भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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विकट प्रकट भैरवी'-ऐसी हो जाती है तब-तब उस भयंकरता का दोष उस न्यायमूर्ति का न होकर जिस मदमत्त के कारण वह क्रूर अवसर आया है उस प्रबल अन्याय पर ही वह आरोपित होता है, इसलिए फांसी का दंड देने वाला न्यायाधीश रक्तपात का उत्तरदायी न होकर फांसी पर जानेवाला अन्याय ही उस पाप का उत्तरदायी होता है। इसलिए ब्रट्स का खंजर पवित्र है। इसीलिए शिवाजी के बघनखे पुण्यपावन हैं। इसलिए इटली की राज्य क्रांति का रक्तपात यशोधवल है। इसीलिए चार्ल्स प्रथम का खून वध है। इसीलिए विलियम टेल का तीर प्रेम है। और उन सब कृत्यों की भयंकरता का अघोर पाप-उसके अधिकारी अन्याय के सिर पर वज्राघात जैसा पड़नेवाला है। और यदि विद्रोह, रक्तपात और प्रतिशोध का डर नहीं होता तो आज अत्याचार और अन्याय के अप्रतिहत भयंकर तांडव से यह वसुंधरा थर्राती रहती। जल्दी या देर से, परंतु ऐसे क्षणिक विजयी अन्याय का प्रतिशोध न्यायी प्रकृति लेगी ही, इस चिंता से यदि अत्याचारी की नींद सुरक्षित होती तो अकुतो भयता से आज सब ओर चोरी-चोरी का खुला राज होता। पर हर हिरण्यकशिपु को नृसिंह का प्रतिशोध, रह दुःशासन को भीमसेन का प्रतिशोध और हर मदमलिन गंडस्थान को हरिनखों का प्रतिशोध, अपनी रक्त भरी और विकरालता से लपलपाती जीभ से डराता रहता है। इसीलिए अन्याय प्रवृत्ति का उच्चाटन होने की थोड़ी-बहुत आशा हृदय में उत्पन्न होती है। इस तरह का प्रतिशोध अन्याय का निसर्गोदभूत शासन होता है और इसलिए उसकी क्रूरता का, अमानवीयता का पाप अन्याय प्रवर्तकों पर ही उलटकर लगता है। और ऐसे प्रतिशोध की भयानक ज्वाला सन् 1857 में हिंदुस्तान के हृदय में भड़क उठी थी। उनके सिंहासन फूटे हुए, उनके मुकुट टूटे हुए, उनका देश छीना हुआ, उनका धर्म कुचला हुआ, मानभंग, जीवन में विफलता का पहाड़, निवेदन व्यर्थ, अर्जिया व्यर्थ, रोना बेकार, चिल्लाना व्यर्थ। तब प्रकृति की प्रतिक्रिया शुरू हुई और जहां-तहां 'प्रतिशोध, बदला', ऐसी कानाफूसी होने लगी। ऊपर वर्णित एक-एक घटना प्रतिशोध को जन्म देती है, पर यहां तो ऐसी अनंत घटनाएं घटित हुईं। इतने पर भी विद्रोह न होता तो हिंदुस्तान मरा हुआ है, ऐसा की कहा जाता। इसलिए यह प्रतिशोध अन्याय की अपरिहार्य प्रतिक्रिया है तो फिर एक बार सारा देश उबल उठे और किसी एक स्थान पर जनसमूह कत्लेआम कर दें-यह आश्चर्य नहीं। आश्चर्य तो यह है कि हर स्थान पर ऐसा कत्लेआम क्यों नहीं हुआ? क्योंकि जहां कत्लेआम हुआ और जिन्होंने वह किया उनका संतप्त तर्कशास्त्र सहज ही उद्घोष कर उठा-शठे शाठ्यं समाचरेत्! काली नदी की लड़ाई में पकड़े गए सिपाहियों को फांसी पर चढ़ाने के पहले अंग्रेजों ने पूछा, "तुमने हमारी स्त्रियों और बच्चों को क्यों मारा?" तब उन्होंने तत्काल प्रत्युत्तर दिया, "साहब,