भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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इस्लाम को स्वीकार करते ही आक्रमण वृत्ति और पश्चिम में आक्रमण करके प्रदेश को पदाक्रांत किया था। कहीं उनका प्रतिकार हुआ ही नहीं, इस कारण देश के बाद देश, एक मानव जाति के बाद दूसरी मानव जाति को जबरन मुसलमान बनाते इस्लामी सत्ता दौड़ती चली। इस अविरोध आंधी का पहले-पहल किसी भी तरह का समझौता न करते महान् पराक्रम और निर्भयतापूर्ण निश्चय से किसी ने विरोध किया हो तो वह भारत ने ही किया था। अन्य राष्ट्रों के इतिहास में ऐसा विरोध अपवाद में ही दिखता है। यह युद्ध पांच शताब्दियों से अधिक चलता रहा था। इन विदेशी आक्रमणकारियों से स्वयं के जन्मसिद्ध अधिकार के लिए हिंदुओं ने पांच शताब्दियों से अधिक समय संरक्षणात्मक युद्ध चालू रखा था। पृथ्वीराज की मृत्यु से लेकर औरंगजेब की मृत्यु तक समझौतों और संधियों की परवाह न करते हुए युद्ध के बाद युद्ध चला और असंख्य वर्ष चले इस दीप्तिमंत द्वंद्व में भारत के पश्चिमी घाट में सह्याद्रि में एक नई शक्ति का उदय हुआ, अपनी जाति की मान-रक्षा के लिए जिन हजारों हिंदुओं ने बलिदान किया उस सम्मान की परिपूर्णता करने का कंकण उस नई हिंदू सत्ता ने अपने हाथ में बांधा। पुणे से एक हिंदू वीर भाऊसाहब पेशवा समर्थ सेना के साथ आक्रमण करते निकला और उसने दिल्ली के तख्त-सिंहासन-पर कब्जा किया और हिंदू संस्कृति पर लगा गुलामी का कलंक धो डाला। हिंदुस्थान गुलामी उतारकर और पराजय पोंछकर फिर से स्वतंत्र हुआ। हिंदुभूमि के हिंदू ही फिर से मालिक हुए-धनी हुए। इसलिए बिलकुल सच्चे भाव से कहें तो हम यह कहते हैं कि हिंदुस्थान के तख्त पर, सिंहासन पर बहादुरशाह को जो बैठाया गया वह पुरानी मुगल सत्ता की पुनर्स्थापना नहीं थी। परंतु दीर्घकाल तक इस देश के हिंदू-मुसलमानों के बीच जो युद्ध चल रहा था वह युद्ध समाप्ति की घोषणा का प्रतीक, जुल्म, अत्याचार समाप्त होने की निशानी था। इसी देश की मिट्टी में जन्में देश बंधुओं को अपना राजा कौन हो, यह चुनने की स्वतंत्रता आदि के प्रतीक रूप में वह राज्यारोहण था। क्योंकि हिंदू और मुसलमान दोनों ही जातियों, नागरिकों और सेना ने एकमत होकर बहादुरशाह को इस समय बादशाही तख्त पर आरूढ किया था, और स्वतंत्रता समर का नेतृत्व भी उसी को दिया था, इसलिए 11 मई को दिल्ली के सिंहासन पर बहादुरशाह ने जो आरोहण किया था वह प्राचीन मुगल परंपरा के अकबर या औरंगजेब की तरह का आरोहण नहीं था। क्योंकि वह मुग़लिया तख्ता वीर मराठे बहादुरों ने घन की चोटों से कभी का छिन्न-विच्छिन्न कर दिया था। परंतु विदेशी आक्रमणकर्ताओं से स्वतंत्रता युद्ध चलाने के लिए लोगों ने उसको राजा चुना था। इसलिए हिंदू-मुसलमान जनता ने वास्तविक समझ से, पूरे मन और निष्ठा से 11 मई, 1857 के दिन अपनी मातृभूमि के बादशाही पद पर बहादुरशाह की मान-वंदना करने सब आगे आए-ऐसी घोषणा की। इस घोषणा के अनुसार पास और दूर के स्थानों से, अनेक रियासतों से, अनेक 1857 का स्वातंत्र्य समर – 236