१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण-9 दिल्ली लड़ती है 11 मई को अपनी स्वतंत्रता घोषित करने के बाद दिल्ली शहर उस प्रचंड लड़ाई की तैयारी करने और मची हुई अंधाधुंधी को अनुशासित करने में लगा रहा। दिल्ली के परंपरागत तख्त पर मुगल बादशाह को बैठाकर क्रांतिकारियों ने जो एक शक्ति केंद्र तैयार किया, वह इतना शक्तिशाली था कि उसके नाम के प्रभाव से स्वतंत्रता संग्राम स्थिर हो गया। परंतु पुराने मुगलों को यह तख्तारोहण पुरानी मुगल सत्ता फिर से स्थापित करने के लिए या पुरानी जंगली परंपरा चालू करने के लिए भी नहीं था। हिंदुस्थान के बादशाह के पद पर बूढ़े बहादुरशाह को बैठाना-संकुचित अर्थ में परंपरागत तख्त पर मुगल सत्ता स्थापित करना लग सकता था, पर व्यापक अर्थ में और सत्यार्थ में देखें तो वैसा नहीं था। पुरानी मुगल सत्ता इस देश के लोगों ने स्वयं नहीं चुनी थी। हिंदुस्थान पर विजय भावना और आक्रामक वृत्ति से एवं स्वाभिमानशून्य देशद्रोही कार्यवाहियों के कारण वह मुगल सत्ता पर हमपर जबरन लादी गई थी। आज कोई ऐसे बल से बहादुरशाह को बादशाही पर नहीं बैठाया गया था। नहीं! वैसा करना तो असंभव था, क्योंकि वैसे सिंहासन तो जीतने पड़ते हैं। वे स्वागत योग्य नहीं माने जाते। वैसा करना आत्मघाती होता, क्योंकि वैसा करने का अर्थ था गत तीन-चार शताब्दियों तक हिंदू शहीदों, हुतात्माओं ने अपनी स्वतंत्रता के लिए जो खून बहाया था वह व्यर्थ गया, ऐसा माना जाता। अरबस्तान की जंगली टोलियों ने 1857 का स्वातंत्र्य समर - 235