भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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सांपों को मारकर कोई उनके बच्चों को जिंदा रखता है क्या?" कानपुर में सिपाही कहते-आग बुझाना और चिंगारियां रखना तथा सांप मारना और उसके बच्चे पालना, यह समझदारी नहीं। साहब, सांप को मारकर कोई उसके बच्चे जीवित रखता है क्या? काली नद के सिपाहियों द्वारा पूछे गए इस अखंड प्रश्न का उत्तर साहब लोग कैसे दे सकते हैं? और ये गंवारू शंका केवल हिंदुस्थान की जनता या कुछ अंग्रेजी लेखकों की कल्पना की तरह केवल एशियाटिक लोगों के ही मन मकें उत्पन्न नहीं हुई। जहां-जहां अन्याय की परमावधि होती है और राष्ट्र-के-राष्ट्र सुलग उठते हैं, जहां-जहां राष्ट्रीय युद्ध लड़े जाते हैं वहां-वहां राष्ट्रीय अन्याय का प्रतिशोध राष्ट्रीय वध से ही लिया जाता है। जब स्पेनवासियों ने मूर लोगों से अपनी स्वतंत्रता वापस छीन ली तब मूर लोगों की क्या दशा हुई? स्पेनिश लोग तो एशियाटिक नहीं थे या हिंदी भी नहीं थे। फिर उनके देश में कोई पांच-पांच सौ वर्ष से रह रहे उन मूर मुसलिमों के स्त्री-पुरूष-बच्चों सहित अनाथ परिवारों पर उन्होंने केवल एक विशिष्ट धर्म-जाति के अपराध के लिए भयंकर कत्लेआम क्यों किया? ग्रीस देश ने 1821 में कोई इक्कीस हजार तुर्की किसानों के पुरूष-महिला-बच्चों सहित अति अघोर कत्ल क्यों किए? यूरोप में जिस गुप्त संस्था को पवित्र माना जाता है उसी हिटेरिया ने उस कत्लेआम के समर्थन में कहा कि ग्रीस देश में तुर्कों की संख्या कम है और वे हमसे कभी भी वैर न छोड़नेवाले हैं, अतः उन सबको मार डालना ही अंतिम उपाय है-“ ”A necessary measure of wise policy"(सयानी नीति का आवश्यक उपाय)। यही उन्होंने कहा है या नहीं। सांप को मारनेवाला कोई उसके बच्चे जीवित नहीं रखता। यही सीधी-साध उत्तर उनके मन की प्राकृतिक दयाशीलता को जलाकर भस्म करता है। और उस भयंकर ज्वलन का संपूर्ण दोष उस विषैले सांप के कालकूट विष की ओर ही होना चाहिए। अन्यथा विष देश के विरुद्ध ऐसा भयानक प्रतिशोध मानव स्वभाव में नहीं बैठता और निर्दय शासन को विषैले सांप का डर न हो तो उसकी वह कालकूट जीभ आज इतने बिलों में भी जीवित न रहती। सारांश यह कि अन्याय के अतिरेक के कारण मानवी मन में प्रतिशोध की प्रतिक्रिया जब-जब अपरिहार्य और रक्तपात आदि अमानुषिक कार्य पक्की तरह शुरू होते ही हैं, यह इतिहास का साक्ष्य सुन लें तो सन् 1857 में हिंदुस्थान के चार-पांच स्थानों पर जो ऐसे क्रूर कर्म घटित हुए इसपर आश्चर्य होने की जगह, जिसपर वास्तव में आश्चर्य होना चाहिए वह बात यह है कि यह क्रूरतापूर्ण मारकाट इतने अल्प प्रमाण में केवल चार-पांच स्थानों पर ही घटित हुई, उसकी जगह सारे स्थानों पर इससे अधिक प्रबल रीति से इस प्रतिशोध की अघोरता ने हुड़दंग क्यों नहीं मचाया? उपर्युक्त ग्रीस एवं स्पेन देश के न्यायिक गुस्से के उदाहरण 1857 का स्वातंत्र्य समर - 227