भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 217, कुल 418 में से

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पराभूत अंग्रेजी सेना घुसते ही और उनके पीछे विद्रोहियों की विजय ध्वनि सुनकर आगरा को, जो अवसर वह चाहता था, मिल गया। यह 6 जुलाई का दिन था। आगरा विद्रोह कर उठा और उसकी अगुवाई का जिम्मा पुलिस ने लिया। ये सारे पुलिसवाले पहले ही गुप्त रूप से तैयार थे। उनका, नागरिकों का, धर्मनिष्ठ हिंदुओं और मुसलमानों का एक विशाल जुलूस निकला। शहर कोतवाल और पुलिस अधिकारी उस जुलूस के आगे-आगे चले, उन्होंने स्वधर्म और स्वराज्य की जय-जयकार करते हुए घोषणा की कि फिरंगी राज्य समाप्त हो गया है और दिल्ली का बादशाह हमारा राजा हो गया है। इस तरह आगरा स्वतंत्र होते ही अंग्रेजों के साथ पराजय और अपमान के क्षुब्ध, चिंताग्रस्त सर कोलविन किले में जाकर बैठ गया। उसे अब एक ही डर था कि शिंदे क्या करता है? शिंदे विद्रोहियों से मिल गया, केवल इतने समाचार भर से वह प्रचंड किला विद्रोहियों के हाथ लग जाता। परंतु सिंधिया विरुद्ध नहीं है-यह उसके द्वारा भेजे जानेवाले पत्रों और रसद से स्पष्ट होते ही आगरे के अंग्रेजी झंडे में जान आ गई। परंतु उस झंडे के भार से कोलविन 9 सितंबर, 1857 को मर गया और अंग्रेजी राज्यसत्ता को दुःखी छोड़ गया। ग्वालियर से हुई लोकपद की इस क्रांति-चेतना का इंदौर में भी ऐसा ही भयानक विस्फोट हुआ। इंदौर के पास स्थित महू छावनी की सारी सेना और इंदौर की राज्यसत्ता का गुप्त व्यवहार निरंतर चालू था और विद्रोह का विचार भी इसी से बना। 1 जुलाई को इंदौर दरबार के एक मुसलमान सरदार सादत खान ने रेजिडेंसी के फिरंगियों पर टूट पड़ने का सेना को आदेश दिया। महाराज की मुझे यही आज्ञा है, ऐसा भी उसने कहा। पर इस कथन की जिसे कोई आवश्यकता नहीं थी, उस इंदौरी सेना ने विद्रोह का झंडा तत्काल खड़ा किया और रेजिडेंसी पर तोपों के साथ हमला कर दिया। रेजिडेंसी की नेटिव सेना ने अंग्रेजों की ओर से स्वदेश बंधुओं पर गोली चलाने से मना कर दिया। अंग्रेज बलहीन हो गए। उन्होंने चुपचाप अपनी गठरी बांधी और इंदौर से जान बचाकर भाग खड़े हुए। उनकी प्राणरक्षा की जिम्मेदारी उनकी नेटिव सेना ने ली हुई थी और इस तरह अंत तक उन्होंने उनकी सुरक्षा की। महाराज होलकर अंग्रेजों के अनुकूल थे या प्रतिकूल, यह सिद्ध करने का प्रयास अंग्रेज ग्रंथकार बहुत करते हैं, परंतु सन् 1857 की स्थिति और 1857 का इतिहास थोड़ी गहराई से देखनेवाले को यह तुरंत समझ में आ जाएगा कि अधिकतर नेटिव रियासतों ने उस क्रांति में ऐसा संशय का व्यवहार जान-बूझकर किया था। मनुष्य के हृदय में प्राकृतिक रूप से बैठी स्वतंत्रता की इच्छा उनमें मनुष्यता के साथ ही थी। अतः उन्होंने क्रांति की विजय होने पर भी अपना हित सुरक्षित रहे, इसलिए पूरी तरह अंग्रेजों का साथ नहीं दिया और परिणाम उलटा हो जाए तो भी हित बना रहे, इसलिए पूरी तरह क्रांति का भी साथ न देने का दांव चलाया था। लोग और सेना अपनी 1857 का स्वातंत्र्य समर - 221

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