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१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पटियाला के राजाओं द्वारा पंजाब के राजमार्गों की सुरक्षा किए जाने से अंग्रेजों को धान्य, आदमी एवं गोला-बारूद्ध की आपूर्ति बिना धोखे के हो सकी। इस सारी घटना के इस तरह बन जाने से, हिंदुस्थान के अभाग्य से अंग्रेजों को अति अनुकूल परिस्थिति परिस्थिति प्राप्त हुई। दिल्ली पर मार की जा सके-ऐसी ऊंचाई, शत्रु की मार से अंग्रेजी डेरा सुरक्षित रहे-ऐसा समतल प्रदेश, शत्रु के जासूसों को भी प्रवेश नहीं मिल पाए-ऐसी चारदीवारी, पास में ही ताजा और भरपुर पानी, पंजाब की ओर से आ रहे मार्ग-और वे मार्ग निष्ठावान् रियासती सैनिकों द्वारा अपनी गांठ का खाकर सुरक्षित रहे और खुले, ऐसी सारी अनुकूल परिस्थिति के कारण ब्रिटिश कमांडर बर्नार्ड और उसके अधीनस्थ अधिकारियों का आत्मविश्वास बढ़ा और वे गर्व से कहने लगे-‘‘अब दिल्ली जीतने के लिए एक दिन भी नहीं लगेगा!’’ और फिर जिस दिल्ली को जीतना एक दिन का भी काम नहीं है उसके लिए दो दिन क्यों रूका जाए? अभी इसी क्षण उस पापी और देशद्रोही शहर को चारों ओर से आक्रमण करके धूल में मिला देने का आदेश अंग्रेजी सिपाहियों को क्यों न दिया जाए? पंजाब अपनी सेना की रीढ़ की हड्डी है और वह स्वामी-निष्ठा से सहयोग को तत्पर है तब दिल्ली जीतने के लिए अधिक देर तक घेरा डाकलकर बैठने का दुर्बलों जैसा रास्ता क्यों अपनाया जाए? उस नादान शहर पर सीधे हमला करके एक ही धमाके में उसे जमींदोज कर डालना अधिक बुद्धिमानी है। अपनी सेना के दो भाग करें-एक भाग लाहौर दरवाजे पर हमला करे और दूसरा भाग काबुल दरवाजे को नष्ट करे और शेष सब एक ही समय में दिल्ली में घुसकर रास्ते के सारे स्थान एक के बाद जीतते रास्ते में कहीं भी विश्राम न करते सीधे राजमहल पर हमला करें। बिल्वर फोर्स, ग्रेट हेड एवं हडसन जैसे वीरोग्रणी साहस और धड़ाके की लड़ाई करने के लिए बहुत आतुर थे और उन्होंने हमले का विजयी करने का दायित्व लिया हुआ था। फिर राह किसकी देखी जाए? इस तरह 12 जून को जनरल बर्नार्ड ने हमला करने का गुप्त आदेश दिया। कौन सैनिकों को इकट्ठा करेगा, सेनाएं कहां से और कैसे बढ़ेंगी, दायां-बांया नेतृत्व किस-किसके पास होगा? ऐसी सारी योजना पहले ही बन गई। हमले की सारी योजना इस तरह निश्चित की गई और भोर दो बजे से अंग्रेजी सेना पहले से नियोजित परेड मैदान पर इकट्ठी होने लगी। कल रात का बादशाह के राजमहल में ही सोना है, यह विश्वास होने के कारण आज रात नींद न हो पाने का दुःख करते बैठनेवाले वे मूर्ख थोड़े ही थे! निश्चय से असंभव, पर अंग्रेजों के दुर्भाग्य से ऐन मौके पर उनकी सेना का कुछ भाग लापता हुआ दिखाई दिया। ऐसी धोखादायक स्थिति में दिल्ली पर हमला करना उतावलापन होगा-ऐसा ब्रिगेडियर ग्रेव्ज को लगा और अन्य कुछ अधिकारियों ने भी ऐसा ही सुझाया कि ऐसी उतावली हिंदुस्थान की सारी ब्रिटिश हुकूमत के लिए मारक सिद्ध होगी। अतः सीधे हमले और तुरंत विजय के जो स्वप्न ब्रिटिश सेना को आ रहे थे वे दिल्ली के राजमहल में सच न होकर उस रात अपने डेरे के बिछौने में ही समाप्त हुए। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 239

दूसरे दिन प्रातः बिल्वर फोर्स और ग्रेट हेड ने अगले हमले की योजना बनाकर सेनापति बर्नार्ड के विचार के लिए उसके पास भेजी। सेनापति बर्नार्ड की पहचान क्रिमियन युद्ध के एक नामवर योद्धा के रूप में थी। पर इस अवसर पर वह बहुत धीमा और दब्बू-सा लग रहा था। 14 जून को उसने युद्ध परिषद् (वार काउंसिल) की बैठक बुलाकर अपने अधिकारियों से आक्रमण के विषय पर चर्चा की। आक्रमण की योजना का जोरदार भाषा में ग्रेट हेड से समर्थन किया, तब भी अन्य अधिकारियों को विजय का विश्वास नहीं होता था, इसलिए उन्होंने यह प्रतिपादन किया कि इसमें प्रत्यक्ष पराभव जितनी ही शक्ति की और प्रतिष्ठा की हानि होने वाली है। दूसरा यह कि सीधे हमला कर दिल्ली जीत भी ली तो भी उसकी रक्षा कैसे करें? रास्ते-रास्ते और घर-घर विद्रोहियों की ओर से चलती गोलीबारी में से कितने सोल्जर बचे रहेंगे? इस संबंध में अपना पक्का विचार बर्नार्ड भी कह नहीं पर रहा था। इस सारी चर्चा के बाद हमले के संबंध में भिन्न मत होने में ही इस युद्ध परिषद का एकमत हुआ। और इस तरह 12 जून को रात में आए स्वप्न की तरह 15 जून को भी आक्रमण की योजना त्यागकर तात्त्विक मत पक्का पकड़कर उसके विदास्पप्न भी वहा हो गए। 16 जून को युद्ध परिषद् की बैठक हुई। मर मत-भिन्नता और मन का धीरज कम होने में ही उसका अंत हुआ। अंग्रेज अधिकारी जिस समय एक ओर जोरदार और सीधे हमले की योजना बना रहे थे उसी समय दूसरी ओर दिल्ली में नए तरूण रक्त, नए खजाने, संपत्ति और नए उत्साह की बाढ़ आ रही थी और क्रांतिकारियों ने आज तक की बचाव की रणनीति छोड़कर अवसर के अनुरूप आक्रमण की नीति स्वीकार कर बीच-बीच में अंग्रेजी सेना पर छापे डाले और कभी-कभी उसमें सफल भी रहे। सारे हिंदुस्तान में जिन सिपाहियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया था उन सिपाहियों द्वारा अपने साथ लाए हुए खजाने, शस्त्रास्त्र, गोला-बारूद की दिल्ली में निरंतर आवक हो रही थी। इस कारण क्रांतिकारियों को युद्ध सामग्री या सिपाहियों की कमी नहीं थी। ऐसी स्थिति में उन्होंने आक्रमण की नीति अपनाई और अंग्रेजी सेना को एक कदम भी आगे नहीं बढ़ने दिया। बीच में ही एकाध साहसी आक्रमण शत्रु पर करना, शत्रु को सताने की नीति होने से अंग्रेजी सेना पर उन्होंने अपनी दहशत बैठा दी और उन्हें आक्रामक नीति छोड़ने को बाध्य किया। 12 जून को कुछ क्रांतिकारी शहर से बाहर निकले, झाड़ियों, झुरमुटों और गड्ढे आदि के सहारे-सहारे अंग्रेजों की अगाड़ी को पर कर पचास गज से भी अधिक अंदर चले गए और अंग्रेजों को आहट होने के पहले ही उन्होंने उनपर हल्ला किया। अंग्रेजी 1857 का स्वातंत्र्य समर – 240

तोपखाने के बहुत लोग गारद हो गए और सिपाहियों को अचूक गोली लगने से नॉक्स मारा गया। उसी समय क्रांतिकारियों की दूसरी टोली ने अंग्रेजों की पिछाड़ी पर भी हमला किया। पर वहां उन्हें बड़े प्रतिकार का सामना करना पड़ा। बाड़ा हिंदूराव और अंग्रेजी सो की दाईं बगल पर भी सिपाहियों ने बड़े जोर का हमला किया। जिनकी राजनिष्ठा पर अंग्रेजों को पूर्ण विश्वास था, ऐसी एक नेटिव पैदल टुकड़ी शत्रु पर हमला करने गई। परंतु उन्होंने विश्वासघात किया, यह स्पष्ट होते ही हमने उनपर गोलीबारी चालू की, पर वे बहुत तीव्रता से गोलीबारी से सुरक्षित निकल गए ˙ ˙ ।111 उस स्थान पर नियुक्त मेजर रीड कहता है-‘’मानो वे सिपाही शत्रु पर हमला करने जा रहे लें, ऐ लगता था; पर शत्रु से भिड़ते ही वे उनके साथ ही चलने लगे-यह देखते ही मैं डर गया। मैंने उपपर तोपें दागने का आदेश दिया; पर उतनी देर में वे विश्वासघाती इतने दूर चले गए कि उनमें से कोइ पांच-छह सिपाही ही मारे गए होंगे, ऐसा मुझे लगता है।‘‘ इस आक्रमण के बाद विद्रोही शत्रु पर हमला करने के लिए शहर के बाहर जा रहे हैं, ऐसा हर दिन दीखने लगा और हमला निपटाकर वे शहर में लौट रहे हैं, यह हर शाम दिखता था। सिपाहियों का जो-जो दल विद्रोहियों से मिलने दिल्ली में प्रवेश करता वह दल तुरंत दूसरे दिन शत्रु पर हमला करने बाहर जाता। 13 जून को बाड़ा हिंदूराव पर फिर से हमला किया गया। 12 जून को ब्रिद्रोहियों से जो सेना आकर मिली थी उसी ने यह हमला किया था। मेजर रीड लिखता है-‘’गैंड ट्रंक मार्ग से वे सिपाही सीधे टुकड़ियों का संचालन करते आ रहे थे। उस पलटन का नेता सरदार बहादुर था। अपनी बाईं बगल की ओर मुड़ने का उनका हेतु होने से अपने लोगों को पीछे रहने को कहकर वह स्वयं आगे हो गया। उस दिन वे सिपाही जान की परवाह न करते हुए लड़ रहे थे। परंतु सरदार बहादुर उसके अर्दली लाल सिंह के हाथों मारा गया। उसके सीने पर की हिंदुस्थानी सेना क निशानी की पट्टी निकालकर उसने मेरी पत्नी के पास भेज दी। 17 जून को भारतीय सेना ने ईदगाह भवन पर तोपों का मोरचा जमाना चालू किया; क्योंकि वहां से अंग्रेजों की रिज पर -सामने पर-जोरदार गोलागरी हो सकती थी। यह सब देखते ही मेजर रीड और हेनरी टॉब्स ने विद्रोहियों पर दो तरफ से हमला बोल दिया। और प्रतिकार हो ही नहीं सकता। ऐसी शक्ति से उन्हें घेरने का प्रयास किया। पर ईदगाह भवन में बंद वे मुट्ठी भर विद्रोही शरणागत नहीं हुए। जब उनके पास का गोला-बारूद समाप्त हो गया तब उन्होंने बंदूकें फेंककर अपनी तलवारें निकालीं और अपने अंग्रेज शत्रु पर प्राणपण से टूट पड़े। अपना अंतिम सैनिक अपने-अपने स्थान पर लड़ाई लड़ते मरने तक उन्होंने ईदगाह भवन में शत्रु को प्रवेश नहीं करने दिया।‘‘ 18 जून को नसीराबाद के विद्रोही सिपाही दिल्ली पहुंच गए और अपने साथ 1857 का स्वातंत्र्य समर - 241 111 के कृत-इंडियन म्यूटिनी', पृष्ठ 411 ।

लाया हुआ खजाना उन्होंने शाही प्रतिनिधि को दे दिया। उनके प्रतिनिधियों का बादशाह ने अपने राजमहल में स्वागत किया और उनका यथायोग्य आदर एवं मान-मर्तबा रखा। भरे दरबार में उस पलटन के सिपाहियों के प्रतिनिधि ने 20 जून को अंग्रेजी सेना पर हमला करने की शपथ ली। 20 जून को प्रातः शत्रु पर हमला करने जाने के लिए विद्रोही सेना शहर के दरवाजे से बाहर निकली, यह देखा गया। अंग्रेजों की छावनी के पिछाड़ी के बाजू पर हल्ला करने के हेतु से सिपाही सब्जी मंडी से छिपते-छिपते चले और अंग्रेज कुद सोचें, इसके पहले ही उनपर अचानक गोलियों की बौछार शुरू की और अंग्रेजों पर जोरदार हमला किया। स्कॉर्ट, मनी, टॉम्ब्स और अन्य अंग्रेज अधिकारियों ने तोपों की जोरदार मार करके यह हमला रोकने का प्रयास किया । पर भारतीय सेना इतनी लगन से हमला कर रही थी कि उसक प्रतिकार करना कठिन हो गया। नसीराबाद की पलटन का किया हुआ हमला इतना प्रभावी और भयानक था कि बहादुर टॉब्स भी रूआंसा होकर चिल्लाया-“दौड़ों, डॉली दौड़ो-अन्यथा मेरी तोपों पर शत्रुओं का कब्जा हो गया समझो।” पंजाबी नेटिव सिपाहियों के साथ डॉली दौड़कर भी आया। परंतु विद्रोहियों की ओर से छोड़ी गई एक गोली से उसके कंधे को चोट लगने से उसे पीछे घूमना पड़ा। शाम हो गई और सैनिकों की जीत स्पष्ट दिख रही थी। उन्होंने फिर हमला किया और अंग्रेजी सेना की तोपें हथिया लीं। 9वीं भाला सेना टुकड़ी (लांसर) और पंजाबी टुकड़ी बार-बार आगे घुसने का प्रयास करती और पराभूत होकर पीछे हट जाती। रात हो गई तब भी लड़ाई का रंग भीषण ही बना रहा। अंग्रेजों ने भी बहुत पराक्रम किया, पर वे अपनी तोपें बचाने से अधिक कुछ नहीं कर पाए। लॉर्ड रॉबर्ट्स लिखता है-“विद्रोहियों के कारण हममें भगदड़ मची (The mutineers routed us)। होप ग्रांट का घोड़ा मर गया। वह स्वयं भी बहुत घायल हो गया। उसके बाजू में ही एक राजनिष्ठ मुसलमान घुड़सवार खड़ा न होता तो वह उसी समय मर जाता। मध्य रात तक ऐसे झपट्टे चालू रहे। सिपाहियों के हमलों को रोकना असंभव हो जाने से अंत में अंग्रेज युद्धक्षेत्र से पीछे हट गए और अंग्रेजी छावनी की पिछाडी का एक प्रमुख स्थान विद्रोहियों के हाथ लग गया।” उस रात अंग्रेज कमांडर को चिंता के कारण नींद आना संभव नहीं था। क्रांतिकारियों द्वार जोर लगाकर जीता हुआ स्थान यदि उनके कब्जे में बना रहता तो अँजों की पंजाब की ओर से आवाजाही टूट जाती। यह संकट टालने के लिए उस विजयी स्वदेशी सेना का प्रतिकार करने को अंग्रेजों ने बड़ी भोर से ही तैयारी की। गोला-बारूद और सेना की अधिक सहायता प्राप्त करने वे सिपाही शहर लौट रहे थे, इसलिए अंग्रेज हाथ से `नकंला अपना स्थान फिर प्राप्त कर सके। इस लड़ाई की विजय और सिपाहियों की टक्कर के समाचार से दिल्लीवासियों का उत्साह बढ़ गया और उस उत्साह में उन्होंने किले पर लंबी मार की तोपें भी चढ़ाकर उससे अंग्रेजी सेना पर गोलों की भरमार कर दी। दिल्ली 1857 का स्वातंत्र्य समर - 242

की सेना ने इस प्रभावी आक्रमण नीति के कारण ब्रिटिश सेना के आक्रमण को रोक दिया और अपने संरक्षण की चिंता ही उन्हें सताती रही। अपने कब्जे के मुकाम कैसे सुरक्षित रखें, इस चिंता में डूबे अंग्रेजों को पंजाब से नई कुमुक मिले बिना एक कदम भी आगे बढ़ना असंभव हो गया और ऐसी बाधा को बढ़ाने के लिए 23 जून, 1857 का दिन उदय हुआ। 23 जून, 1857-प्लासी की लड़ाई के सौ वर्ष पूरे करनेवाला दिन। सौ वर्ष पूर्व ठीक इसी दिन रणनीति के जुए में प्लासी के रणक्षेत्र पर हिंदुस्थान का पासा उलटा पड़ा था। नए-नए अपमान, नई-नई मानहानि में बढ़ोतरी होते-होते सौ वर्ष पूरे हो गए। इस सौ वर्ष में जमा हुए अपमान का प्रतिशोध लेने, राष्ट्र का अपमान धो सकने और राष्ट्र की होने वाली दुर्गति रक्तपात से पोंछ डालने योग्य भयानक प्रतिशोध अंग्रेजों से लेने की प्रबल लालसा से, दिल्ली शहर के सभी सिपाहियों की आंखे आग बरसाने लगीं। हवा की हर लहर से, सूर्य की प्रत्येक किरण से, तोप के धूम-धड़ाके से और तलवार की खनखनाहट से प्लासी का प्रतिशोध, प्लासी का बदला-ऐसी एक ही ध्वनि घनघोर होकर बाहर आ रही थी। प्लासी के दुःखदायी रणक्षेत्र का यह शत सांवत्सरिक (शत वर्षीय) दिन उदय होते ही क्रांतिकारियों की टुकड़ियां शहर के लाहौरी दरवाजे से बाहर निकलने लगीं। अंग्रेजी को भी जिस भयानक संकट का सामना पड़ना है, इसकी पूरी-पूरी जानकारी थी, इसलिए वे रात से ही युद्ध की तैयारी में लगे हुए थे और उन्होंने अपनी सैनिक व्यूह रचना पूरी कर रखी थी। इतना ही नहीं, इस भयानक संकट की जानकारी उन्हें पूर्व में ही हो जाने से उन्होंने कुछ दिन पूर्व ही पंजाब सरकार से सेना की कुमुक मंगा ली थी और उनके भाग्य से भोर ह ीवह कुमुक आ गई थी। पंजाब से नई सेना आने के समाचार के साथ ही अंग्रेजों के मन में आत्मविश्वास जागा। अंग्रेजों को सेना की नई कुमुक मिली, इस समाचार से या अंग्रेजों ने पिछाड़ी का एक पुल उड़ा दिया, इस समाचार से क्रांतिकारियों के उत्साह पर कुछ भी प्रभाव पड़ा। सब्जी मंडी से वे सीधे आगे बढ़े और अंग्रेजों पर बंदूकों की गोलियों की मार करने लगे। अंग्रेज पैदल सेना ने हमले-पर-हमले किए; पर जैसे वे आगे बढ़ आते वैसे ही क्रांतिकारी भी हर बार पीछे धकेल देते। किले की दीवार का तोपखाना भी अपना काम सही कर रहा था। हिंदुराव बाड़े की भी क्रांतिकारी यथायोग्य सेवा कर रहे थे। दोपहर 12 बजे लड़ाई पूरे रंग में आ गई। पंजाबी टुकड़ियों, गुरखा पलटन और अंग्रेजों की गोरी सेना पर क्रांतिकारियों ने एक के बाद एक हमले किए। मेजर रीड कहता है-“मेरे सारे स्थानों पर विद्रोहियों ने बड़ी दृढ़ता से लड़ाई लड़ी, इससे अधिक पराक्रम से कोई लड़ नहीं सकता। राइफलधारी सिपाहियों पर, मार्गदर्शकों पर और खास मेरे पास के आदमियों पर उन्होंने बार-बार

हमले किए और एक बार तो मुझे लगा कि आज हम हार गए।‘‘ प्रत्यक्ष रणक्षेत्र पर लड़ते एक वीर अंग्रेज अधिकारी द्वारा ऐसे शब्दों में लिखना क्रांतिकारियों के हमले कितने प्रखर होंगे, इसका प्रमाण था। उसमें भी अग्नि जैसा प्रज्वलित और शक्तिशाली, फैले हुए घटकों को केंद्रित कर सके, ऐसा प्रबल नेता क्रांतिकारियों को मिला नहीं था। स्वदेश को फिर से स्वतंत्र कराने की दुर्दम्य इच्छा और प्लासी के अपमान का गुस्सा-इन दो समान बंधनों से वे क्रांतिकारी एकत्रित हुए थे। भारतीय सेना के हाथों अंग्रेजों का तोपखाना पड़ जाने का भ्रम निर्मित हो गया था और अंत में अपनी सेना को उत्साह देनेवाला मुख्य अधिकारी कर्नल वेल्शमन भी मारा गया। पूरे दिन अंग्रेजी छावनी का हर आदमी दृढ़ता से लड़ता रहा और थकता रहा और अ बवह खड़ा नहीं रह सकता, ऐसा लगने लगा। ऐसा है तब भी अंग्रेज सेनापति को आशा छोड़ देने का कोई कारण नहीं। क्योंकि उसी प्रातः वहां आकर पहुंची ताजा दम स्वामीनिष्ठ पंजाबी टुकड़ी उसे लड़ने के लिए कब अवसर मिलता है, इसके लिए बड़ी उत्सुक या उतावली है। उसको तुरंत हमला करने का आदेश दिया गया और इन ताजे तगड़े सिपाहियों के नए हमले से सारे दिन अविरत लड़ते क्रांतिकारियों को असमान लड़ाई लड़ना अनिवार्य हो गया। फिर भी उस विषम स्थिति में भी रात होने तक क्रांतिकारी निरंतर लड़ते ही रहे और बाद में हम ही जीते हैं, ऐसा कहते दोनों ही पक्ष की सेनाएं अपनी-अपनी शूरता और धीरज की प्रशंसा करते अपने तल पर लौट पड़ी। जैसे-जैसे दिन हो रहे थे वैसे-वैसे नए सैनिक पथक दोनों पक्षों को मिलते गए। पंजाब से निरंतर सैनिक भरती होते जाने से इस समय अंग्रेजों की ओर सैनिकों की संख्या 7 हजार से अधिक हो गई थी। दूसरी ओर रूहेलखं डमें विद्रोह कर उठे सिपाहियों की पलटन बख्त खान के नेतृत्व में दिल्ली आ गई थी। लॉर्ड रॉबर्ट्स कहता है-‘’रूहेलखंड की विद्रोही सेना नौका पुल पारकर कलकत्ता दरवाजे से शहर में प्रवेश करने लगी। हाथों में बड़े-बड़े झंडे और पताकाएं फहराते, युद्ध घोषणा करते हुए और बड़े ही अनुशासन में संचलन करते शहर में प्रवेश कर रहे हजारों सिपाही हमें अपनी छावनी की टोही टेकरी से दिख रहे थे।’’ दिल्ली के भिन्न-भिन्न जातियों और धर्मों के, पहले कभी एक-दूसरे का मुंह न देखे हुए और केवल संयोग से और क्षोभ की आंधी के कारण एक जगह पर आए हजारों सिपाही एकत्र रह ही नहीं सकते थे। शहर की लूटमार और आपाधापी रोकने बादशाह और उसके सलाहकार मंत्रिगण यद्यपि लगातार प्रयत्न कर रहे थे और उपदेशा भी कर रहे थे तब भी हर दिन सिपाहियों की लूटमार, आपाधापी और दंगल मचाने के समाचार आ ही रहे थे। क्रांतिकारियों में ऐसा होना स्वाभाविक होता है। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 243

ऐसी परिस्थिति में इन असंख्य और भिन्न-भिन्न सैनिकों पथकों को संगठित कर एकरूपता निर्माण कर सके, ऐसे किसी नेता की आवश्यकता होती है। इस समय क्रांति काल में सहजता से प्रकट होनेवाली लोगों की दुष्ट प्रवृत्तियों और वाममार्गी मनोवृत्तियों में यद्यपि भयानक उफान कर उनमें अपने लिए भय का निर्माण कर उन्हें अपने काबू में रखा था। परकीय शत्रु को देश के बाहर भगा देने की जो अति उत्कट इच्छा सैनिकों और समान्य नागरिकों में निर्मित हुई थी उसके बल पर ये हमले हो रहे थे। परंतु अंतिम विजय प्राप्त करना हो तो केवल प्रबल इच्छाशक्ति से काम नहीं होता, उसके लिए संगठित और विधिवत् प्रयास और कर्तव्यनिष्ठ नेतृत्व की आवश्यकता होती है। इसलिए अपनी सेना सहित और अपार संपति सहित रुहेलखंड का शूर बख्त खान दिल्ली पहुंचा-अर्थात् उसे ईश्वर ने भेजा, ऐसा लगने लगा। इसका वर्णन उसी समय दिल्ली में ही रहते एक सज्जन ने अपनी दैनंदिनी (डायरी) में लिखा है। उस दैनंदिनी का एक उद्धरण उस काल की दिल्ली का केवल दर्शन ही नहीं कराता बल्कि वह लोगों की कुल विचारधारा और घटनाओं पर भी प्रकाश डालता है- "रुहेलखंड की विद्रोही सिपाही टुकड़ियां जल्दी ही आने वाली हैं, इस अपेक्षा में यमुना का पुल ठीक कर लिया गया। तारीख 2 जुलाई को प्रातः नवाब अहमद कुली खान अपने सरदारों और नागरिकों के साथ रुहेलखंड की सेना का स्वागत करने सामने गया। उस समय हकीम अहसनुल्ला खान, सेनापति सनद खान, इब्राहिम अली खान, गुलाम कुली खान और अन्य नामवर नेता भी उपस्थित थे। रुहेलखंड की सेना के सेनापति मोहम्मद बख्त खान ने बादशाह को अपनी सेवाएं स्वीकार कर लेने का निवेदन किया। बादशाह को उसकी क्या इच्छा है, यह कहन का बख्त खान ने जब आग्रह किया तब बादशाह ने कहा, 'लोगों को पूरी सुरक्षा मिले, उनकी जान और माल की हिफाजत हो और अंग्रेज शत्रु को नष्ट करने का कार्य सफलता से पार पड़े, यह मेरी तीव्र इच्छा है।' उसपर सेनापति ने कहा कि आपकी इच्छा हो तो क्रांतिकारी सेना के सरसेनापति के पद पर मैं काम करने को तैयार हूं। उस समय बादशाह ने बड़े प्यार से सेनापति का हाथ दबाया। वैसे ही भिन्न-भिन्न पलटनों के प्रमुखों को इकट्ठा बुलाकर पूछा गया कि-सारी सेना के सेनापति पद पर बख्त खन का चयन करने को वे तैयार हैं क्या? सब लोगों ने 'हां, हां, कहा। और सरसेनापति के आदेशों का पालन करने की लश्करी और सैनिकी शपथ भी सबने ली। "यह शपथ विधि पूरी हो जाने पर बादशाह ने फिर से बख्त खान से निजी भेंट 1857 का स्वातंत्र्य समर – 244

की। सारे शहर में डोंडी पीटी गई कि सरदार बख्त खान को सरसेनापति के पद पर नियुक्त किया गया है। तलवार, एक पदक और सेनापति का पद उन्हें अर्पण कर उनका सम्मान किया गया। राजपुत्र मिर्जामुगल को सेनापति पद दिया गया। उसने बादशाह को सूचित किया कि-'शहर में लूटपाट या रक्तपात करते हुए प्रत्यक्ष राजपुत्र भी दिखाई दिया तो तत्काल उसके कान-नाक काटने में मैं आगे-पीछे नहीं देखूंगा। बादशाह ने उत्तर दिया, 'आपको सारे अधिकार दे दिए गए हैं, जरा भी ढील न देते हुए आपको जो उचित लगे वह करो।' शहर कोतवाल को डांटा गया कि उसकी ढिलाई के कारण यदि गांव में लूटपाट या दंगा हुआ तो उसे भी फांसी दे दी जाएगी। बख्त खाने ने कहा कि वह अपने साथ चार पैदल टुकड़ियां, सात सौ घुड़सवार, घोड़ों पर चढ़ी छह तोपें, तीन जमीनी तोपें आदि लश्करी सामग्री लाया है। उसके साथ के सिपाहियों को छह माह का वेतन पहले ही दे दिया गया है और अभी उसके पास चार लाख रूपयों की नगदी होने से सिपाहियों के वेतन या पैसों की आवश्यकता के लिए बादशाह चिंता न करें-ऐसा भी बख्त खान ने कहा। इतना ही नहीं, जो कुछ पैसा लड़ाई में उसके हाथ आएगा वह भी बादशाह के खजाने में तुरंत भरा जाएगा। उसके बाद बादशाह ने चार हजार रूपए मूल्य की मेवा-मिठाई सारी सेना में बांटी। आगरा के सिपाही, नसीराबाद और जालंधर की पलटनें-इन सबपर सरसेनापति बख्त खान का अधिकार था। शहर के हर आदमी को शस्त्र धारण करना पड़ेगा, ऐसा पहला आदेश उसने सरसेनापति के नाते से जारी किया। हर गृहस्थ और दुकानदार भी शस्त्र रखे। जिसके पास शस्त्र न होगा वह वरिष्ठ थाने में जाकर पूछताछ करे तो उसे तत्काल शस्त्र रखे। जिसके पास शस्त्र न होगा वह वरिष्ठ थाने में जाकर पूछताछ करे तो उसे तत्काल शस्त्र दिया जाएगा। पर कोई भी बिना हथियार न रहे। कोई सिपाही लूटपाट करता दिखे तो तुरंत उसका हाथ काट दिया जाएगा। बख्त खान शस्त्रागार में गया और उसने निरीक्षण कर शस्त्रों और गोला-बारूद निर्माण को गति दी। रात आठ बजे और अहमद कुली खान के साथ राज्य के हालचाल पर चर्चा की। 3 जुलाई के दिन सामान्य परेड के संचलन के समय लगभग बीस हजार सिपाही उपस्थित थे।''¹¹² बख्त खान के आगमन के कारण दिल्ली के क्रांतिकारी पक्ष को जब उसने कुछ संगठनात्मक रूप देना प्रारंभ किया-उसी समय दूसरी ओर अंग्रेजी पक्ष को भी पंजाब और अन्य हिस्सों से भी उत्साही और साहसी नई कुमुक मिल रही थी। पंजाब से हाल ही में पहुंचे ब्रिगेडियर जनरल चेंबरलेन की शूरता, उत्साह और कल्पनाशील में बराबरी कर सकें, ऐसे बहुत ही कम आदमी अंग्रेज सरकार के पास थे। प्रख्यात लश्करी इंजीनियर बेअर्ड स्मिथ भी उनसे आ मिला। सिखों से कुछ ही समय पूर्व हुई लड़ाई में जिन्होंने 1857 का स्वातंत्र्य समर - 246 ¹¹² मेटकॉफ कृत-'नेटिव नैरेटिव्स', पृष्ठ 60 ।

नाम कमाया था ऐसे सारे जॉन लॉरेंस ने दिल्ली में अंग्रेजों की सहायता के लिए भेज दिए थे। सेनापति बर्नार्ड ने पहले कई बार दिल्ली पर हमला करने की बात सोची थी, पर उसे पूरा नहीं किया गया था। अब नई कुमुक मिल जाने से उसने दिल्ली पर सीधे और साहसी आक्रमण करने का निश्चय किया। पहले जैसी ही इस हमले की सारी योजना बनाई गई और 3 जुलाई को हमले की तैयारी के साथ अंग्रेजी सेना कूच कर गई। पर यह क्या? किसी ने यह समाचार दिया कि सरसेनापति बख्त खान ने अंग्रेजों के दिल्ली पर चढ़ाई करने का श्रम बचा दिया! क्योंकि वह स्वयं ही उनपर हमला करने आ रहा है। तारीख 4 जुलाई को बख्त खान फिर चढ़ आया और उसने अंग्रेजों को अलीपुर तक पीछे ढकेला। दिल्ली गए, दिल्ली शहर पर केवल नजर फेंकी, दृष्टि पड़ी कि उसे सहज ही हमने जीता, ऐसी गर्वोक्तियां दिल्ली को घेरने के पहले जो अंग्रेज करते थे वे पंजाब से नई प्रबल पलटनें आने के बाद भी-पूरे एक माह में एक कदम भी-आगे नहीं बढ़ा पाए। यह देखकर भावना प्रधान सेनापति बर्नार्ड को अति दुःख और शर्म लगती। अंग्रेज दिल्ली जीतने को जितने आतुर थे उससे भी अधिक उनका आत्मविश्वास उसे सहज ही जीतने का था। वह ऐसा आत्मविश्वास था कि मुंबई, कलकत्ता और मद्रास तक दिल्ली जीत लेने का समाचार फैल गयां और जब अंग्रेजों को बार-बार यह दिखाई दिया कि ये समाचार निराधार हैं तब सारे हिंदुस्थान के लोग एक-दूसरे से पूछने लगे- "दिल्ली में अंग्रेजी सेना कर क्या रही है?" यही चिंता और शर्म बर्नार्ड के मन में बस गई थी और पहले की इस अंधकारमय परिस्थिति से कुछ भिन्ना हो सकेगा, उस समय ऐसा उसे नहीं लगता था। उलटे भावी समय का विचार करते हुए उसे वह अधिक अंधियारा ही लगता। सिपाहियों के लगातार होनेवाले हमलों के कारण उसे रत्ती भर विश्राम नहीं मिलता था। इतना ही नहीं, क्रांतिकारियों की उस राजधानी पर सीधा और साहसी हमला करने की उसकी महत्त्वाकांक्षा उगते हर नए दिन धुलती जा रही है, उसे ऐसा दिखता था। अंत में शरीर से थका, मानसिक चिंता से ग्रस्त और निराशा में डूबा हुआ अंग्रेज सेनापति बर्नार्ड 5 जुलाई को हैजे की महामारी की बलि चढ़ गया। इस समाचार से अंग्रेजी छावनी की सेना पर जैसे दुःख का पहाड़ ही टूट पड़ा। दिल्ली में प्रवेश करने का प्रयास करनेवाला यह दूसरा अंग्रेज सेनापति दिल्ली में तो नहीं, कब्र में प्रवेश करने में सफल हुआ। उसके बाद सेनापति रीड ने सेना के अधिकार सूत्र अपने हाथ लिये और वह अंग्रेजी सेना का तीसरा सेनापति हो गया। अंग्रेजी छावनी में हमला करने की जब योजनाएं बन रही थीं, दिल्ली के नागरिकों तब प्रत्यक्ष कृति कर रहे थे। स्थानाभाव के कारण उन सबका वर्णन यहां नहीं कर सकते। ऐसा होते हुए भी 9 जुलाई और फिर से 14 जुलाई के दिन जिस दृढ़ता से 1857 का स्वातंत्र्य समर - 247

क्रांतिकारी लड़े और अंग्रेजों की तरह ही क्रांतिकारियों ने शूरता का कमाल दिखाया–वे अवसर महत्त्वपूर्ण और स्फूर्तिदायक होने से उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता। पहले दिन अंग्रेजी घुड़सवार को हराकर उन्हें भगा दिया गया। अंग्रेजी तोपखाना बंद कर दिया गया। एक शूर सिपाही ने हिल और उसके घोड़े दोनों को ही मार गिराया। हिल ने मरते–मरते अपनी तलवार निकाली, तभी तीन सिपाही उसपर झपट पड़े। हिल ने दो बार गोली दागने का असफल प्रयास किया। एक सिपाही अपनी तलवार निकालने में सफल हुआ। दोनों की लड़ाई हुई, दोनों नीचे गिरे। हिल भूमि पर सीधी गिरा और उसके सीने पर एक पैर रखकर हाथ में तलवार लिये एक सिपाही खड़ा था। मेजर टॉब्स ने तीस फीट दूर से यह दृश्य देखा और उसने निशाना साधकर सिपाही पर गोली चलाई और उसे मार डाला। मेजर टॉब्स ने हिल को भूमि पर से उठाया और वह उसे हिलाने लगा था। उसी समय दूसरा सिपाही हिल की पिस्तौल हाथ में लेकर उसपर हमला करने चला आ रहा है, यह देखकर वह आश्चर्यचकित हो गया। उस सिपाही ने दो–तीन अंग्रेजों से अकेले ही लड़ते हुए एक को तलवार से घायल कर दिया, दूसरे को मार डाला और तीसरे की तलवार से वह स्वयं ही बलि हो गया। टॉब्स और हिल को उनके द्वारा दिखाई गई शूरता के लिए 'विक्टोरिया क्रॉस' दिए गए और सर जॉन के कहता है कि उस बहादुर सिपाही को भी 'बहादुर शाह क्रॉस' मिलना चाहिए था। उस स्वतंत्रता संग्राम में शहीद हुए, हुतात्मा हुए कितने ही वीर 'बहादुर शाह चक्र प्रत्यक्ष मृत्यु देवता की ओर से मिलने का सौभाग्य उन्हें मिलता है, यह बात सत्य थी! उस दिन अंग्रेजी सिपाहियों का अपमान भरा पराभाव हुआ, पर इसका प्रतिशोध क्रांतिकारियों से ले न सकने के कारण वे शूर अंग्रेज अपनी छावनी में लौट गए और वह प्रतिशोध अपनी सेवा कर रहे निरपराध भिश्तियों और अन्य भारतीय लोगों को मार उनके टुकड़े–टुकड़े करके रक्त कुंड में डाल लिया। 113 सच में देखा जाए तो इन्हीं भिश्तियों और अन्य भारतीय लोगों ने अंग्रेजी सेना को उसकी उत्तम सेवा–चाकरी कर लड़ने की स्थिति में बनाए रखा था। पर 14 जुलाई के आक्रमण में इससे बुरी स्थिति हुई। क्योंकि इसी दिन शूर चेंबरलेन को एक सिपाही 1857 का स्वातंत्र्य समर – 248 113 “बताया जाता है कि सामने शत्रुओं के न होने पर कतिपय गोरे सिपाहियों ने उन निरीह, निरपराध कर्मचारियों और नौकरों तथा अन्य लोगों की ही हत्याएं कर डालीं, जो ईसाई श्मशान के समीप भयभीत होकर एकत्रित हो रहे थे। कितनी भी निष्ठा कोई प्रदर्शित करे, उसका जी भरकर ढिंढोरा पीटे, कष्ट उठाए, पूरब की मैली वरदी पहने प्रत्येक व्यक्ति से गोरे जो द्वेष रखते हैं, वह तो कदापि कम नहीं होगा।” –के एवं मैलसन कृत–‘इंडियन म्यूटिनी’, खंड 2, पृष्ठ 438

ने गोली चलाकर मार डाला। चेंबरलेन की मृत्यु के कारण हुई राष्ट्रीय हानि एवं दुःख का वर्णन अंग्रेज इतिहासकार इन शब्दों में करते हैं-"हमारे पक्ष का श्रेष्ठ योद्धा, कीर्ति से पहला और सम्मान में प्रथम! चेंबरलेन का शव जिस हमारे शिविर में फिर से लाया गया वह हमारे इतिहास का एक अति दुःखदायी दिन था।" इस तरह 15 जुलाई बीत गई, फिर भी दिल्ली के प्रासाद-शिखर अपने मस्तकों पर सूर्य किरण-से चमचमाते ध्वज, पताका, झंडियां खड़े कर विश्व को चिल्लाकर कह रहे थे कि दिल्ली शहर दे रही थी, इसलिए स्वयं रीड ने इस्तीफा दिया, अधिकार-त्याग किया और हिमालय की टेकरियों में जाकर वहां रहने लगा। अंग्रेजी सेना का यह तीसरा सेनापति था। दो को भूमि में गाड़ा गया और तीसरे ने अपना अधिकार छोड़कर अपने प्राण बचाए। इतना हुआ तब भी दिल्ली अजित ही बनी रही। क्वार्टर मास्टर जनरल बेचर एवं अॅडज्यूटंट जनरल चेंबरलेन अपने शिविर में ही पड़े मृत्यु के पल गिन रहे थे तब भी दिल्ली जीत न सके। इतना ही नहीं, क्रांतिकारियों की ओर से होनेवाले निरंतर और त्रासदायक हमलों से कैसे बचा जाए, यह प्रश्न अंग्रेजों को सता रहा था; क्योंकि क्रांतिकारियों की संख्या इस समय 20 हजार तक हो गई थी। क्रांतिकारियों द्वारा किए जानेवाले हर हमले में उनका काफी मनुष्य-बल खर्च हो जाता था, फिर भी उसका अंग्रेजों को कोई लाभ नहीं था। पर उनके मुट्ठी भर सैनिक मर जाने से अंग्रेजों का संख्या-बल घटता जा रहा था। इसलिए अंग्रेजों ने अब सुरक्षात्मक नीति अपनाई। आक्रमण में होनेवाली मृत्यु से क्रांतिकारियों की शक्ति विशेष दुर्बल नहीं होती थी और उनके आक्रमणों में भी बाधा नहीं आती थी, उलटे वे अधिक निश्चयी और निर्भय होकर अभिमानपूर्वक कहने लगे कि "अंग्रेजों की विजय का मूल्य पराभव जितना ही है।" सारे हिंदुस्थान में फैले हुए अंग्रेज भी टीका करने लगे, शिकायतें करने लगे और स्पष्टता से लिखने लगे- "घेरा डालनेवाले ही घेरे में फंस गए हैं।" और ऐसी स्थिति में जब तीसरा सेनापति निवृत्त हुआ तब ग्रेट हेड, चेंबरलेन और रॉटन जैसे रणवीरों को दिल्ली पर हमला करने की आशा छोड़ देनी पड़ी। प्रत्यक्ष मुख्यालय में, मुख्य छावनी में ही त्यागपत्र दिया और उसके स्थान पर चौथा सेनापति ब्रिगेडियर जनरल विल्सन आया, तब दिल्ली में अंग्रेजों की ऐसी करूणास्पद स्थिति हो गई थी। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 249

प्रकरण-2 हैवलॉक जब सिख सिपाहियों ने इलाहाबाद का किला क्रांतिकारियों को न सौंपकर अंग्रेजों को दे दिया, तभी से अंग्रेजों ने उसे अपनी कार्यवाही का मुख्य शिविर बनाया। उत्तर हिंदुस्थान की मुलुकी और लश्करी कार्यवाहियां कलकत्ता जैसे दूरस्थ केंद्र से करनी पड़ती थीं और उसमें धोखा था, जो इस नए केंद्र के कारण नहीं रहा। विद्रोह का शमन होने तक राजधानी इलाहाबाद में ही रखने का निर्णय लॉर्ड केनिंग ने किया और कुछ ही दिनों में वह स्वयं इलाहाबाद रहने के लिए चला आया। परंतु तभी कानपुर के अंग्रेजों की भागम-भाग के समाचार और उनके द्वारा सहायता के लिए मचाई गई चिल्लपों सुनाई देने लगी, इसलिए जनरल नील ने इलाहाबाद की सुरक्षा के लिए थोड़ी सी सेना रखकर शेष सारी सेना को मेजर रेनॉल्ड के नेतृत्व में कानपुर का घेरा तोड़ने के लिए भेज दिया। यह सेना रास्ते के गांवों में मन मरजी आग लगाते बढ़ी। उस समय कानपुर की अंग्रेजी सेना के सेनापति पद पर नील के स्थान पर हैवलॉक की नियुक्ति हुई। वह जून के अंत में इलाहाबाद आया। वह सैनिक कार्यवाहियों में पारंगत और अनुभवी अधिकारी था। अंग्रेजों के सौभाग्य से इधर विद्रोह के प्रत्यक्ष फूट पडत्रने के समय अंग्रेजों का ईरान से चल रहा युद्ध समाप्त हो गया और उस अभियान में लगी सारी यूरोपियन सेना हैवलॉक जैसे सेनानी सहित हिंदुस्थान में ऐन आपात स्थिति में आ पहुंची। हैवलॉक के इलाहाबाद में मुख्य अधिकारी होकर आ जाने से उसके अधीन काम करना पड़ेगा, यह देखकर नील के मन में यद्यपि बड़ा मत्सर जागा, फिर भी उसने सार्वजनिक कर्तव्य में 1857 का स्वातंत्र्य समर — 250

मत्सर या खेद के कारण कोई ढिलाई नहीं आने दी। हैवलॉक के साथ जानेवाली सेना की उसने स्वयं की सेना जैसी ही उत्तम व्यवस्था की। उसे दाने-चारे की सहायता की और हैवलॉक के आते ही अपना चार्ज उसको बिना किसी विवाद के सौंप दिया। इस सेना के कानपुर के अंग्रेजों की सहायता के लिए जाने की तैयारी होने पर हैवलॉक बड़े उत्साह से उधर जाने को था कि उसे समाचार मिला कि कानपुर में सर हो व्हीलर ने पराजित होकर विद्रोहियों के सामने समर्पण कर दिया और उसके सहित अंग्रेज पुरूषों का गंगा किनारे भयानक कत्ल हो गया। जीवित अवस्था में जिसे सुरक्षा प्रदान करना असंभव हुआ अब उसकी मृत्यु का निष्ठुर प्रतिशोध लेना ही होगा, ऐसी प्रबल इच्छा से हैवलॉक इलाहाबाद से कानपुर की ओर तेजी से निकला। उसके चुने हुए एक हजार यूरोपियन पैदल, सौ-डेढ़ सौ सिख, यूरोपियन घुड़सवारों की छोटी सी एक टुकड़ी और छह तोपें-इतनी सेना क्रोधित हो जान की बाजी लगाने निकली थी-नए अधिकारियों और सिपाहियों को उस प्रदेश की जानकारी देने के लिए, लड़ाई में स्वयं लड़ने के लिए और लड़ाई के बाद क्रूर प्रतिशोध लेने के लिए। विद्रोही सिपाहियों की रेजिमेंट में से या विद्रोही नागरिकों द्वारा दया भाव से जान-बूझकर जीवित छोड़े या लापरवाही से जीवित छूटे हुए कितने ही लश्करी और मुलुकी अधिकारी उस सेना के साथ चल रहे थे। जो अकेले-अकेले हाथ पड़ते तो एक शब्द के साथ ही विद्रोहियों द्वारा जला दिए जाते, वे ही अंग्रेज लोग आज फिर से इकट्ठे होते ही, उनके कारण गांव-के-गांव राख होने लगे। रीड के अधीन एक टुकड़ी फतेहपुर की ओर आ रही है, यह समाचार करनपुर पहुंचते ही नाना साहब ने विद्रोहियों में से बहुत सी सेना उधर भेज दी। ज्वाला प्रसाद, टीका सिंह और इलाहाबाद के मौलवी के नेतृत्व में रीड में मुट्ठी भर अंग्रेजों का पहले ही प्रहार में चित करके विजयश्री के साथ तुरंत ही कानपुर लौट आएंगे, इस उत्साह से निकली विद्रोहियों की सेना फतेहपुर के पास आ पहुंची। उसी समय अचानक रीड की टुकड़ी से हैवलॉक की सेना आ मिली। और इस सम्मिलित अंग्रेजी सेना ने विद्रोहियों की सेना आ गई-यह सुनते ही अपनी तोपों को बत्ती दी। यह लड़ाई 12 जुलाई को हुई। रीड की टुकड़ी को बात-की-बात में नष्ट कर देंगे, इस विश्वास से विद्रोहियों द्वारा अंग्रेजी सेना पर हमला करते ही मुट्ठी भर लोगों के स्थान पर तोपखाने के साथ सर्वांगपूर्ण हैवलॉक की गोरी सेना रणांगण में कूद आई। यह धोखा एकाएक सामने आ जाने से विद्रोहियों में दहशत बैठ गई और वे अपनी तोपें रणांगण में छोड़कर भागने लगे। उनका पीछा करना संभव न होने से उन्हें छोड़ अंग्रेजी सेना फतेहपुर शहर में घुस गई। इस फतेहपुर शहर ने जब विद्रोह किया था तब वहां की अगुवाई अंग्रेज सरकार के नौकर, डिप्टी मजिस्ट्रेट के पद पर आसीन हिकमतुल्ला नामक एक मुसलमान ने की थी। और इस शहर में यूरोपियन अधिकारियों का रक्त भी विद्रोही नागरिकों की तलवारों ने पिया था। उस रक्तप्रिय शहर पर अब प्रतिशोध की तलवार आ पड़ी। विद्रोह होने पर लोगों 1857 का स्वातंत्र्य समर - 251

को न मारते हुए छोड़ दिया गया। उस शहर कापूर्व मजिस्ट्रेट शेररे उस विजयी सेना के साथ आया था और बहुत दिन से रुकी हुई अपनी मजिस्ट्रेटरी चलाने को वह अब उत्सुक था। इसलिए पहले लश्कर को शहर लूटने का आदेश दिया गया और जब उस शहर में लूटने के लिए कुछ भी शेष न रहा तब उस शहर को आग लगा देने का दूसरा आदेश हुआ। परंतु इस आदेश के पालन का सम्मान कवेल सिख सिपाहियों को ही दिए जाने के कारण गोरी सेना के फतेहपुर से निकलते ही सिखों ने उन्हें सौंपी गई खास कार्यवाही सपंन्न करते हुए उस शहर को आग लगा दी और फिर वे मुख्य सेना से जाकर मिल गए। फतेहपुर शहर को जब अंग्रेजी सेना जीवित जला रही थी तब उसकी ज्वालाओं की पलटें फैलते-फैलते जल्दी ही कानपुर को गरमी देने लगीं। मेजर रीड की टुकड़ी को मारने के लिए अपनी सेना टूटी तभी मेजर हैवलॉक की सेना ने अकस्मात् हमला कर उन्हें भगा दिया। फतेहपुर शहर में अंग्रेजी सेना ने प्रवेश किया और वहां की संपत्ति लूटकर आदमियों को आग में भस्म कर डाला-ये समाचार नाना के दरबार खौलने लगा। कानपुर पर आक्रमण करने आ रहे अंग्रेजों को पांडु नदी पर ही रोक लेने के लिए नाना साहब के अधीन एक सेना भेजने को नाना का दरबार उठा तो अंग्रेजों की ओर गए हुए कुछ दगाबाज जासूस पकड़े जाने का समाचार आया। इन दगाबाज जासूसों की जांच में यह सिद्ध हो गया कि उनमें से कुछ को नाना की कैद में रह रह गोरी महिलाओं ने इलाहाबाद के अंग्रेजों को विश्वासघाती पत्र लिखे हैं।114 सिपाहियों के कत्लेआम से जिनका अबला कहकर नाना ने बचाव किया उनकी इन गुप्त कार्यवाहियों का डंका पिट जाने पर इन कुटिल गोरी स्त्रियों का क्या किया जाए, यह महत्त्वपूर्ण प्रश्न उपस्थित हुआ। फतेहगढ़ अंग्रेजों ने जलाया वैसे ही यह बीबीगढ़ भी हम क्यों न जलाएं? उस दिन की खास बैठक में टीका सिंह ने कहा-“ये महिलाएं कानपुर के बीबीगढ़ में ऐसे ही रहीं तो अपनी पराजय होने पर कानपुर शहर को अंग्रेज राख तो करेंगे ही, पर उनके कथन के आधार पर हजारों लोग अंग्रेजों के द्वेष की बलि चढ़ेंगे, इसलिए मेरे विचार से कानपुर से अंग्रेज भिड़ें, इसके पूर्व ही यहां की आंतरिक जानकारी देने को एक भी गोरी चमड़ी शेष न रहे।115 बीबीगढ़ में जो महिलाएं थीं उनमें से कितनी ही कानपुर में दस-दस वर्ष से रह रही थी। अंग्रेजों के विरुद्ध जो लड़े उनमें से बहुतेरे नागरिकों को वे नाम-पते सहित 1857 का स्वातंत्र्य समर - 252 114 1 ''फतेहपुर में क्रांतिकारी सेना की पराजय के उपरांत कतिपय प्रसिद्ध गुप्तचरों को नाना साहब के समक्ष उपस्थित किया गया। बंदीगृह में पड़ी कुछ असहाय महिलाओं द्वारा सुदूर स्थानों को लिखें पत्रों के कतिपय इन गुप्तचरों के पास होने का आरोप लगाया था। उन पत्रों में कतिपय महाराजाओं तथा नगर के 'बाबू' लोगों का हाथ होने की आशंका व्यक्त की गई थी। तभी यह निश्चय किया गया कि उन गुप्तचरों तथा उन अंग्रेज पुरूषों तथा महिलाओं का भी वध कर दिया जाए, जिन्हें प्राणदान दे दिया गया था।'' 115 2 Forrest's Introduction में फॉरेस्ट कहता है-''आगे साक्ष्य न मिले, इसलिए कत्लेआम का आग्रह-पहला प्रस्ताव टीका सिंह ने किया। ''

जानती थीं। अतः उनके अस्तित्व का विष भरा पात्र भंग न किया तो वह कानपुर को जीवन को हानि किए बिना चुकेगा नहीं, ऐसा इस सभा में सबका विचार बना। उस कैदखाने को बीबीगढ़ कहा जाता था, पर उसमें नाना के आदेश से बचे हुए कुछ पुरुष भी थे। उन सबको उनके विश्वासघाती पत्र ले जानेवाले जासूसों सहित मार डाला जाए, ऐसा सर्वसम्मत निश्चय कर उसे घोर रात क यह घोरतम सभा विसर्जित हुई। दूसरे दिन उन जासूसों और कैद में पड़े गोरे पुरुषों को बाहर खींचा गया। एक कतार में वे खड़े रहे और स्वयं नाना साहब के सामने पहले उन जासूसों के सिर सटासट उड़ाए गए और बाद में कैद के गोरे पुरुषों को आगे लाकर गोली से मार डाला गया। नाना साहब के वहां से उठते ही उन गोरे लोगों के शवों के पास आकर लोग मजाक करने लगे, "देखो, यह मद्रास का गवर्नर, यह बंबई का, यह बंगाल का ˙' ऐसा मजाक इधर चल रहा था और उधर बीबीगढ़ के पहरेदार सिपाहियों को अंदर घुसकर कत्ल करने का आदेश हुआ। पहरेदार ऐसा कत्लेआम करने का साहस न जुटा सके। तब ऐसे सिपाहियों से अधिक योग्यता का आदमी चाहिए, यह देखकर उस बीबीगढ़ की मुख्य अधिकारी बेगम साहब ने कानपुर शहर की खटीक बस्ती में वह आदेश भिजवाया। थोड़ी देर में हाथों में नंगी तलवारें और तेज छुरियां लेकर खटीक लोग उस बीबीगढ़ में शाम के समय अंदर घुसे और काफी रात गए बाहर आए। उनके उस घुसने और निकलने के बीच गोरे रक्त का लाल-लाल समुद्र फैल गया। बीबीगढ़ में घुसते ही उन्होंने हाथ की तलवार और छुरियों से कोई डेढ़ सौ गोरी महिलाएं और गोरे बच्चे काट डाले। उस जह पर रक्त की तलैया भर गई और उस रक्त में नरमांस के टुकड़े तैरने लगे। अंदर जाते समय वे खटीक जमीन पर से चलते गए और बाहर निलते समय उन्हें रक्त जल का प्रवास करना पड़ा। रात को बीबीगढ़ में अधमरों की चिल्लाहट, मरणोन्मुखी के आर्तनाद सुनाई दे रहे थे। भोर होते ही एक-दो बच्चे ऊपर आ गए और कुएं के किनारे भागने लगे। लेकिन धक्का लगकर वे भी मरे हुओं पर गिर गए। उन मरों पर मरे हुए और उनपर फिर मरे हुए। आज तक आदमी कुएं का पानी पीता था, परंतु आज कुएं ने आदमी का रक्त पीना चालू किया। फतेहगढ़ में जलते हुओं का आर्तनाद अंग्रेज आकाश में फेंक रहे थे, तभी बीबीगढ़ में रक्त से सनी गोरी चीखें पांडे पाताल में फेंक रहे थे। मनुष्य प्राणी की इन दो भिन्न जातियों में सौ वर्ष से जमा रकम का हिसाब इस तरह चुकता होने लगा।116 कानपुर का कुआं, इसे भरने का जो-जो 1857 का स्वातंत्र्य समर - 253 116 "क्रूरता की पराकाष्ठा, अवर्णनीय लज्जा आदि विशेषणों से इस पाश्व हत्याकांड का वर्णन किया गया है, किंतु ये सब तो विभ्रांत कल्पना शक्ति की मनगढ़ंत बातें ही हैं, जिनपर बिना किसी

प्रयास हुआ वह विफल हुआ। बंगाल की खाड़ी भी कालप्रवाह में भर जाएगी, पर यह कानपुर का कुआं कभी नहीं भरेगा। इसी समय पांडु नदी पर पहुंची नाना की सेना का पराभाव करते हैवलॉक आगे घुसता गया। नाना की सेना के सेनापति बाला साहब पेशवा के कंधे में गोली लगने से उनके वापस कानपुर आते ही नाना ने तुरंत एक युद्ध सभा बुलाई। लड़ाई न करके कानपुर छोड़ें या कानपुर छोड़ने के पूर्व मैदान में एक जोरदार टक्कर देकर देखें-इन दो मुद्दों पर युद्ध सभा में बहुत चर्चा होकर अंत में दूसरे रास्ते का अनुसरण करना तय हुआ। 16 जुलाई को अंग्रेजी सेना कानपुर के पास आने लगी। कानपुर के कुएं की कथा उन्हें अभी तक ज्ञात न होने से यद्यपि व्हीलर ला का किला हाथ से निकल गया, तब भी बीबीगढ़ को विद्रोहियों के कब्जे से छुड़ा लेने की जिद उन्हें धूप, श्रम और लड़ाई में भी एक क्षण विश्राम नहीं लेने रे रही थी। कानपुर शहर के शिखर दिखते ही हैवलॉक को इष्ट समय आने का उत्साह चढ़ने लगा। उसने पांडे की सेना क बारीक जांच शुरू की। कानपुर के रण पर इतनी उत्तम रीति से व्यूह रचकर खड़ी सेना को देखकर रण क्षेत्र में पूरा जीवन गुजार देनेवाले उस योद्धा को ऐसा उगने लगा कि विद्रोहियों में अपेक्षा से अधिक लश्करी चतुराई भरी हुई है। उसने अपने अधिकारी इकट्ठा किए और उन्हें हाथ की तलवार के छोर से धूल पर लश्करी आक्रमण का अपना नक्शा खींचकर बताया। विद्रोहियों पर सामने से आक्रमण करने के स्थान पर बाईं ओर पहले हमला करना चाहिए, यह हैवलॉक अपनी सेना को समझा रहा था, तभी विद्रोहियों की व्यूहबद्ध सेना में एक सफेद घोड़े पर सवार होकर श्रीमंत नाना साहब आ मिले। सिपाहियों को उत्साहित करते इस छोर से उस छोर तक नाना साहब घोड़ा दौड़ते अंग्रेजों की छावनी से स्पष्ट दिख रहे थे। दोपहर के समय अंग्रेजों का नाना के बाएं बाजू पर हमला हुआ। इस अकस्मात् और अनपेक्षित स्थान पर हुए अंग्रेजों के जोरदार हमले को रोकने के लिए विद्रोहियों की तोपें गरजने लगीं। अंग्रेजी तोपखाना आने में विलंब हो जाने के कारण विद्रोहियों का जोर बढ़ गया। परंतु विद्रोहियों की बढ़त देखकर क्रोधित हैवलॉक जब फिर से एक बार चढ़ाने करने लगा-अंग्रेजी हायलैंडर्स मुंह घुमाकर सीधे तोपों पर दौड़ गए और जब एक कदम भी पीछे न रहते मृत्यु या विजय, ऐसा पक्का निश्चय कर अंग्रेजी सेना बिजली-सी टूट पड़ी तब उस एकीकृत, अनुशासित और अनपेक्षित मार को सहन करने 117 1857 का स्वातंत्र्य समर - 254 117 - प्रकार का ध्यान दिए ही विश्वास कर लिया गया। (परिणामों की तनिक भी चिंता न की गई) बिना विचारे ही उनका प्रसार और प्रचार किया गया। किसी का अंगच्छेद न हुआ, किसी का अपमान नहीं हुआ। यह साक्षी दी है, क्योंकि उन्होंने जून और जुलाई मास में हुई हत्याओं से संबद्ध प्रत्येक बात का खोजपूर्ण अवलोकन किया था।‘' -के एवं मैलसन कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 2, पृष्ठ 281

में पूर्णतः असमर्थ हुई विद्रोहियों की सेना बाएं बाजू की तोपें छोड़ भाग खड़ी हुई। बायां बाजू इस तरह पिटते ही अंग्रेजों के पैदलों ने विद्रोहियों के दाएं बाजू को भी पराभूत कर दिया। अंग्रेजी सेना विजयी हुई, यह देखते ही विद्रोही कानपुर के रास्ते पीछे हटने लगे। परंतु अब निराशा का अवसाद भरा होने के कारण फिर से एक बार नाना ने उन्हें इकट्ठा किया और आरक्षित रखी तोपों की सहायता से फिर से युद्ध करने का प्रयास किया। इस समय नाना ने उत्साहित करने और स्वयं अगुवाई कर साहस लाने की कोशिश की, फिर भी हताश हुए सिपाही और विजय से उन्मत्त अंग्रेजी सोल्जर इन दोनों के मध्य का अंतर पाटना बहुत कठिन था। अंग्रेजों ने एक हमला और किया और निराशा से भरी टक्कर विफल हो गई और कानपुर के रण क्षेत्र में विजयश्री फेंककर विद्रोही ब्रह्मवर्त की ओर भाग खड़े हुए।118 17 जुलाई को प्रातः हैवलॉक की विजयी सेना कानपुर शहर में प्रवेश करने लगी। अस्तत होती अंग्रेजी आबरू को फिर से जीवन देनेवाली यह सफलता की पहली लहर कानपुर में लानेवाले हैवलॉक और उसकी सेना का हिंदुस्थान और इंग्लैंड में जहां-जहां भी गोरे रहते थे वहां-वहां धन्यवाद की दीवारों पर इधर-उधर हैवलॉक का नाम खुदा हुआ था। कानपुर शहर को लूटने का आदेश मिलते ही हजारों अंग्रेजी सोल्जर, अधिकारी और सिख सिपाही उस शहर पर गिद्धों जैसे टूट पड़े। बीबीगढ़ में अंग्रेजी महिलाओं का रक्त जमा देखकर उसे धोने के लिए हैवलॉक ने शहर के उन ब्राह्मणों को पकड़कर बुलाया जिनपर विद्रोह में सम्मिलित होने का शक था। उन्हें फांसी का दंड देकर फांसी पर लटकाने के पहले वह जमा हुआ रक्त जीभ से चाटने और फिर वह हिस्सा हाथ से झाडू लेकर धोने का बाध्य किया गया। जिन्हें एक क्षण के बाद मार डालना हे उनको यह अप्रतिम दंड देने का कारण देते हुए अंग्रेज अधिकारी कहते हैं, “फिरंगी रक्त का स्पर्श करना और वह भंगी के झाडू से धोना, यह बात उच्च जाति के हिंदुओं को धर्मभ्रष्ट करनेवाली है, यह मुझे मालूम है। इतना ही नहीं, यह ज्ञात है, इसीलिए मैं उनसे यह करा रहा हूं। अपने स्वधर्म में मरने का अल्प संतोष भी उन्हें न रहे, इसलिए उनकी धर्मभावनाओं को जान-बुझकर पैरों तले रौंद फिर उन्हें फांसी पर चढ़ाने के अतिरिक्त वास्तविक प्रतिशोध नहीं लिया जा सकता।” अंग्रेज लोगों की हुई आमहत्या में विद्रोहियों ने उनके धर्म संबंधी अत्याचार नहीं किए। इतना ही नहीं, जब-जब मरने के पहले अंग्रेजों ने 1857 का स्वातंत्र्य समर – 255 118 रेड पैंफलेट का प्रसिद्ध लेखक कहता है-‘‘ऐसी कानपुर की लड़ाई हुई-विद्रोहियों ने अच्छी टक्कर दी। तलवार ने तलवार भिड़ गई, फिर भी उनमें से बहुत हटे नहीं, तोपें ढंग से संभाली और उनकी गोलंदाजी भी निशाने पर थी।‘‘

बाइबिल पढ़ने की अनुमति मांगी तब-तब वह उन्हें दी गई। परंतु दिल्ली और कानपुर में मरनेवालों को स्वधर्म में मरने का संतोष भी अंग्रेजों ने नहीं दिया। फिर भी, ऐसी दुर्दशा में भी जिन्होंने मृत्यु को सिद्धांतनिष्ठा के साथ धैर्य से मुस्कुराते हुए स्वीकारा, ऐसे धीर जनों ने कानपुर की फांसी को कुछ कम अलंकृत किया था, ऐसा नहीं। चार्ल्स बॉल लिखता है-"जनरल हैवलॉक ने सर हो व्हीलर की मृत्यु का भयानक प्रतिशोध लेना प्रारंभ किया। नेटिव की टोलियों-परे-टोलियां फांसी पर चढ़ने लगी। इन विद्रोहियों में से कुछ ने मृत्यु के समय जो मानसिक अचलता और धैर्य का प्रदर्शन किया वह किसी सिद्धांतप्रियता के लिए आत्मयज्ञ करनेवालों के लिए भूषणभूत होने वाला था। कानपुर के स्वदेशी मजिस्ट्रेटों में से जिन्होंने विद्रोह में नाना की विपुल सहायता की थी और जो फिरंगियों का कट्टर द्वेषी था, ऐसे एक मजिस्ट्रेट की जांच चलने और उसे अधम, नीच जनोचित मृत्यु का दंड दिए जाने पर वह इतना निश्चित दिख रहा था मानो वह मृत्युदंड उसे न दिया जाकर दूसरे ही किसी को दिया जा रहा है। प्रशांत स्थिरता से उठ उसने जज की ओर पीठ फेरी और अपने लिए खड़ी की गई फांसी की ओर वह दृढ़ पदन्यास से चलकर गया। जल्लाद लोग फांसी की अंतिम तैयारी कर रहे थे। रत्तीभर भी कंपित हुए बिना निश्चल मुद्रा से वह जल्लादों के काम को सहज देख रहा था और जरा भी विचलित हुए बिना जैसे योगी समाधि में जाते हैं वैसे ह ीवह संतोष के साथ फांसी में घुसा। उसकी धर्मनिष्ठता से उसे मृत्यु का डर नहीं रह गया था। फिरंगियों के दुष्टापूर्ण संसर्ग से छूटकर परलोक का ध्रुव सुख देनेवाला रास्ता ही मृत्यु है-यह जिसके धर्म की निष्ठा थी उसे मृत्यु का डर कैसे स्पर्श करे।'"119 कानपुर शहर में अंग्रेजी सेना ऐसा स्वच्छंद प्रतिशोध ले रही थी-मुट्ठी भर अंग्रेज सेना और राजनिष्ठ सिख सिपाहियों ने इलाहाबाद से चलने के बाद व्यवस्था, अनुशासन, संगठन और संकल्प से भरी लश्करी शूरता प्रदर्शित की थी, उसकी यथार्थ स्तुति कर अपनी सेना को उत्साहित करने के लिए हैवलॉक ने यह लश्करी आदेश जारी किया-"सोल्जर्स, तुम्हारे सेनापति को तुम्हारे व्यवहार से संतोष हुआ है। निष्ठा और संकल्प में कुशल ऐसी दूसरी सेना उसने नहीं देखी है। 7 और 16 तारीखों के बीच जुलाई के तीखे सूरज की परवाह किए बिना तुमने एक सौ बीस मील आ क्रमण किया और चार लड़ाइयां जीती।' पर हाथ में लिया काम पूरा किए बिना झूठा संतोष मानकर चुप बैठनेवाला जनरल हैवलॉक नहीं था। समाप्ति के सिवाय समापन नहीं, यह उसकी टेक थी। उसने उपर्युक्त प्रोत्साहन देकर आगे कहा, "तुम्हारे लोग लखनऊ में संकटग्रस्त हैं। आगरे में घेरा लगा है। विद्रोही क्रांति के हाथों में दिल्ली अभी भी फंसी है। तुम्हें सफलता पानी है तो तुम्हें स्वार्थ-त्याग ही करना पड़ेगा। तीन नगर संभालने हैं, दो बंधन 1857 का स्वातंत्र्य समर - 256 119 चार्ल्स बाल कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 1, पृष्ठ 388 ।

मुक्त करने हैं। यह सब कार्य निश्चित ही पूरे करोगे, इसका तुम्हारे सेनापति को पूर्ण विश्वास है। केवल तुम उतने ही उत्साह से उसकी सहायता करो और तुम्हारी बहादुरी जितना ही तुम्हारा अनुशासन भी दृढ़ बना रहे।" हैवलॉक के पीछे-पीछे जनरल नील भी इलाहाबाद की सुरक्षा के लिए आवश्यक अंग्रेजी सेना रखकर शेष सेना के साथ कानपुर पहुंच गया। समान अधिकारवाले ये दो अधिकारी एक स्थान पर आते ही दोनों को ही सारी सेना अपने अधिकार में हो, ऐसी महत्त्वाकांक्षा उत्पन्न होने के कारण पहले ही बहुत अधिक अनुशासनहीन हुई अंग्रेजी सेना में और अधिक अनुशासनहीनता होने की आशंका है, यह देखकर हैवलॉक ने नील को साफ-साफ कहा, “जनरल नील, अब हम दोनों एक-दूसरे का साफ पहचान लें तो ठीक होगा। जब तक मैं यहां हूं, पूरा शासन मेरे अधीन रहेगा, तुम कोई भी आदेश जारी नहीं करोगे।" इस सार्वजनिक कार्य में व्यक्ति विषयक मत्सर न हो, इसलिए कानपुर को नील ने संभाला और लखनऊ को मुक्त करने के लिए सेना लेकर हैवलॉक अवध की ओर कूच कर गया । नील ने कानपुर की सुरक्षा के लिए एक नई युक्ति अपनाई, वह यह कि वहां के महारों की एक सेना तैयार कर उसके अधीन सारा शहर कर दिया। नगर की उच्च जातियों के विरूद्ध अतिशुद्रों को प्रोत्साहित करने की यह युक्ति उत्तम सिद्ध हुई। मुसलमान और हिंदुओं में फूट नहीं डाली जा सकी जब जातिभेद का नया भूत खड़ा किया गया और वह सफल भी रहा। हिंदू धर्म और हिंदू राज्य के लिए फिर एक बार जूझना होगा कानपुर में पराजित हो जाने के बाद नाना साहब पेशवा ब्रह्मवर्त से खजाना, शस्त्रास्त्र और सेना लेकर गंगा पार हो गए। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में वे क्रांतिवीर केवल स्वधर्म और स्वराज्य के लिए ही कैसे लड़ रहे थे, यह सिद्ध करने के लिए उसी समय उस प्रदेश में उस काल के युद्ध जिन्होंने अपनी आंखों से देखें, वसई महाराष्ट्र के उन्हीं वेदशास्त्र-संपन्न विष्णुभट गोडसे ने अपने यात्रावृत्त की एक पुस्तक 'माझा प्रवास' अथवा 'सन् 1857 के विद्रोह की कथा' उसी समय लिखी। वह यात्रा वर्णन चि.वि. वैद्य ने प्रकाशित की। उस पुस्तक में श्री गोडसे भटजी ने कानपुर छोड़ते समय का वर्णन बड़ी ही मार्मिक भाषा में किया है-“अंधियारा हो जाने के बाद नौकाएं सज्जित कर उनमें उपर्युक्त सामान भरने के बाद बाला साहब आदि को विदाई देने के लिए जो हजारों नागरिक गंगा तीर पर जमा थे उन सबको नौका चलने के पहले नम्रता से नमस्कार कर किंचित् भावविह्वल होकर श्रीमंत बाला साहब ने कहा कि कानपुर में जब हम हारे उस समय तात्या तोपें, जलका रामभाऊ और लालपुरी गोसानी आदि हमारे सरदार कहां गए, 1857 का स्वातंत्र्य समर - 257

हमें यह ज्ञात नहीं। पर वे शूर हैं, अतः उनकी हमें चिंता नहीं है। आपको छोड़कर जाना अवश्य हमारे लिए कठिन हो रहा है, पर उपाय नहीं। हिंदू धर्म के लिए और हिंदू राज्य के लिए फिर से एक बार प्रयास करने होंगे। इस हेतु यह संकट जो ईश्वर ने हमारे कारण आप पर लादा है, उसके लिए कृपा कर हमें क्षमा करें।''120 गंगा पार जाने के बाद पहला मुकाम फतेहगढ़ में था। अंग्रेजी सेना ने ब्रह्मवर्त का राजमहल धूल में मिलाया और वह अवध की ओर चल दी। नाना के आगे की हलचल की कोई सूचना न मिलने से हैवलॉक लखनऊ की ओर बढ़ा। जून माह के अंत में सारा अवध प्रदेश विद्रोह का एक जीवित छत्ता बन गया था, इसलिए उस प्रदेश से रास्ता निकालते हुए लखनऊ पहुंचना और वहां का घेरा उठाकर सर हेनरी लॉरेंस को मुक्त करना और यह कार्य बहुत दुष्कर होते हुए भी विजय के पहले आवेश में कानपुर से गंगा नदी उतरकर लखनऊ जीतना-हैवलॉक और उसकी सेना को बहुत सुलभ लग रहा था। दिल्ली गए-माने दिल्ली जीती, यह धारणा जैसे पंजाब से दिल्ली पहुंची अंग्रेजी सेना के सेनानियों को भ्रमित किए थी वैसी ही गंगा उतरना-माने लखनऊ जीतना, यह धारणा इलाहाबाद से आ रहे हैवलॉक को उत्साहित करने लगी। कानपुर से लखनऊ शहर कोई बहुत दूर नहीं था, यह बात सच थी; परंतु यह भी सच था कि इलाहाबाद से कानपुर आते समय हैवलॉक ने जो लगन और उत्साह प्रदर्शित किया वह यों तो दुष्कर कार्य कर डालने की स्फूर्ति देनेवाला था, परंतु अवध में जहां विद्रोह की ज्वाला न सुलगी हुई हो, ऐसा एक कदम भर स्थान इस समय शेष नहीं था। हिंदुस्थान में जहां पुरबिया सिपाहियों ने विद्रोह प्रारंभ किया, उन पुरबियों का अवध पालना होने से वहां के गावं-गावं में, झोंपड़े-झोंपड़े में उन पुरबियों के मां-बाप, बच्चे-बच्चों, नाते-संबंधी, दोस्त-यार सारे राज्य क्रांति की अनिवार्य चेतना से सुलगे हुए थे। फिर भी विजय से अभिभूत आंग्ल सेनानी को यह स्थिति डरा नहीं सकी। उलटे उसका उत्साह इतना बढ़ गया कि मैं देखते ही लखनऊ जीत लूंगा और फिर दिल्ली जाऊंगा और दिल्ली भी जीतकर फिर आगरा मुक्त करूंगा-ऐसी हिम्मत से हैवलॉक लगभग दो हजार अंग्रेजी सैनिक एवं दस तोपों सहित 25 जुलाई को गंगा पार हो गया। कानपुर में जनरल नील है और हैवलॉक लखनऊ जा रहा है-इस तरह की स्थिति जुलाई के अंतिम दिनों अंग्रेजी सेना की थी। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 258 120 'माझा प्रवास', विष्णुभट गोडसे, पृष्ठ 37 ।