१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरेजिडेंसी से अंग्रेजों को भगा देना चाहते हैं तो उन्हें वैसा करने दिया जाए, जिससे राज्य स्वतंत्र हो जाए; परंतु इधर अंग्रेजों से मित्रता की बातचीत चालू रहे, जिससे उनकी जीत हो तो भी जो था वह तो न जाए। कच्छ, ग्वालियर, इंदौर, बुंदेला, राजपुताना आदि अधिकतर रियासतों का यह व्यवहार दिखाई देता है। इस स्वार्थी व्यवहार से ही क्रांति का नाश हुआ। उन्होंने 'स्वतंत्रता या मृत्यु'-ऐसी करारी गर्जना की होती तो स्वतंत्रता मिलती ही। स्वतंत्रता और स्वार्थ ऐसी आधी कच्ची, उदात्तनुदात्त, ऊपर-नीचे लुका-छुपी करने से सारा शुभत्व विफल हुआ और अशुभ का दर्शन हुआ। स्वदेश से उन्होंने पटियाला आदि रियासतों जैसा द्रोह नहीं किया-परंतु यह अप्रत्यक्ष द्रोह किया कि केवल स्वतंत्रता के शुभ अस्तित्व की आशा में स्वार्थ का अशुभ भाव मन में रखा। इसीलिए वह सिपाहियों का विद्रोह विफल और देश पराजित हुआ। राज आचरण की इस शुभ-अशुभता ने या अशुभ-शुभता ने लोक आचरण को स्पर्श नहीं किया और इस लोकवर्तन के तेजस्वी आघात से ही पेशावर से कलकत्ता तक रक्त की बरसात हुई। प्रचंड आग जली, ज्वालामुखी की भयंकर ध्वनि के कारण अंग्रेजी सत्ता-मंदिर गिरकर ध्वस्त हो गया।106 परंतु यह ऐसा प्रलयी धक्का होगा, इसकी कलकत्ता और इंग्लैंड को कैसी अपूर्ण कल्पना थी। मेरठ के समाचार से पहले सरकार के विचार से हिंदुस्थान में पूर्ण शांति का राज था। यह छोड़ें, मेरठ में विस्फोट के बाद दिल्ली में नए साम्राज्य की घोषणा हुई, इस विस्फोट का अर्थ कलकत्ता की समझ में नहीं आया था। मेरठ के 10 मई के विस्फोट से 31 मई के सार्वजनिक विस्फोट तक विद्रोह की जलहर कहीं चली ही नहीं, यह देखकर हिंदुस्थान में कहीं भी गड़बड़ी नहीं है, यही कल्पना कलकत्ता से सिर में मजबूती से बनी रही। 25 मई को गृह सचिव ने खुले रूप में घोषित किया- "कलकत्ता से 600 मील की दूरी तक हर स्थान पर पूरी शांति है। बीच में लगा क्षण भर का विरल संकट अब नष्ट हो गया है और 'थोड़े ही दिनों' में सब ओर शांति और निर्भयता होगी, ऐसी आशा है।" ये थोड़े दिन भी बीत गए, 31 मई आ गई। इधर-उधर शांति और निर्भयता 1857 का स्वातंत्र्य समर — 222 106 जहां भी भारतीय नरेशों ने क्रांति में योगदान देने में संकोच किया, उनकी प्रजा पर से उनका नियंत्रण हट गया। प्रजा अपने राजा का जुआ भी उतारकर फेंक देने को संकल्पबद्ध हो गई। प्रजा की इस विचित्र मानसिक दशा को देखकर ही मैलसन ने कहा था, "ग्वालियर और इंदौर के समान ही यहां भी यह परिलक्षित हुआ कि जब पूरब के लोगों की धर्मभावना पूर्णतः उभार दी जाती है तो उनका स्वामी उनका राजा भी, जिसे वे पिता तुल्य ही नहीं प्रभु का अंश भी मानते हैं, वह भी उन्हें उनकी श्रद्धा के विरुद्ध झुका पाने में सफल नहीं हो पाता। जयपुर तथा जोधपुर नरेश की सेनाओं ने अपने देश-बांधवों के विरुद्ध संघर्ष करने से स्पष्ट शब्दों में इंकार कर दिया था। वे अपने राजाओं के आदेश पर भी ऐसा करने का तैयार नहीं हुए।" मैलसन कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 3, पृष्ठ 172