भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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देखे गए असंतोष के बीज पूरी तरह नष्ट हो गए हैं। (Have been completely put an end to) । ये वाक्य पार्लियामेंट ने 11 जून को सुने। 11 जून! इसी समय हिंदुस्तान में घुड़सवारों की 11 रेजिमेंट, तोपखने की 5 फील्ड बैटरियां, पैदल सेना के कम-से-कम पचास रेजिमेंट और करीब सारे सैपर्स और माइनर्स ने खुला विद्रोह किया हुआ था। पूरा अवध विद्रोहियों के हाथ में था। कानपुर और लखनऊ दोनों शहर घिरे हुए थे। सरकार के खजाने से एक करोड़ रुपए से अधिक की राशि विद्रोहियों के हाथ लग गई थी। जिस क्षण पार्लियामेंट में लॉर्ड केनिंग द्वारा दर्शाई तत्परता, कड़ाई और तुरंत-फुरत कार्यवाही से सेना में देखे गए असंतोष के बीज “Have been completely put an end to” आगे फिर जल्दी ही उन विषैले बीजों की अकल्पित बाढ़ ने इंग्लैंड की मध्य रात्रि में भी नींद हराम कर दी। फिर भी, कानपुर का अधूरा समाचार आते ही अत्यंत दुःखी, भयग्रस्त एवं संक्षुब्ध अंग्रेजी जनता ने पार्लियामेंट में जब प्रश्न पूछे कि क्या कानपुर का समाचार सच है? तब अर्ल ग्रैनविल नामक सरदार ने उत्तर दिया कि सेना प्रमुख सर पैट्रिक ग्रांट ने मुझे पत्र भेजा है कि कानपुर की मार-काट का वह समाचार पूरी तरह असत्य है, केवल Vile fabrication है। एक सिपाही ने वह गप पहले बाजार में उड़ाई और उसकी उस नीचता का विस्फोट हो गया है। इस भयंकर अफवाह के लिए उसे फांसी पर भी चढ़ा दिया गया। 109 पार्लियामेंट सभा के हाउस ऑफ लॉर्ड्स में भी कानपुर के कत्लेआम की बात नर-रक्त की मसि से नर-मांस के पत्र पर घिनौने अक्षरों से खोदने में पूरा एक माह उलट गया। आउस ऑफ लॉर्ड्स की सभा में इस अफवाह को उसके उस काल्पनिक उत्पादक सिपाही के साथ ही फांसी पर चढ़ाकर अंग्रेजी कूटनीतिज्ञ थोड़े आराम से सांस ले पाए थे कि इंग्लैंड के किनारे पर वह वास्तविक आकर लग गई और सारा इंग्लैंड देश, गुस्से, अभिमान-भंग से बेहोश, पागल होकर पैर पटक-पटककर नाचने लगा। उसका वह पैर पटकना अभी तक चालू है। विद्रोह में विद्रोहियों के लिए कत्लेआम ने मनुष्य जाति के निर्मल यथ पर पक्की आसुरी कालिमा चढ़ा दी, यह उनका गुस्से में कहना- उनके लिखे इतिहास की पंक्ति-पंक्ति से वे चीखें आज तक जोर-जोर से सुनाई दे रही हैं। और उन चीखों के अखंड हल्ले-गुल्ले से विश्व के कान के परदे हमेशा के लिए फट गए। सन् 1857 का नाम लेते ही उनके शरीर पर भय से कांटे और मुंह पर लज्जा की छाया आ जाती है। विद्रोहियों के नाम का उल्लेख उनके शत्रुओं को ही नहीं, पगले अनजानों को ही नहीं-जिसके लिए उन विद्रोहियों ने रक्त बहाया, उन अपनों को भी त्याज्य लगता है, निद्य लगता है, पापकारक लगता है। उनके शत्रु उन्हें राक्षस, पिशाच, रक्तप्रिय, नरक के कीड़े कहते हैं। उनके अनजाने उन्हें अमानुष, जंगली, अघोरी कहते हैं और जिन्हें देशभंधु अपना कहने से भी

1857 का स्वातंत्र्य समर – 225

109 चार्ल्स बॉल, खंड 1 ।