भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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रहने दें, पर हिंदुस्थान तब अत्याचार की ज्वाला से जला हुआ था और सरेआम मार-काट को जिस एक परिस्थिति में न्याय दंड का स्वरूप मिल जाता है उस दुर्जन पीड़ाग्रस्तता की हिंदुस्थान पर असह्य मार पड़ी थी। परंतु क्रॉमवेल जब आयरलैंड में सेना लेकर घुसा और जब वहां के लोगों के यथार्थ देशाभिमान से वह अधिक ही क्रुद हो गया और वहां के लड़ाकुओं पर ही नहीं, अशरण गरीबों पर उसकी तलवपर सरसराती पड़ी, जब उस अभागे देश में रक्त की नदी तेजी से बहने लगी और जब उस रक्त में क्रॉमवेल की तलवार से कटी अनेक निरीह महिलाएं अपने गोद के बच्चों सहित तैरने लगीं, तब आयरलैंड जीतने का मूल हेतु पापकारी होते हुए भी उस क्रॉमवेल ने, अपने स्वधर्मियों का जितना क्रूरतम प्रतिशोध लिया और क्रूरतम रक्तपात किया उतना भी हिंदुस्थान ने सन् 1857 में उन परधर्मी, परवर्णीयों का रक्तपात नहीं किया। अंग्रेज महिलाओं को बचाने के लिए नाना साहब, दिल्ली के बादशाह, अवध की बेगम ने अंत तक प्रयास किया। परंतु कानपुर में नाना द्वारा दिए गए जीवनदान का ऋण अंग्रेज महिलाओं ने किस तरह चुकाया? विश्वासघात करके। जब-जब अंग्रेज अधिकारियों को सिपाहियों ने विद्रोह होते ही जीवनदान दिया तब-तब उन अधिकारियों ने उस उपकार के बदले विश्वासघात ही किया। उन्होंने नए आए अंग्रेज अधिकारियों को प्रदेश की विस्तृत जानकारी दी, उनका सेनापति पद स्वीकार किया और जो हाथ सिपाहियों ने जीवित छोड़ दिया उसी हाथ में तलवार पकड़कर उस प्राणदाता की ही गर्दन काटी। फिर भी अतर्क्य आश्चर्य यह कि ऐसे विश्वासघात में भी स्वभाव से शांत भारतीय लोगों ने अपनी शांति उस प्रलयकाल में भी डिगने नहीं दी। कितने अंग्रेज भगोड़ों के प्राण खेत मजदूरों ने बचाए? कितनी ही महिलाओं को अपने कपड़े देकर ग्रामीण महिलाओं ने उनके प्राण बचाए? कितने ही गोरे अधिकारी भागने की शक्ति समाप्त होने से सड़कों पर बेहोश पड़े मिले और पास से गुजरते ब्राह्मण ने दूध पिलाकर उन्हें होश में लाने का उपक्रम किया। फॉरेस्ट ने माना है कि अवध ने-जिस अवध के कलेजे में अंग्रेजों ने अपने अत्याचार की छुरी घृणास्पद रीति से घोंपी थी, उस अवध के कलेजे में अंग्रेजों ने अपने अत्याचार भूलकर उनके पलायन में अतुल्य उदारता दर्शाई । विद्रोहियों के घोषणापत्र में उनके नेताओं ने अपने संतप्त अनुयायियों को कहा था कि स्थान-स्थान पर-स्त्री एवं बाल हत्या से अपने पवित्र काम में हानि होगी। नीमच, नसीराबाद के विद्रोहियों के द्वारा प्राणदान दिए जाने के बाद भाग रहे गोरों को देखकर रास्ते के ग्रामीण जब चिल्लाने लगे-मारो फिरंगी को-तब वहां के एक परिवार ने आगे बढ़कर कहा कि उन्होंने अभी-अभी हमारे साथ भोजन किया है, यद्यपि वे कट्टर शत्रु हैं, तब भी उनको कैसे मारा जा सकता है।¹¹⁰ जिसके सामान्य ग्रामीणों में भी ऐसी उदात्त वीरता व्याप्त है वह शांत हिंदुस्थान सन् 1857 का स्वातंत्र्य समर – 229 ¹¹⁰ चार्ल्स बाल कृत-'इंडियन म्यूटिनी', भाग 1 ।