भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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कतराते हैं! ऐसा भयानक हल्ला जहां-तहां आज तक चल रहा है। और आगे सत्य का स्वर सुनने की श्रवण क्षमता ही न रहे, इसके लिए विश्व की श्रवण क्षमता के कान इस अखंड हल्ले-गुल्ले से फोड़ दिए गए हैं। विद्रोही राक्षस है ।, बाल हत्यारे हैं, रक्तप्रिय है, नरक कृमि हैं, अमानुष हैं-खबरदार, विश्व यदि दूसरा कुछ सुने तो! क्योंकि? क्योंकि विद्रोहियों ने स्वदेश के लिए और स्वधर्म के लिए हम अंग्रेजों के विरुद्ध शस्त्र उठाया और 'प्रतिशोध-प्रतिशोध' की गर्जना करते हुए हमारा कत्लेआम किया। कत्लेआम भयंकर पाप है। मनुष्य जाति के अंतिम सौंदर्य ईश्वर के अवतार द्वारा देवदूतों द्वारा और धर्मगुरुओं द्वारा प्रवर्तित अति उच्चा भविष्य जब वर्तमान होकर जिस समय न्यायसव्यवस्था में जा पहुंचेगा, जब सत्य के पहले 'अ' निषेध-प्रत्यय कभी नहीं लगाया जाएगा और जब एक गाल पर मारने पर दूसरा गाल आगे कर, ऐसे यीशु के शांतिबोध को, पहले गाल पर मारनेवाला कोई न बचने के कारण, असंभवता आ जाएगी उस आदर्श दैवी युग में यदि किसी ने विद्रोह किया, यदि किसी ने रक्त बिंदु गिराया और यदि किसी ने 'प्रतिशोध' शब्द का उच्चारण किया तो तत्काल उस कृति के कारण और उस उच्चारण से वह पापी अधमत्व को प्राप्त होगा; क्योंकि जहां-तहां सत्य का राज्य हर हृदय में समाया होने पर 'विद्रोह' पाप ही होगा। इधर-उधर अहिंसा की समता हर हृदय में दृष्टिगोचर हो रही हो तो रक्त बिंदु गिराना पाप ही होगा और इधर-उधर न्याय के चंद्र प्रकाश में हृदय में शीतलता व्याप्त होने पर 'प्रतिशोध' शब्द का उच्चारण पा ही होगा। ऐसे अबाधित न्यायकाल में ऐसा अन्यायमूलक उच्चारण सुनते ही किसी तरह की जांच किए बिना उस उच्चारण से ही उस कार्य को अधमत्व का दंड देना पूरी तरह अदुषणीय है। परंतु वह दैवी युग जब तक आया नहीं है, जब तक उस परम मंगल साध्य का अस्तित्व केवल किसी सत्कवि की प्रतिभा और ईश्वर-प्रेषितों के भविष्य में ही विद्यमान है और जब तक वह न्याय भाजन की अवस्था प्राप्ति संभव करने के लिए उसकी विरोधी अन्यायमूलक प्रवृत्ति का निर्मलन करने में मानवी मन लगा हुआ है तब तक विप्लव, विद्रोह, रक्तपात और प्रतिशोध आदि शब्द कवेल अधमता के अधिकारी नहीं होंगे। 'राज्य' शब्द जब तक न्यायमूलक दोनों सत्ताओं के लिए मान्य है तब तक तद्विरोधक विप्लव, विद्रोह शब्द भी जैसे अन्यायमूल वैसे ही न्यायमूलक भी हो सकेगा और तब तक विप्लव, रक्तपात और प्रतिशोध आदि के कथानकों और कथानायकों के-दंड के पूर्व तत्काल विवरणात्मक जांच होनी ही चाहिए। विप्लव, रक्तपात और प्रतिशोध के कृत्य जैसे स्वयमेव अन्याय स्वरूप हैं वैसे ही वह कभी-कभी न्याय के संवर्धन के लिए प्रकृति द्वारा उत्पन्न न्यायिक शस्त्र भी हैं। और जब इन भयंकर साधनों से न्यायमूर्ति-'शत्रुरुधिरदिग्धपाणिमुख 1857 का स्वातंत्र्य समर - 226