भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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दिखने लगी। लखनऊ की रेजिडेंसी के चारों ओर कानपुर के मैदान में, झांसी के झोकन बाग में, इलाहाबाद के बाजार में, बनारस के घाट पर, सब ओर शांति और निर्भयता। तारयंत्र के राई-राई से टुकड़े, रेलगाड़ियां, लोहे की पटरियां और रेल के पुल टूटे-फूटे धूल में मिले हुए, हर नदी में यूरोपियनों के शव बहते हुए, रास्ते-रास्ते में रक्त के ताल तलैया-सब ओर शांति और निर्भयता। तब कलकत्ता का मोहभंग हुआ। 12 जून, को सारे यूरोपियना नागरिकों ने स्वंयसेवकों की टोलियां बनाना चालू किया। यूरोपियन दुकानदार, बाबू, लेखक, असैनिक अधिकारी आदि सारे गोरों को लश्कर में भरती कर उनको कवायद सिखाना शुरू किया गया। तीन हफ्ते के अंदर नूतन शिक्षित स्वयंसेवकों की एक ब्रिगेड तैयार हो गई। घुड़सवार, पैदल और तोपखाना आदि की सहायता और शक्ति से कलकत्ता शहर की सुरक्षा करने की पूरी शक्ति आ जाने से उन्हें वह काम दिया गया और वहां के लश्करी यूरोपियन सोल्जरों को बाहर विद्रोह के स्थानों पर भेजने की सुविधा सरकार को मिली। तारीख 13 जून को लॉर्ड केनिंग ने स्वयं विधान परिषद् जाकर नेटिव पत्रकारों के विरुद्ध एक बहुत कठोर और भयानक विधेयक पारित करा लिया' क्योंकि विद्रोह शुरू होते ही बंगाल के नेटिव पत्र खुलेआम विद्रोहियों की सहानुभूति में उत्साहवर्धक लेख लिखने लग गए थे। तारीख 14 जून, रविवार के दिन कलकत्ता में शांति और निर्भयता का वास्तविक महोत्सव मनाया गया। उस दिन का वर्णन अंग्रेजी लेखक ही करें। "जहां-तहां भय, दहशत, आपाधापी और भागम-भाग। बहुत विचित्र समाचार! सबको यह विश्वास हो गया कि बैरकपुर के सिपाही कलकत्ता पर आक्रमण करने आ रहे हैं। रास्ते के सारे गांववाले विद्रोहियों से मिल रहे हैं, अवध का नवाब और उसके अनुयायी गार्डन रीच के बगीचों में चाकू चलाते घूम रहे हैं, अवध का नवाब और उसके अनुयायी गार्डन रीच के बगीचों में चाकू चलाते घूम रहे हैं। जो मुख्य अधिकारी थे वे ही सबसे अधिक घबराए हुए थे, सरकार के सेक्रेटरी कौंसिल के सदस्यों की ओर भाग रहे हैं।, पिस्तौल भर रहे हैं, हर दरवाजे के पीछे कबाड़ खड़ा कर रहे हैं। कौंसिल के सदस्य परिवार के साथ घरबार छोड़कर भाग रहे हैं। जहाजों पर चढ़कर जान बचा रहे हैं। उनसे निचले दर्जे के अधिकारी भी वरिष्ठ जनों की राह पकड़कर अपनी-अपनी मूल्यवान चीजें इकट्ठा कर किले में घुसकर तोपों के आश्रय में शरण पाने की भिक्षा मांगने लगे। गोरे लोग घोड़ों, गाड़ियों, पालकियां, हर तरह और प्रकार के वाहनों में भर-भरकर जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे। शहर के बाहर का हर ईसाई घर खुला पड़ा था। आध दर्जन निश्चयी धर्मांध रहे होते तो शहर का तीन-चौथाई भाग जलाकर रख कर देते।''107 अंग्रेज सरकार की राजधानी में केवल एक बाजारू गप से इतनी 'शांति और 1857 का स्वातंत्र्य समर - 223 107 रेड पैंफलेट, पृष्ठ 105।