करने का अर्थ था गत तीन-चार शताब्दियों तक हिंदू शहीदों, हुतात्माओं ने अपनी स्वतंत्रता के लिए जो खून बहाया था वह व्यर्थ गया, ऐसा माना जाता। अरबस्तान की जंगली टोलियों ने 1857 का स्वातंत्र्य समर - 235
इस्लाम को स्वीकार करते ही आक्रमण वृत्ति और पश्चिम में आक्रमण करके प्रदेश को पदाक्रांत किया था। कहीं उनका प्रतिकार हुआ ही नहीं, इस कारण देश के बाद देश, एक मानव जाति के बाद दूसरी मानव जाति को जबरन मुसलमान बनाते इस्लामी सत्ता दौड़ती चली। इस अविरोध आंधी का पहले-पहल किसी भी तरह का समझौता न करते महान् पराक्रम और निर्भयतापूर्ण निश्चय से किसी ने विरोध किया हो तो वह भारत ने ही किया था। अन्य राष्ट्रों के इतिहास में ऐसा विरोध अपवाद में ही दिखता है। यह युद्ध पांच शताब्दियों से अधिक चलता रहा था। इन विदेशी आक्रमणकारियों से स्वयं के जन्मसिद्ध अधिकार के लिए हिंदुओं ने पांच शताब्दियों से अधिक समय संरक्षणात्मक युद्ध चालू रखा था। पृथ्वीराज की मृत्यु से लेकर औरंगजेब की मृत्यु तक समझौतों और संधियों की परवाह न करते हुए युद्ध के बाद युद्ध चला और असंख्य वर्ष चले इस दीप्तिमंत द्वंद्व में भारत के पश्चिमी घाट में सह्याद्रि में एक नई शक्ति का उदय हुआ, अपनी जाति की मान-रक्षा के लिए जिन हजारों हिंदुओं ने बलिदान किया उस सम्मान की परिपूर्णता करने का कंकण उस नई हिंदू सत्ता ने अपने हाथ में बांधा। पुणे से एक हिंदू वीर भाऊसाहब पेशवा समर्थ सेना के साथ आक्रमण करते निकला और उसने दिल्ली के तख्त-सिंहासन-पर कब्जा किया और हिंदू संस्कृति पर लगा गुलामी का कलंक धो डाला। हिंदुस्थान गुलामी उतारकर और पराजय पोंछकर फिर से स्वतंत्र हुआ। हिंदुभूमि के हिंदू ही फिर से मालिक हुए-धनी हुए। इसलिए बिलकुल सच्चे भाव से कहें तो हम यह कहते हैं कि हिंदुस्थान के तख्त पर, सिंहासन पर बहादुरशाह को जो बैठाया गया वह पुरानी मुगल सत्ता की पुनर्स्थापना नहीं थी। परंतु दीर्घकाल तक इस देश के हिंदू-मुसलमानों के बीच जो युद्ध चल रहा था वह युद्ध समाप्ति की घोषणा का प्रतीक, जुल्म, अत्याचार समाप्त होने की निशानी था। इसी देश की मिट्टी में जन्में देश बंधुओं को अपना राजा कौन हो, यह चुनने की स्वतंत्रता आदि के प्रतीक रूप में वह राज्यारोहण था। क्योंकि हिंदू और मुसलमान दोनों ही जातियों, नागरिकों और सेना ने एकमत होकर बहादुरशाह को इस समय बादशाही तख्त पर आरूढ किया था, और स्वतंत्रता समर का नेतृत्व भी उसी को दिया था, इसलिए 11 मई को दिल्ली के सिंहासन पर बहादुरशाह ने जो आरोहण किया था वह प्राचीन मुगल परंपरा के अकबर या औरंगजेब की तरह का आरोहण नहीं था। क्योंकि वह मुग़लिया तख्ता वीर मराठे बहादुरों ने घन की चोटों से कभी का छिन्न-विच्छिन्न कर दिया था। परंतु विदेशी आक्रमणकर्ताओं से स्वतंत्रता युद्ध चलाने के लिए लोगों ने उसको राजा चुना था। इसलिए हिंदू-मुसलमान जनता ने वास्तविक समझ से, पूरे मन और निष्ठा से 11 मई, 1857 के दिन अपनी मातृभूमि के बादशाही पद पर बहादुरशाह की मान-वंदना करने सब आगे आए-ऐसी घोषणा की। इस घोषणा के अनुसार पास और दूर के स्थानों से, अनेक रियासतों से, अनेक 1857 का स्वातंत्र्य समर – 236
सैनिक टोलियों से और हिंदुस्थान के प्रमुख शहरों-नगरों से दिल्ली के राजा के लिए नजराने (उपहार) आने लगे। पंजाब में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करनेवाली नेटिव सिपाहियों की पलटनें तथा अवध, नीमच, रूहेलखंड और दूसरी जगह के विद्रोही अपने-अपने झंडे और निशान लिये दिल्ली की ओर चलने लगे और क्रांति के नेता बहादुरशाह जफर के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करने लगे। अनेक सैनिक टोलियों ने दिल्ली की ओर आते समय रास्ते में जो अंग्रेजी खजाने लूटे थे, वह संपत्ति उन्होंने बादशाह के खजाने में ईमानदारी से जमा की। इतनी सालंकृत सिद्धता होते ही सारे हिंदुस्थान देश के नाम एक घोषणापत्र-जाहिरनामा-प्रसारित किया गया और उसमें स्पष्टता से घोषित किया गया-''अब विदेशियों के साम्राज्य और फिरंगियों की राज्यसत्ता का अंत हो चुका है और सारा देश अब सवतंत्र और परदासता से मुक्त हो गया है।'' प्रारंभ में ही इतनी सफल हुई यह क्रांति पूरी करने के लिए हर एक इस क्रांतियुद्ध में अपना एक ईश्वरीय कर्तव्य मानकर, झूठे (व्यक्ति संबंधी) अभिमान भूलकर दैवी प्रेरणा से सहभागी हो, ऐसा आह्वान लोगों का किया गया। उसमें कहा गया कि “हर व्यक्ति यह ध्यान में रखे कि अपना यह विद्रोह केवल स्वधर्म रक्षा के लिए ही है, दूसरा कोई भी लालच इसके पीछे नहीं है। जिस-जिसको परमेश्वर से निश्चय एवं इच्छाशक्ति का वरदान मिला है, वे सब ही ऐहिक लाभ और क्षणभंगुर देह की आशा छोड़कर अपने प्राचीन धर्म का रक्षण करने के लिए हमसे सहयोग करें। सार्वजनिक हित के लिए लोग अपने स्वार्थ को तिलांजलि देने की ठान लें तो अपनी इस पवित्र भामि पर एक भी अंग्रेज मनुष्य रह न पाए। हर एक यह ध्यान में रखे कि अपने जीवन की डोर टूटे बिना कोई भी मरता नहीं और जब काल की कृपा हो जाए तब कोई भी अपने प्राण बचा नहीं सकता। शीतला की बीमारी और अनेक रोगों में आदमी मरते रहते हैं, पर स्वधर्म युद्ध में प्राण अर्पण करनेवाला शहीद हो जाता है, हुतात्मा होता है और इसीलिए हिंदुस्थान की पवित्र भूमि से हर एक फिरंगी को भगा देना या उसे मार डालना हर एक स्त्री-पुरुष का पवित्र कर्तव्य है। ऐहिक लाभ की कोई भी आशा न रखते हुए जो धार्मिक कर्तव्य-भावना से प्रेरित हैं, वे हमसे आकर मिलें।'' उपर्युक्त उद्धरण समय-समय पर अवध और दिल्ली से समान अर्थ के जो जाहिरनामे (घोषणापत्र) प्रसारित हुए थे, उनमें से ही लिये गए हैं। एक जाहिरनामा स्वयं दिल्ली के बादशाह ने प्रकाशित किया था और उसकी प्रसिद्धि सारे हिंदुस्थान भर में व्यापक रूप से हुई थी। देश के सुदूर दक्षिण सिरे तक उसकी प्रतियां हाथोहाथ बाजार और सेना में भी पहुंच गई थी। उसमें कहा गया था-''हे हिंदू और मुसलमान भाइयों! अपने पवित्र धार्मिक कर्तव्य की पूर्ति करने के लिए हमने जनता से हाथ मिलाया है। इस समय कोई डरपोकपना दिखाए या ढोंगी अंग्रेजों के झूठे आश्वासनों पर विश्वास करे, उसके मुंह पर कुछ ही समय बाद कालिख पोती जाएगी और इंग्लैंड का स्वामित्व स्वीकार कर उससे मित्रता जोड़नेवाले लखनऊ के नवाब को जैसा दंड मिला वैसा ही 1857 का स्वातंत्र्य समर – 237
उसको मिलेगा। इसलिए इसके बाद सारे हिंदू और मुसलमान-अंग्रेजों से चल रहे इस झगड़े में इकट्ठे आकर अपने किसी भी आदरणीय नेता की नीति पर चलने को तैयार हो जाएं। इस तरह देश में शांति और सुव्यवस्था स्थापित करने में हमारी सहायता करें। गरीब लोगों को संतुष्ट रखने के लिए प्रयास करें और उनको अधिक अधिकार व प्रतिष्ठा प्राप्त करने का अवसर उपलब्ध कराएं। जिस-जिसको संभव हो, वह इस घोषणापत्र की प्रतियां बनाकर गांव के मुख्य स्थानों पर चिपकाएं। ऐसा करते समय उचित युक्ति का उपयोग करें और पकड़े न जाने की दक्षता रखें और उसका प्रचार होते-न-होते अपनी तलवारें निकाल फिरंगियों पर प्रहार करें।" अंग्रेजी सत्ता के विरूद्ध स्वतंत्रता युद्ध घोषित करने के कुछ ही समय बाद वह युद्ध चालू रखने के लिए दिल्ली के क्रांतिकारियों ने शस्त्र और गोला-बारूद का उत्पादन करना आरंभ कर दिया, तोपें, बंदूकें और छोटे हथियार बनाने के लिए एक बड़ा कारखाना चालू किया गया और इस शस्त्र उत्पादन पर देखरेख के लिए कुछ फ्रेंच लोगों को नौकरी पर रखा। गोला-बारूद रखने के लिए दो-तीन गोदाम बनाए गए और रात-दिन काम चालू रखकर कामगारों से भरपूर गोला-बारूद्ध निर्माण करने की व्यवस्था की गई। सारे देश में कानून से गो वध बंदी लागू की गई और एक बार जब कुछ सिरफिरे मुसलमानों ने हिंदुओं का अपमान करने के लिए उनके विरूद्ध जेहाद की घोषणा की तब उस बूढ़े बादशाह ने अपने लवाजमे के साथ हाथी पर बैठकर सारे शहर से एक विशाल जुलूस निकालकर यह घोषित कर प्रकट किया कि अपना यह जेहाद केवल विदेशी फिरंगियों के लिए है, हिंदुओं के विरूद्ध नहीं है। जो कोई भी गाय की हत्या करता पाया जाएगा उसे तोप से उड़ा दिया जाएगा या उसके हाथ काट दिए जाएंगे। अलग-अलग रेजिमेंटों व टोलियों को भिन्न-भिन्न राजपुत्रों के नाम दिए गए। अंग्रेजों के विरूद्ध क्रांतिकारियों की इस लड़ाई में कुछ यूरोपियनों ने भी सहयोग दिया। बुंदेल की सराय की लड़ाई के बाद अंग्रेजी सेना को आगे की सैनिक कार्यवाही करने के लिए बहुत उचित स्थान मिल गए थे। दिल्ली की चारदीवारी के एक छोर तक आकर भिड़ी और यमुना नदी के आगे चार मील तक दूर फैली हुई टेकरियों की एक श्रृंखला थी-अंग्रेज जिसे Ridge कहते हैं-उन टेकरियों की प्राकृतिक ऊंचाई युद्ध की दृष्टि से बहुत लाभदायक थी। पासस-पड़ोस के समतल प्रदेश की अपेक्षा टेकरियों की ऊंचाई पचास-साठ फीट होने से वहां से तोपों की निरंतर और प्रभावी मार करने के लिए उस स्थान का अच्छा उपयोग हो सकता था। इन टेकरियों के प्रदेश से लगी हुई यमुना की चौड़ी नहर थी, जिसमें इस वर्ष जोरदार वर्षा होने से जून माह में भी अच्छा पानी था। वह नहर पीछे की ओर होने से अंग्रेजों के शत्रुओं की ओर से भी उस नहर को कोई धोखा नहीं होना था, केवल सामने से, दिल्ली की ओर से क्रांतिकारियों के जैसे हमले होते थे वैसे ही पीछे की ओर से, पंजाब की ओर से, यदि हमले हुए होते तो अंग्रेजों की शामत आ जाती। अंग्रेजों के सौभाग्य से पंजाब ने उनकी ओर से ही लड़ने की ठानी। नाभा, जींद और 1857 का स्वातंत्र्य समर - 238