भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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मटकाते हुए व्यंग्य भरा, devilish उपदेश देकर अब दूसरी महिला! देखें, उसे यह क्या कहती है? "क्या आपको आगरा भेजें? आगरा? आगरे में तो तुम्हारे सारे गोरे पुरुष मारे गए। और अब आगरा दिल्ली के बादशाह के अधीन है। जाएंगी उधर?'' और वे खिलखिलाते हंसने लगे। सिंधिया को एक बेजान गुड़िया जैसा बनाकर ग्वालियर की कांटिजेंट सेना ने विद्रोह किया। अंग्रेजों का रक्त तबीयत से बहाया। गोरी महिलाओं, गोरे झंडे और गोरी सत्ता को ग्वालियर रियासत के बाहर भगाकर, ग्वालियर रियासत पूर्ण स्वतंत्र करके वे सिंधिया को आदेश देने लगे कि अब हिंदुस्थान देश स्वतंत्र करने के लिए, कानपुर और दिल्ली की ओर सेना सहित तू हमरा सेनापति बनकर निकले।'' $^{105}$ सिंधिया ने उन्हें आज निकलता हूं, कल निकलूंगा-ऐसी गपों में उलझाकर और कुछ दिन चुप रखा। तात्या टोपे गुप्त रूप से ग्वालियर आया और उसके द्वारा इस भुलावे से सिंधिया की फौज को निकालने तक सिंधिया की सेना ऐसी ही निश्चय रही, इसीलिए अभी आगरा के अंग्रेजों की जान में जान है। क्योंकि आगरा के वायव्य प्रदेश का मुख्य लेफ्टिनेंट गर्वनर सर कोलविन हर पल मृत्यु के आगमन की राह देखते कांपता खड़ा हुआ था। मेरठ के विद्रोह से प्रभावित सिपाहियों को उसने राजनिष्ठा पर एक व्याख्यान दिया था और माफीनामे की घोषणा भी की थी। माफीनामा! उससे माफी मांगने आगे आनेवाला एक भी गरीब सिपाही उसे नहीं मिला। इतना ही नहीं, उसके माफीनामें के उत्तर में उन्होंने 5 जुलाई को आगरा पर हमला किया। नसीराबाद और नीमच की विद्रोही रेजिमेंट आगरा पर आक्रमण करने गई है तो करौली और भरतपुर रियासतों की सेनाएं उनपर भेज दो। उन रियासतों द्वारा भेजी गई सेना ने अंग्रेजों से कहा, "हमारी रियासत का आदेश है, इसलिए आपके विरुद्ध नहीं किया; लेकिन हम अपने स्वदेश बंधुओं पर हथियार बिलकुल नहीं उठाएंगे।'' कोटा की कांटिजेंट सेना ने तो विद्रोह किया ही। यह धोखा हुआ। नेटिव रियासत राजनिष्ठ पर उनका लोकमत और सेना-सब स्वदेश बंधुओं पर हथियार उठाने को तैयार नहीं। तब शेष बची गोरी सेना के साथ ब्रिगेडियर पॉलवल आगरे पर चढ़े आ रहे विद्रोहियों से लड़ने चल पड़ा। सिसीआ में दोनों पक्ष दिन भर एक-दूसरे से भिड़े रहे। अंत में विद्रोहियों की मार के आगे टिके रहना अंग्रेजों को कठिन हो गया और अंग्रेजी सेना पीछे लौट पड़ी। यह देखते ही विजयानंद से उत्साहित विद्रोही उन्हें पीठ पर मारते-कूदते आगे बढ़े। आगरा में वह

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$^{105}$ "उसके (शिंदे) के लिए अपने खोए हुए राज्य को पुनः प्राप्त कर लेने का यही सुअवसर था। वह यदि विद्रोहियों का प्रस्ताव मान लेना तो अंग्रेजों से प्रतिकार ले सकता था। यदि वह विद्रोहियों का नेतृत्व स्वीकार कर अपने सिद्धहस्त सैनिकों के साथ चल पड़ता तो हमारे (अंग्रेजों के) लिए इसका परिणाम नितांत ही भयावह होता। इसके कम-से-कम बीस हजार सैनिक थे, जिनमें से आधे के लगभग ने अंग्रेजों से पूर्ण सैनिक शिक्षा प्राप्त की थी। वे हमारे (अंग्रेजों के) कच्चे मोर्चों पर टूट पड़ते । आगरा और लखनऊ से हम सर्वदा के लिए हाथ धो बैठते। प्रयाग के दुर्ग में ही हैवलॉक बंद हो जाता और या तो वह किला घेरा जाता अथवा उसे अलग छोड़ते हुए विद्रोही काशी होकर कलकत्ता पहुंच जाते।'' -रेड पैंफलेट, पृष्ठ 194

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