भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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में पूर्णतः असमर्थ हुई विद्रोहियों की सेना बाएं बाजू की तोपें छोड़ भाग खड़ी हुई। बायां बाजू इस तरह पिटते ही अंग्रेजों के पैदलों ने विद्रोहियों के दाएं बाजू को भी पराभूत कर दिया। अंग्रेजी सेना विजयी हुई, यह देखते ही विद्रोही कानपुर के रास्ते पीछे हटने लगे। परंतु अब निराशा का अवसाद भरा होने के कारण फिर से एक बार नाना ने उन्हें इकट्ठा किया और आरक्षित रखी तोपों की सहायता से फिर से युद्ध करने का प्रयास किया। इस समय नाना ने उत्साहित करने और स्वयं अगुवाई कर साहस लाने की कोशिश की, फिर भी हताश हुए सिपाही और विजय से उन्मत्त अंग्रेजी सोल्जर इन दोनों के मध्य का अंतर पाटना बहुत कठिन था। अंग्रेजों ने एक हमला और किया और निराशा से भरी टक्कर विफल हो गई और कानपुर के रण क्षेत्र में विजयश्री फेंककर विद्रोही ब्रह्मवर्त की ओर भाग खड़े हुए।118 17 जुलाई को प्रातः हैवलॉक की विजयी सेना कानपुर शहर में प्रवेश करने लगी। अस्तत होती अंग्रेजी आबरू को फिर से जीवन देनेवाली यह सफलता की पहली लहर कानपुर में लानेवाले हैवलॉक और उसकी सेना का हिंदुस्थान और इंग्लैंड में जहां-जहां भी गोरे रहते थे वहां-वहां धन्यवाद की दीवारों पर इधर-उधर हैवलॉक का नाम खुदा हुआ था। कानपुर शहर को लूटने का आदेश मिलते ही हजारों अंग्रेजी सोल्जर, अधिकारी और सिख सिपाही उस शहर पर गिद्धों जैसे टूट पड़े। बीबीगढ़ में अंग्रेजी महिलाओं का रक्त जमा देखकर उसे धोने के लिए हैवलॉक ने शहर के उन ब्राह्मणों को पकड़कर बुलाया जिनपर विद्रोह में सम्मिलित होने का शक था। उन्हें फांसी का दंड देकर फांसी पर लटकाने के पहले वह जमा हुआ रक्त जीभ से चाटने और फिर वह हिस्सा हाथ से झाडू लेकर धोने का बाध्य किया गया। जिन्हें एक क्षण के बाद मार डालना हे उनको यह अप्रतिम दंड देने का कारण देते हुए अंग्रेज अधिकारी कहते हैं, “फिरंगी रक्त का स्पर्श करना और वह भंगी के झाडू से धोना, यह बात उच्च जाति के हिंदुओं को धर्मभ्रष्ट करनेवाली है, यह मुझे मालूम है। इतना ही नहीं, यह ज्ञात है, इसीलिए मैं उनसे यह करा रहा हूं। अपने स्वधर्म में मरने का अल्प संतोष भी उन्हें न रहे, इसलिए उनकी धर्मभावनाओं को जान-बुझकर पैरों तले रौंद फिर उन्हें फांसी पर चढ़ाने के अतिरिक्त वास्तविक प्रतिशोध नहीं लिया जा सकता।” अंग्रेज लोगों की हुई आमहत्या में विद्रोहियों ने उनके धर्म संबंधी अत्याचार नहीं किए। इतना ही नहीं, जब-जब मरने के पहले अंग्रेजों ने 1857 का स्वातंत्र्य समर – 255 118 रेड पैंफलेट का प्रसिद्ध लेखक कहता है-‘‘ऐसी कानपुर की लड़ाई हुई-विद्रोहियों ने अच्छी टक्कर दी। तलवार ने तलवार भिड़ गई, फिर भी उनमें से बहुत हटे नहीं, तोपें ढंग से संभाली और उनकी गोलंदाजी भी निशाने पर थी।‘‘